१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूर्योपनिषत् [ ५४१ ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म । घृणिरिति द्वे अक्षरे । सूर्य इत्यक्षरद्वयम् । आदित्य । इति त्रीण्यक्षराणि । एतस्यैव सूर्यस्याष्टाक्षरो मनुः ॥७॥ यः सदाऽहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति स वै ब्राह्मणो भवति । सूर्याभिमुखो जप्त्वा महाव्याधिभयात् प्रमुच्यते । अलक्ष्मीर्नश्यति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति । अगम्यागमनात् पूतो भवति । पतितसंभाषणात् पूतो भवति । असत्संभाषणात् पूतो भवति । मध्याह्ने सूर्याभिमुखः पठेत् । सद्योत्पन्नपञ्चमहा- पातकात् प्रमुच्यते । सैषा सावित्री विद्यां (द्या) न किंचिदपि न कस्मैचित् प्रशंसयेत् । य एतां महाभागः प्रातः पठति स भाग्यवान् जायते । पशून् विन्दति । वेदार्थं लभते । त्रिकाल- मेतज्जप्त्वा ऋतुशतफलमवाप्नोति । हस्तादित्ये जपति स महामृत्युं तरति स महामृत्युं तरति य एवं वेद । इत्युपनिषत् ।८। मित्र देवता और भगवान् सूर्य को नमस्कार है। भगवन् ! मृत्यु से मेरी रक्षा करो ! विश्व के कारण रूप एवं तेजस्वी सूर्य को नमस्कार है । सूर्य से ही सब चराचर प्राणियों की उत्पत्ति है । वे ही उनका पालन करते हैं तथा अन्त में सब जीव उन्हीं में लीन हो जाते हैं। जो सूर्य हैं, वही मैं हूँ। सविता देव हमारे चक्षु हैं। सब के धारण करने वाले सूर्य हमारे नेत्रों को देखने की शक्ति प्रदान करने वाले बनें । 'हम आदित्य को जानते हैं। इस सहस्ररश्मि वाले भगवान् भास्कर का ध्यान करते हैं। वे सूर्य हमें प्रेरणा दें।' पीछे-आगे, इधर-उधर सब ओर सविता देव हैं । वे सविता देव हमारे निमित्त सब कुछ उत्पन्न करें। वे हमें दीर्घायु दें। ॐ रूप एकाक्षर मन्त्र ब्रह्म है। 'घृणि' और 'सूर्य' दो-दो अक्षरों के मन्त्र हैं। 'आदित्य' में तीन अक्षर हैं। इन सब के योग से सूर्य नारायण का अष्टाक्षर महामन्त्र हो जाता है ॥ ७ ॥ इस