भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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७६ ] [ योगचूडामणि उपनिषद् ऐड़ी से दृढ़तापूर्वक दबाकर योनि स्थान को दृढ़ रूप से संकुचित करे तथा अपान वायु को ऊपर की तरफ आकर्षित करे तो यह मूलबन्ध कहलाता है ॥४६॥ इससे अपान और प्राण-वायु एक हो जाते हैं और मूत्र तथा मल घट जाता है। जो व्यक्ति सदैव इस बन्ध का अभ्यास करता है वह वृद्ध होने पर भी युवा हो जाता है ॥४७॥ जिस प्रकार एक महापक्षी विश्रान्ति के लिए उड्डियाण करता है, उसी प्रकार उड्डियाण अभ्यास मृत्यु रूपी हाथी के लिये सिंह के समान ही है ॥४८॥ उदर से नाभि के नीचे तानना पश्चिमतान कहा जाता है। उड्डियाण बन्ध भी उदर में होता है ओर इसको वहीं किया जाता है ॥४६॥ जो नीचे की तरफ जाने वाले आकाश और जलतत्व को शिर में ही स्थिर रखता है, ऐसा जालन्धर बंध दुःख और कष्ट समूह का नाश करने वाला है ॥५०॥ जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठ दुःखौघनाशने । न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रधावति ॥५१ कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा । भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥५२ न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा । न च मूर्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥५३ पीड्यते न च रोगेण लिप्यते न स कर्मभिः । बध्यते न च केनापि यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥५४ चितं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे यतः । तेनेयं खेचरी मुद्रा सर्वसिद्धनमस्कृता ॥५५ जालन्धर बन्ध के करने में जो कंठ का संकोचन किया जाता है, उससे अमृत अग्नि में नहीं पड़ता और वायु भी नहीं दौड़ता (अर्थात् स्थिर हो जाता है ) ॥५१॥ जिह्वा को लौटकर कपाल Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi