१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 553, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंभावनोपनिषत् ] [ ५४५ सर्व संक्षोभिणी पर्यन्तवर्णित महात्रिपुरसुन्दरी आदि नौ हैं। त्वचा, आदि सात धातुओं से मुक्त संकल्प-विकल्प ही कल्पवृक्ष है। उस परमात्मा से भिन्न प्रतीयमान तेज स्वरूप-सा जीव ही उद्यान है। जीभ के द्वारा आस्वादित किये जाने वाले मधुर, अम्ल, तिक्त (खट्टा, तीखा) कड़वा, कषैला और नमकीन रस छः ऋतुयें हैं। क्रिया नामक जो शक्ति वही पीठ है। कुण्डलिनी रूप ज्ञान शक्ति ही घर है। इच्छा शक्ति ही महा- त्रिपुरसुन्दरी नामक आराध्य भगवती है। जानने वाला, ही हवन करने वाला, ज्ञान ही अर्घ्य एवं जानने लायक वस्तुयें ही हविरूप (हवन करने का द्रव्य) हैं। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय को अभेद मानना ही श्रीचक्र का पूजन है। नियति (भाग्य) से मुक्त शृङ्गार, वीर, करुणा आदि नौ रस ही अणिमा, महिमा, गरिमा आदि दश सिद्धियां हैं। काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य पुण्य तथा पाप से युक्त ब्राह्मी आदि आठ शक्तियां हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, कान, त्वचा, आंख, जीभ, नाक, वाणी, हाथ, मूलमूत्रेन्द्रियां आदि विकार ही सोलह शक्तियां हैं। वाचनादान, गमन, विसर्ग, आनन्द, दान, उपादान, उपेक्षा, बुद्धि तथा अनङ्ग कुसुम आदि आठ शक्तियां हैं। आलम्बुसा, कुहू, विश्वोदरी, वरुणा, हस्तिजिह्वा, यशस्विनी, अश्विनी, गान्धारी पूषा, शंखिनी, सरस्वती, इडा, पिङ्गला, सुषुम्ना ये चौदह नाड़ियां सर्व संक्षोभिणी आदि चौदह देवतात्मक हैं। प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय ये दश वायु सर्व सिद्धिप्रद आदि बाह्यमुख दशारदेवता प्रधान हैं इन दश वायुओं के सम्पर्क एवं स्थान भेद से, रेचक, पूरक, शोषक, दाहक, प्लावक अमृत ये पांच रूप में वायु प्रधान हैं अर्थात् इन पाँच नाम से ये वायु प्रधानतया गृहीत होते हैं, तथा मनुष्यों के मोहक, तथा दाहक होते हुए चबाये जाने वाले, चाटे जाने वाले, चूसे जाने वाले तथा पिये जाने वाले इन चार प्रकार के अन्न को पकाते हैं। ये दश अग्नि की कला स्वरूप वायु ही सर्वज्ञत्व आदि अन्तर्दशारदेवतात्मक हैं। शीत, उष्ण, सुख, दुःख,