भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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इस मन्त्र की सिद्धि द्वारा 'मृत्यु पर विजय प्राप्त करली। वे सब पापों से मुक्त हो गये और संसार रूपी समुद्र को भी लांघ गये। अतः जो मनुष्य मृत्यु, पाप और भवसागर से भय मानता हो, वह इस नृसिंह मन्त्र की शरण ग्रहण करे।" —नृसिंहपूर्वतापनोपनिषद् "प्रजापति ब्रह्मा ने कहा—प्रणव, यजुर्लक्ष्मी, गायत्री और नृसिंह गायत्री ये सब मन्त्रराज के अङ्गभूत मंत्र हैं। इनका ज्ञाता ऐश्वर्य प्राप्ति के साथ ही अन्त में अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।" —नृसिंहपूर्व तापनीयोपनिषद् "जो व्यक्ति नृसिंह मन्त्र का नित्य प्रति जप करता है, वह अग्नि की गति रोकने में भी समर्थ होता है वह वायु की भी गति रोक देता है। सूर्य चन्द्रमा की गति तथा जल के प्रवाह को रोक देता है। वह सब ग्रहों की गति रोक सकता है, सब देवताओं को स्तंभित कर सकता है तथा विष का भी स्तंभन कर सकता है।······सब देवताओं, यज्ञों तथा नागों को आकर्षित कर लेता है। मनुष्य भी उसकी ओर खिंचते हैं तथा सभी उससे आकर्षित रहते हैं।" —नृसिंहपूर्व तापनीयोपनिषद् नृसिंह सबका कल्याण करने वाले हैं। ये ही विष्णु हैं। ये ही सर्वतोमुख हैं। ये ही उग्र वीर एवं तुरीय हैं। ये ही महान् ज्वलन और भीषण हैं। ये ही कल्याण स्वरूप हैं तथा ये ही मृत्यु के लिये भी मृत्यु हैं। ये ही 'नमामि' पद के लक्ष्यार्थ तथा अहम्' पद के आश्रयभूत हैं—······'महान् ज्वलन्, उग्र, वीर, भीषण,सर्वतोमुख, कल्याणमय नृसिंह रूप यह