भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ५७ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri “जो कवित्व, भोग, निर्भयता अथवा मोक्ष की इच्छा करता हो वह इन मन्त्रों के द्वारा भगवती सरस्वती की भक्तिपूर्वक पूजा स्तुति करे। भक्ति और श्रद्धा सहित विधिपूर्वक पूजा करने वाला, नित्य स्तुति करने वाला भगवती की कृपा शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है। वह दूसरों से सुने बिना भी ग्रन्थों के अर्थों को समझने वाला होता है।” —सरस्वती रहस्योपनिषद् “इस सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् की साधना से साधक अग्निपूत और वायुपूत होता है। वह सब धन-धान्य, स्त्री, पुत्र, हाथी, अश्व, गौ, भैंस, सेवक आदि ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर ज्ञानी बनता है और अन्त में परम पद को प्राप्त करता है।” —सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् “सर्वाङ्ग सुन्दरी त्रिपुरा देवी का देह रूप गुहा में स्थित काम, रूप, कला का ध्यान करके मनुष्य काम रूप हो जाता है और कामनाएँ पूर्ण करता है। इस कामोपभोग संस्कारों से फिर जन्म धारण करने पड़ते हैं। अतः मोक्ष के इच्छुकों को यह कामो- उपासना नहीं करनी चाहिये।” --त्रिपुरोपनिषद् ——— देवता और उनकी सिद्धि साधना इस सृष्टि का उत्पादक, पोषक, संहारक, कर्ता-हर्ता—एक परमात्मा ही है। उसे ही अनेक नाम से पुकारते हैं। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ती” उस एक ही सत् परमात्मा को विद्वानों ने बहुत प्रकार से कहा है। Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi