भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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कलिसंतरणोपनिषत्

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, हम दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शांति, शांति, शांति । हरिः ओ३म् द्वापरान्ते नारदो ब्रह्माणं जगाम कथं भगवन् गां पर्यटन्कलि संतरेमिति । स होवाच ब्रह्मा साधु पृष्टोऽस्मि सर्वश्रुतिरहस्यं गोप्यं तच्छृणु येन कलिसंसारं तरिष्यसि । भग- वत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलि- र्भवति । नारदः पुनः पप्रच्छ तन्नाम किमिति । स होवाच हिर- ण्यगर्भः । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । द्वापर युग के अन्त की बात है। नारद मुनि ब्रह्माजी के पास जाकर बोले—'प्रभु ! भूलोक में घूमता हुआ किस तरह से कलि काल से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकता हूं। ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और बोले— "वत्स ! आज तुमने अत्यन्त प्रिय बात पूछी है। समस्त वेद, मन्त्रों का गुप्त रहस्य मैं तुझे बताता हूं। कलि के दोषों को नाश करने का उपाय भगवान आदिपुरुष नारायण के पवित्र नाम का उच्चारण करना है। नारदजी ने वह नाम पूछा, जिस पर ब्रह्माजी ने कहा— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi