१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४८ ] [ भावनोपनिषत् अवस्थाओं का एकीकरण ही पान है । मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त तथा ब्रह्मरन्ध्र से मूलाधार बार-बार गतागत करना ( आना-जाना ) ही प्रदक्षिणा है । चतुर्था अवस्था में स्थित रहना ही नमस्कार है । देह की जड़ता में डूबना (अर्थात् आत्मा को चैतन्य मानकर देह को जड़ मानकर स्थित रहना ही ) बलि है । अपनी आत्मा सत्व स्वरूप है, यह निश्चित करके कर्तंग्य, अकर्त्तव्य, उदासीनता, नित्यात्मक, विलापन (अत्म-चिन्तना- सक्ति) ही यज्ञ (होम) है। तथा स्वयं उस परब्रह्म की पादुकाओं में डूवे रहना ही परिपूर्ण ध्यान है। सारांश यह हुआ कि जैसे पूजा के लिये धूप, दीप, गन्ध, नैवेद्य, दक्षिणा, नमस्कार, प्रदक्षिणादि आदि अपे- क्षित होती हैं वैसे ही परब्रह्म की प्राप्ति के लिये ऊपर बताई गई वस्तुओं का साधन कर लेना ही तद्तद् धूप दीप आदि हैं। इन्हीं से वह ब्रह्म दृष्टिगोचर हो जाता है ॥ ३ ॥ एवं मुहूर्त्तत्रयं भावनापरो जीवन्मुक्तो भवति । तस्य देवताऽऽत्मैक्यसिद्धिः । चिन्तितकार्याण्ययत्नेन सिध्यन्ति । एव शिवयोगीति कथ्यते ॥ ४ ॥ इस प्रकार तीन मुहूर्त भी भावना पर जो रहता है वह जीवन्मुक्त होता है । वह ब्रह्मं के स्वरूप हो जाता है, तथा चाहे हुए काम बिना यत्न के ही सिद्ध हो जाते हैं, और वही शिवयोगी कहलाता है ॥ ४ ॥ ॥ भावनोपनिषद् समाप्त ॥