भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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भावनोपनिषत् ] [ ३४७ धारादाब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं ब्रह्मरन्ध्रादामूलाधारपर्यन्तं गतागतरूपेण प्रादक्षिणम् । तुर्यावस्था नमस्कारः । देहशून्यप्रमातृतानिमज्जनं बलिहरणम् । सत्वमस्ति कर्तव्यमकर्तव्यमौदासीन्यनित्यात्म- विलापनं होमः । स्वयं तत्पादुका निमज्जनं परिपूर्णध्यानम् ॥३॥ सलिल तथा गुह मन्त्रात्मक देवताओं का एकीकरण रुद्र जो सत्व ही कर्तव्य है इस भावना से युक्त ही इसका उपचार है (पूजा) है । ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है, यह जो कर्तव्यता यह भी उपचार है । ब्रह्म तथा आभ्यन्तर के कारणों की रूप ग्रहण की योग्यता ही यही आवाहन है । उसका बाह्य तथा आभ्यन्तर कारणों का एक रूप विषयों का ग्रहण करना ही आसन है । केवल-कुम्भक से सुषुम्ना प्रवेश के अनन्तर मूलाधार तथा भौंहों के मध्य में स्थित प्रत्येक ओर पर-नाम के लाल तथा सफेद पदों का एकीकरण ही पाद्य है । अपने शिष्यों को यह उपदेश करना कि ब्रह्माभिन्न सदोज्वल दामोदानन्द रूप से स्थिति हमेशा करनी चाहिये यह अर्घ्य है । स्वयं स्वच्छ तथा स्वतः सिद्ध ही आचमनी है । चिद्रूप चन्द्रमयी के सर्वाङ्गों का स्मरण ही स्नान है । चिद् अग्नि स्वरूप परमात्मक शक्ति का स्फुरण ही (प्रकाशित होना) वस्त्र है । इच्छा आदि तीन शक्तियों के त्रिगुणात्मक होने से प्रत्येक के जो सत्ताईस भेद तथा इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया शक्ति स्वरूप ब्रह्मग्रन्थि मन्द्रस्स नाड़ी सुषुम्ना यही ब्रह्मसूत्र हैं । क्योंकि यही ब्रह्म की द्योतिका हैं । अपने से भिन्न वस्तु का स्मरण न करना ही आभूषण है । स्वच्छ स्वरूप जो ब्रह्म उससे भिन्न कुछ नहीं हैं यही स्मरण करना गन्ध है । सब विषयों का मन की स्थिरता से अनुसन्धान ही फूल हैं और उन्हीं को स्वीकार करना धूप है । वाय्वात्मक (वायु युक्त) योग के समय प्राण अपान की एकता से सुषुम्ना में सत्, चित्, आनन्द, उल्कारूप जो (प्रकाश है) आकाश देह है वही दीप है । अपने से भिन्न सभी विषयों में मन की गति का जाना-आना रुक जाना (न होना) ही नैवेद्य है । तीनों