१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनारायणोपनिषत् [ ५३७ है। यह पुण्डरीक (हृदय रूपी कमल) विज्ञान रूप है, इससे विद्युत की आभा प्रकट होती है। ब्रह्म को ही देवकी पुत्र कहा जाता है, वे ही मधुसूदन हैं, वे ही पुण्डरीकाक्ष हैं और वे ही विष्णु तथा अच्युत हैं। सर्व प्राणी मात्र में वे ही नारायण रहते हैं, वे कारण पुकार होते हुए भी कारण रहित हैं, वे ही परब्रह्म हैं। विद्वान लोग अथर्व वेद से इस शिरोभाग (सार भाग) का अध्ययन करते हैं ॥ ४ ॥ प्रातः समय इस मन्त्र का जप करने से रात्रि में जो पाप किये हों वे सब नष्ट हो जाते हैं और इसी प्रकार सायंकाल को जप करने से दिन के पाप दूर होते हैं। इस प्रकार प्रातः और सायं इसका जप करने से मनुष्य निष्पाप हो जाता है। दिन के मध्य (दोपहर) को सूर्य के सम्मुख इसका जप करने से पंच महापातकों और उपपातकों से छुटकारा हो जाता है। उसे सब वेदों के परायण का फल प्राप्त होता है और नारायण का सायुज्य प्राप्त होता है। इस प्रकार जानने से नारायण से साक्षात्कार होता है ॥ ५ ॥ ॥ नारायणोपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—