भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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८८ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आत्मध्यानयुतस्त्वनेन विधिना विन्यस्य मूर्ध्नि स्थिरं । यावत्तिष्ठति तावदेव महतां संगो न संस्तूयते ॥१०७॥ प्राणायामो भवेदेवं पातकेन्धनपावकः । भवोदधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभि सदा ॥१०८॥ आसनेन रुजं हन्ति प्राणायामेन पातकम् । विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण मुञ्चति ॥१०६॥ धारणाभिर्मनोधैर्यं याति चैतन्यमद्भुतम् । समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम् ॥११०॥ बद्ध पद्मासन पर बैठकर शिवरूपी गुरु को नमस्कार करना चाहिये फिर नासाग्र पर दृष्टि रखकर एकाकी प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये ॥ १०६ ॥ नवों द्वारों को रोक वायु को बाँध कर दृढ़तापूर्वक शक्तिचालन करके अपान और अग्नि सहित कुण्डलिनी को ऊपर ले जाय ओर आत्म ध्यानपूर्वक उसे मस्तक में स्थिर करे, जब तक यह स्थिर रहे तब तक श्रेष्ठ है ॥ १०७ ॥ ऐसा प्राणायाम पाप रूपी ईंधन के लिये अग्नि स्वरूप है और संसार सागर से पार होने के लिए सेतु के समान है ॥ १०८ ॥ आसन से रोगों का नाश होता है और प्राणायाम से पापों का । योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हों जाते हैं ॥ १०६ ॥ धारणा से मन में धैर्य आता है, समाधि द्वारा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है और इस प्रकार शुभाशुभ कर्मों का नाश होकर मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ११० ॥ प्राणायामद्विषट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः । प्रत्याहारद्विषट्केन जायते धारणा शुभा ॥१११॥ धारणा द्वादश प्रोक्तं ध्यानं योगविशारदैः । ध्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते ॥११२॥ समाधौ परमं ज्योतिरनन्त विश्वतोमुखम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi