भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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रहती है । अलम्बुसा मुख में कुहू लिगेन्द्रो में तथा शङ्खिनी मूल स्थान में है ॥ १८—२० ॥ एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ते नाडयः क्रमात् । इडापिङ्गलसौषुम्नाः प्राणमार्गे च संस्थिताः ॥२१॥ सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः । प्राणापानसमानाख्या व्यानोदानौ च वायवः ॥२२॥ नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनंजयः । हृदि प्राणः स्थिती नित्यमपानो गुदमण्डले ॥२३॥ समानो नाभि देशे तु उदानः कण्ठमध्यगः । व्यानः सर्वशरीरे तु प्रधानाः पञ्च वायवः ॥२४॥ उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने तथा । कृकरः क्षुत्करो ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ॥२५॥ इस प्रकार क्रम से शरीर के विभिन्न द्वारों में एक-एक करके समस्त नाड़ियाँ स्थित हैं और इडा, पिंगला, सुषुम्ना प्राण-मार्ग में स्थित रहती है ॥२१॥ सोम ( चन्द्र ) सूर्य और अग्नि देवता प्राण को सदैव गतिमान रखते हैं । प्राण, अपान, समान व्यान, उदान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय से वायु तथा उपवायु हैं । इनमें प्राण, वायु हृदय में स्थित रहता है और अपान गुदा स्थान में । समान नाभि देश में, उदान कण्ठ में, व्यान सर्व शरीर में—ये पाँचों प्रधान वायु हैं ॥२२—२४॥ उद्गार (डकार) में नाग, उन्मीलन (पलक बन्द करना) में कूर्म, छींकने में कृकर, जँभाई लेने में देवदत्त को जानना चाहिये ॥२५॥ न जहाति मृतं वापि सर्वव्यापी धनंजय । एते नाडीषु सर्वासु भ्रमन्ते जीवजन्तवः ॥२६॥ आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलित कन्दुकः । प्राणापानसमाक्षिप्तस्तया जीवो न तिष्ठति ॥२७॥