१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें५५६ कलिसंतरणोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम् । नातः परत रोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते । इति षोडशकलाऽवृतस्य जीव- स्यावरणविनाशनम् । ततः प्रकाशते । परं ब्रह्म मेघापाये रवि- रश्मिमण्डलीवेति । पुनर्नारदः पप्रच्छ भगवन्कोऽस्य विधिरिति । तं होवाच नास्व विधिरिति । सर्वदा शुचिरशुचिर्वा पठन्ब्राह्मणः सलोकतां समीपतां सरूपतां सायुज्यतामेति । यदास्य षोडशीकस्य सार्धत्रिकोटीर्जपति तदा ब्रह्महत्यां तरति । तरति वीरहत्याम् । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । पितृदेवमनुष्याणामपकारात्पूतो भवति सर्वधर्मपरित्यागपापात्सद्यः शुचितामाप्नुयात् । सद्यो मुच्यते सद्यो मुच्यते इत्युपनिषत् ॥ हरिः ओ३म् तत्सत् ॥ कलि के पापों को यह सोलह नाम नाश करते हैं । वेद शास्त्रों में भी इससे अच्छा उपाय दिखाई नहीं देता । इसकी सहायता से सोलह कलाओं से सम्पन्न जीव के पर्दे कट जाते हैं, तभी उस परब्रह्म का वास्तविक स्वरूप साफ-साफ भासने लगता है, जैसे बादल के चले जाने पर सूर्य की किरणों का प्रकाश आ जाता है । इस पर नारदजीं ने जप की विधि पूछी । ब्रह्माजी ने उत्तर देते हुए कहा कि इसकी कोई विशेष विधि नहीं है । पवित्र या अपवित्र जिस हालत में हो इसका जप किया जा सकता है । इसके जप करने से चारों प्रकार की ( सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य ) मुक्ति प्राप्त होती है । साधक इस मन्त्र के साढ़े तीन करोड़ जप के पश्चात् ब्रह्महत्या के कोष से निवृत्त हो जाता है । वह वीरहत्या के दोष से छूट जाता है । सोने की चोरी के दोष से मुक्त हो जाता है । मनुष्य, देवता और पिता के प्रति किए गए अपकार के पाप से भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है । सब धर्मों को छोड़ने के दोष से तुरन्त ही छूट जाता है, शीघ्र ही निवृत्त हो जाता है, शीघ्र ही निवृत्त हो जाता है—यह उपनिषद् है । ॥ कलिसंतरणोपनिषद् समाप्त ॥ ॥ १०८ उपनिषद् का साधना खण्ड समाप्त ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi