भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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योगचूडामणि उपनिषत् [ ८७ रेचक, पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः । प्राणायामो भवेदेवं मात्राद्वादशसंयुक्तः ॥१०१॥ मात्राद्वादशसंयुक्तौ निशाकरदिवाकरौ । दोषाजालमबध्नन्तौ ज्ञातव्यौ योगिभि सदा ॥१०२॥ पूरकं द्वादशं कुर्यात्कुम्भकं षोडषं भवेत् । रेचकं दश चोंकारः प्राणायामः स उच्यते ॥१०३॥ प्रधमे द्वादशा मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता । उत्त मे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णयः ॥१०४॥ अधमे स्वेदजननं कम्पो भवति मध्यमे । उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायुं निरुन्धयेत् ॥१०५॥ रेचक, पूरक और कुम्भक ये प्रणव स्वरूप हैं, इस प्रकार का प्राणायाम द्वादश मात्रा में करना ॥ १०१ ॥ यह द्वादश मात्रा संयुक्त सूर्य और चन्द्र का प्राणायाम समस्त दोषों का नाश करने वाला है ॥ १०२ ॥ बारह मात्रा का पूरक करके सोलह मात्रा का कुम्भक करना चाहिए तब फिर दस मात्रा रेचक करना—यह ओंकार प्राणायाम कहा जाता है ॥ १०३ ॥ द्वादश मात्रा का प्राणायाम हलका है, इससे दुगुनी मात्रा वाला मध्यम है और तिगुनी मात्रा वाला उत्तम कहा जाता है ॥ १०४ ॥ हलके प्राणायाम से पसीना आता है, मध्यम से कम्पन उत्पन्न होता है, उत्तम में आसन से उठता जान पड़ता है, इस प्रकार वायु का निरोध करना चाहिये ॥ १०५ ॥ बद्धपद्मासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम्, नासाग्रदृष्टिरेकाकी प्राणायामं समभ्यसेत् ॥१०६॥ द्वाराणां नव संनिरुध्य मरुतं बद्ध्वा दृढां धारणां नीत्वा कालमपानवह्निहतं शक्त्या समं चालितम् ।