१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४६ ] [ भावनोपनिषत् इच्छा, सत्त्व, रज, तम आदि ही वशिनी आदि आठ शक्तियां हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि पंच तन्मात्रायें ही पाँच पुष्पों के बाण हैं और मन ही ईख का बना धनुष है (अर्थात् मन से ये रूपादि फेंके जाते हैं।) वश में होना ही वाण है, राग (प्रेम) ही पाश (बन्धन) है, द्वेष ही अंकुश है। अव्यक्त, महत्तत्व, अहंकार, कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी आदि आन्तरिक त्रिकोण के अग्रस्थित देवता हैं। पन्द्रह तिथियों के रूप से काल के परिणाम को देखना, पन्द्रह नित्य श्रद्धानुरूप अधिदेवता हैं। उनमें (वज्रेश्वरी तथा भगमालिनी में) आद्या प्रधान कामेश्वरी हैं जो कि सत्, चित्, आनन्द घनस्वरूप हैं। तथा परमा मैंक रूपादेवता हैं ॥ १ ॥ (सारांश यह हुआ कि इन आयु के वशीकरण से रूपादि को वश में रखने से कुण्डलिनी, जीव, आत्मा आदि के ज्ञान को भली भाँति प्राप्त कर सर्वत्र एकभाव-भावना ही भावनोपनिषद है जो कि मोक्ष का खुला द्वार है ) ॥ २ ॥ सलिलं सौहित्यकारणं सत्त्वं कर्तव्यमकर्तव्यमिति भावना- युक्त उपचारः । अस्ति नास्तीति कर्तव्यता उपचारः । बाह्या- भ्यन्तःकरणानां रूपग्रहणयोग्यताऽस्त्वित्यावाहनम् । तस्य बाह्या- भ्यन्तःकरणानामेकरूपविषयग्रहणमासनम् । रक्तशुक्लपदैकीकरणं पाद्यम् । उज्ज्वलदामोदानन्दासनं दानमर्घ्यम् । स्वच्छं स्वतः- सिद्धमित्याचमनीयम् । चिच्चन्द्रमयीसर्वाङ्गस्रवणं स्नानम् । चिदग्निस্বরূপपरमानन्दशक्तिस्फुरणं वस्त्रम् । प्रत्येक सप्तविंश- तिधा भिन्नत्वेनेच्छाज्ञानक्रियाऽऽत्मब्रह्मग्रन्थिभद्रसतन्तुब्रह्मनाडी ब्रह्मसूत्रम् । स्वव्यतिरिक्तवस्तुसङ्गरहितस्मरणं विभूषणम् । स्वच्छस्वपरिपूर्णानुस्मरणं गन्धः । समस्तविषयाणां मनसः स्थैर्येणानुसंधानं कुसुमम् । तेषामेव सर्वदा स्वीकरणं धूपः । पवनावच्छिन्नोर्ध्वज्वलनसच्चिदुल्काऽऽकाशदेहो दीपः । समस्त- यातायतवर्ज्यं नैवेद्यम् । अवस्थात्रयैकीकरणं ताम्बूलम् ! मूला-