१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयोगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ७५ महामुद्रा नभोमुद्रा ओड्ड्याणं च जलन्धरम् । मूलबन्धं च यो वेत्ति स योगी मुक्तिभाजनम् ॥४५ इस अभ्यास में श्रम होने से जो पसीना निकले उसको शरीर में ही मर्दन कर लेना चाहिये, भोजन में कटु, खट्टे, नमकीन पदार्थों का त्याग करके दूध का आहार विशेष रूप से करना उचित है ॥४१॥ जो योगी ब्रह्मचारी, मिताहार करने वाला और योग-परायण होगा, वह एक वर्ष में सिद्धि प्राप्त कर सकेगा इसमें सन्देह नहीं ॥४२॥ उसे स्निग्ध और मधुर आहार करना चाहिये और उदर का चौथाई भाग खाली रखना चाहिये । जो भगवान का ध्यान रखते हुये भोजन करता है वह मिताहारी कहा जाता है ॥४३॥ कन्द के ऊर्ध्वभाग में जो आठ कुण्डलों युक्त कुण्डलिनी शक्ति है वह मूढ़ जनों के लिये बन्धन रूप और योगियों के लिए सदैव मोक्ष प्रदायिका है ॥४४॥ जो योगि महा मुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डियाण, जलंधर-बन्ध और मूलबन्ध को जानता है वह मुक्तिभाजन होता है ॥४५॥ पाष्णिघातेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्दृढम् । अपानमूर्ध्व माकृष्य मूलबन्धो यमच्यते ॥४६ अपानप्राणयोरैक्यं क्षयान्मूत्रपुरीषयोः । युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात् ॥४७ ओड्ड्याणं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः । ओड्ड्याणं तदेव स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ॥४८ उदरात्पश्चिमं ताणमधोनाभिर्निगद्यते । ओड्याणमुदरे बन्धस्तत्र बन्धो विधीयते ॥४९ बध्नाति हि शिरोजातमधोगामि नभोजलम् । ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः ॥५०