भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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नारायणोपनिषत् ] [ ५३५ ॐ । पुरुष रूप नारायण ने कामना की कि प्रजा की सृष्टि होनी चाहिये । तब नारायण में से प्राण की उत्पत्ति हुई, और मन तथा सब इन्द्रियों की उत्पत्ति भी उन्हीं से हुई । आकाश, वायु, ज्योति, जल और पृथ्विी, जो विश्व को धारण करती है, इन सब पञ्च भूतों की उत्पत्ति भी नारायण से हुई । नारायण से ही ब्रह्माजी उत्पन्न हुये, नारायण से रुद्र की उत्पत्ति हुई । नारायण से इन्द्र उदन्न हुये । नारायण से प्रजा- पति उत्पन्न हुये । नारायण से ही बारह आदित्य, रुद्र, आठ वसु और सब प्रकार के छन्दों की उत्पत्ति हुई । ये नारायण में से ही आते हैं और उसी में लय को प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद के इस शिरोमण ( श्रेष्ठ अङ्ग ) का विद्वान अध्ययन करते हैं ॥ १ ॥ नारायण नित्य रूप है, नारायण ब्रह्मा रूप है, नारायण शिव रूप है, नारायण चक्र रूप है, नारायण काल रूप है, नारायण दिशा रूप है, नारायण विदिशा रूप है, नारायण ही ऊपर है, नारायण ही नीचे है, नारायण ही भीतर और बाहर है । जो कोई उत्पन्न हुआ है, और उत्पन्न होगा वह सब नारायण रूप ही है । एक मात्र नारायण ही निष्कलङ्क, निरंजन, निर्विकल्प, निराख्यात ( वर्णन से रहित ) और शुद्ध देव है, इनके अतिरिक्त और कहीं कोई नहीं है । जो इस प्रकार जानता है वह विष्णुरूप हो जाता, वह विष्णु के समान हो जाता है। विद्वान लोग यजुर्वेदोक्त इस श्रेष्ठ तत्व का अध्ययन करते हैं ॥ २ ॥ ॐ मित्यग्रे व्याहरेत् । नम इति पश्चात् । नारायणा- येत्युपरिष्टात् । ॐ मित्येकाक्षरम् ॥ नम इति द्वे अक्षरे । नारायणायेति पञ्चाक्षराणि । एतद्वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदम् । यो ह वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदमध्येति । अनपब्रुवः सर्वमामु- रेति । विन्दते प्राजापत्यं रायस्पोषं गौपत्यं ततोऽमृतत्वमश्नुते ततोऽमृतत्वमश्नु इति । एतत्सामवेदशिरोऽधीते ॥ ३ ॥ प्रत्यगा- नन्दं ब्रह्मपुरुषं प्रणवस्वरूपम् । अकार उकारो मकार इति ।