भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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५५४ ] [ चाक्षुषोपनिषत् जो भगवान् सूर्य सच्चिदानन्द रूप हैं तथा यह विश्व जिनका रूप है, जो सबके जानने वाले अपनी किरणों से सुशोभित हैं, जो ज्योति स्वरूप, हिरण्यमय, जगत के उत्पत्ति स्थान, पुरुष रूप में तपने वाले हैं, उन प्रचण्ड तेज वाले सूर्य नारायण को हम नमस्कार करते हैं । यह भगवान् सूर्य सम्पूर्ण प्राणियों के सामने प्रत्यक्ष उदय को प्राप्त हो रहे हैं । छः प्रकार के ऐश्वर्यों से सम्पन्न भगवान् सूर्य को नमस्कार है । उनकी प्रभा दिवस की भारवाहिनी है । हम उन सूर्य भगवान् के लिए श्रेष्ठ आहुतियाँ देते हैं । जिन्हें मेधा से अत्यन्त प्रेम है वे ऋषिगण श्रेष्ठ पंखों वाले पक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के समीप जाकर निवेदन करने लगे—‘भगवन् ! इस अन्धकार को दूर करो । हमारे नेत्रों को प्रकाशमय करो । हम सब प्राणी तमोमय बन्धन में पड़े हुए-से हैं, हमें अपना दिव्य प्रकाश प्रदान कर मुक्त करो । पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार ! पुष्करेक्षण को नमस्कार । अमलेक्षण को नमस्कार । कमलेक्षण को नमस्कार । विश्व स्वरूप को नमस्कार । भगवान् महाविष्णु को नमस्कार । :! चाक्षुषोपनिषद् समाप्त ॥