१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 572 में से
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चतुर्वेदोपनिषत्
ॐ अथातो मनोपनिषदमेव तदाहुः । एको ह वै नारायण आसीत् । न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्निः न वायुः नेमे द्यावा- पृथिवी न नक्षत्राणि व सूर्यः । स एकाकी नर एव । तस्य ध्याना- न्तस्तस्थस्य ललाटात् स्वेदोऽपतत् । ता इमा आपः । ता एते नो हिरण्मयमन्नम् । तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखोऽजायत । स ध्यातपूर्वा- मुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिः गायत्रं छन्द ऋग्वेदः । पश्चिमामुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिस्त्रैष्टुभं छन्दः यजुर्वेदः । उत्तरामुखो भूत्वा भुवरिति व्याहृतिर्जगतं छन्दः सामवेदः । दक्षिणामुखो भूत्वा जनदिति व्याहृतिरानुष्टुभं छन्दोऽथर्ववेदः ॥ १ ॥
हाँ तो इसे महोपनिषत् ही कहा जाता है। सर्वप्रथम एक नारा- यण ही था। न तो ब्रह्मा ही न ईशान (शिव) ही था, और न वायु पृथ्वी, आकाश, नक्षत्र एवं सूर्य में से कोई था। वह अकेला नर ही था। ध्यान में स्थित उस नर के मस्तक से पसीना गिरा। वही यह जलराशि है। यही वह हमारे सुनहरे अन्न हैं। वही ब्रह्मा चार मुख वाला हुआ। उसने पूर्वाभिमुख होकर 'भूः' इस व्याहृति गायत्री छन्द एवं ऋग्वेद, पश्चिमा- भिमुख होकर 'भूः' इस व्याहृति त्रिष्टुप छन्द एवं यजुर्वेद, उत्तराभिमुख होकर 'भुवः' इस व्याहृति जगती छन्द तथा सामवेद, और अन्त में दक्षिणा- भिमुख होकर जनद् इस व्याहृति अनुष्टुप छन्द तथा अथर्ववेद का उच्चारण किया ॥ १ ॥
सहस्रशीर्षं देवं सहस्राक्षं विश्वसम्भवम् । विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ॥२ विश्वमेवेदं पुरुषं तं विश्वमुपजीवति । ऋषिं विश्वेश्वरं देवं समुद्रं तं विश्वरूपिणम् ॥३ पद्मकोशप्रतीकाशं लम्बत्याकोशसन्निभम् ।
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi