१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७० ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आश्रय में रहता है । स्वाधिष्ठान के आश्रय में होने से उसे मेढ्र भी कहा जाता है । यही तागे में पिरोए हुये मणि के समान सुषुम्ना-नाड़ी का केन्द्र है ॥१२॥ नाभि-मण्डल में रहने वाला यह चक्र मणिपूरक कहा जाता है । इस बारह दल वाले और पाप-पुण्य से रहित चक्र में जब तक जीव तत्त्वज्ञान नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक उसे संसार में भ्रमण ही करना पड़ता है । मेढ्र से ऊपर और नाभि के नीचे वाले केन्द्र में पक्षी के अण्डे की आकार वाली योनि है । उसी स्थान से बहत्तर हजार नाड़ियां उत्पन्न हुई हैं, जिनमें से बहत्तर प्रधान कही गई हैं ॥१३—१५॥ प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तासु दश स्मृताः । इडा च पिंगला चैव सुषुम्ना च तृतीयगा ॥१५॥ गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी । अलम्बुसा कुहूश्चैव शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥१६॥ एतन्नाडीमहाचक्रं ज्ञातव्यं योगिभिः सदा । इडा वामे स्थिता भागे दक्षिणे पिङ्गला स्थिता ॥१८॥ सुषुम्ना मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि । दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे तु दक्षिणे ॥१६॥ यशस्विनी वामकर्णे चानने चाप्यलम्बुसा । कुहूश्च लिङ्गदेशे तु मूलस्थाने तु शङ्खिनी ॥२०॥ इनमें से भी दश प्राण वाहिनी नाड़ियाँ मुख्य मानी गई हैं— इडा, पिंगला और तीसरी सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्व।, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू और शंखिनी दसवीं है ॥१५—१७॥ नाडियों का यह महाचक्र योगियों के लिये सदैव ज्ञातव्य है । इनमें इडा बायीं तरफ और पिंगला दाहिनी तरफ रहती है । इन दोनों के मध्य में सुषुम्ना का स्थान है । गान्धारी बांएॅ नेत्र में, हस्तिजिह्व। बायें नेत्र में रहती है । पूषा दायें कान में और यशस्विनी बाँयें कान में Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi