१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५३६ ] [ नारायणोपनिषत् ता अनेकधा समभवत्तदेतदोमिति वमुक्त्वा मुच्यते योगी जन्म- संसारबन्धनात् । ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रोपासको वैकुण्ठ- भुवनं गमिष्यति । तदिदं पुण्डरीकं विज्ञानघनं तस्मात्तडिदाभ- मात्रम् । ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो मधुसूदनः । ब्रह्मण्यः पुण्डरीकाक्षो ब्रह्मण्यो विष्णुरच्युत इति । सर्वभूतस्थमेकं वै नारायणं कारणपुरुष मकारणं परं ब्रह्मोम् । एतदथर्वशिरोऽधी- ते ॥ ४॥ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायम- धीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत्सायं प्रातरधीयानो पापोऽपापो भवति । मध्यंदिनमादित्याभिमुखोऽधीयानः पञ्च- महापातकोपपातकात्प्रमुच्यते । सर्ववेदपरायणपुण्यं लभते । नारायणसायुज्यमवाप्नोति श्रीमन्नारायणसायुज्यमवाप्नोति य एवं वेद । आरम्भ में 'ॐ' का उच्चारण करना, उसके पीछे नमः उच्चारण करना, और अन्त में 'नारायणेति' का उच्चारण करना । 'ॐ' में एक अक्षर है, 'नमः' में दो अक्षर हैं, और 'नारायणेति' में पाँच अक्षर हैं। इस प्रकार यह नारायण का आठ अक्षर का मन्त्र होता है, इसका जप और ध्यान करने से मनुष्य अकालमृत्यु से बचकर पूर्ण आयु को भोगता है । उसे प्रजा ( स्त्री पुत्र आदि ), धन सम्पत्ति की और गौ आदि पशुओं की प्राप्ति होती है । अन्त में वह अमृतत्व को प्राप्त होता है । सामवेद के इस शिरोभाग का विद्वज्जन अध्ययन करते हैं । 'अ'कार, 'उ'कार और 'म'कार युक्त यह प्रत्यक् (ॐ) आनन्द रूप, ब्रह्मपुरुष रूप और प्रणव स्वरूप है । यह अनेक प्रकार से सम- मात्रा है, इसको 'ॐ' करते हैं और इसके जप से योगीजन संसार के समस्त बन्धनों और बार-बार जन्म लेने से छूट जाते हैं । 'ॐ नमो नारायणेति' इस मन्त्र की उपासना करने वाला वैकुण्ठ धाम को जाता