भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ५८ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सृष्टि में अनेकों प्रक्रयाएँ चलती हैं। उनकी संचालक शक्तियां भी अनेक हैं। यद्यपि वे सभी परमात्मा की ही शक्तियाँ हैं पर उनकी गतिविधियों की प्रथकता के अनुरूप उनके नामकरण अलग-अलग किये गये हैं। सूर्य एक ही है पर उसकी अनेक किरणें अपने गुण धर्म की प्रथकता के कारण अल्टा वायलेट, अल्फा वायलेट, एक्सरेज़ आदि अनेक नामों से पुकारी जाती हैं। मनुष्य शरीर एक ही है पर उसके विभिन्न अंगों का उपयोग और स्वरूप भिन्न-भिन्न होने के कारण उन अंगों के नाम भी पृथक-पृथक हैं। शरीर को जो कार्य करना होता है वह अपने तदनुकूल अंग से ही उसे पूरा कराता है। ईश्वर के विराट स्वरूप से अंग प्रत्यंगों को उसकी क्रिया- किरणों को देवता नाम से पुकारते हैं। यह देवता अपने- अपने कार्य क्षेत्र में उसी प्रकार संलग्न रहते हैं जिस प्रकार किसी सरकार के अनेक मन्त्री एवम् अफसर अपने अपने विभाग को संभालते हुये राजतन्त्र का संचालन करते हैं। देवताओं की सत्ता पृथक से दृष्टिगोचर होते हुये भी वे वस्तुतः एक ही विराट ब्रह्म के अवयव मात्र हैं। उनका स्वतन्त्र अस्तित्व भासता तो है पर है नहीं। लहरें और बबूले जल के ही अंग हैं। विविध देवताओं का जहाँ स्वरूप और गुण धर्म शास्त्रकारों ने वर्णन किया है वहां यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे सब वस्तुतः एक ही परमात्मा के अंग-प्रत्यंगमात्र हैं। कहा गया है कि :— एकं सद्विप्रा बहुता वदन्ति —ऋग्वेद ६।३।२२।४६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi