भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ८१ तस्मिन्दृष्टे क्रियाकर्म यातातो न विद्यते ॥११३ संबद्धाऽऽसनमेढ्रमङ् घ्रियुगलं कर्णाक्षिनासापुट- द्वारानङ् गुलिभिर्नियम्य पवनं वक्रे ण वा पूरितम् । बद्ध वा वक्षसि बह्नपानसहितं मूर्ध्नि स्थितं धारये- देवं याति विशेषतत्त्वसमतां योगीश्वरस्तन्मनाः ॥११४ गगनं पवने प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान् । घण्टाऽऽदीनां प्रवाद्याना नादसिद्धिरुदीरिता ॥११५ प्राणायाम के द्वादश बार के अभ्यास से प्रत्याहार होता है और बारह प्रत्याहार का अभ्यास करने से शुभ धारणा उत्पन्न होती है। बारह धारणा को ध्यान कहा गया है और बारह ध्यान से समाधि कहलाती है ॥ ११२ ॥ समाधि होने पर जो परम ज्योति अनन्त और विश्वतोमुख का भाव होता है उससे क्रिया, कर्म और आवागमन से छूट जाता है ॥ ११३ ॥ आसन पर बैठकर दोनों चरणों को मेढ़ स्थान में लगाकर, कान, आंख और नाक के द्वारों को अंगुलियों से बन्द करके, वायु को मुख द्वारा खींचकर भीतर ले जाय । उसे अपान के साथ मिलाकर छाती में रोके फिर मस्तक में स्थिर करे, इस प्रकार उसमें मन को संलग्न करके योगीजन समभाव के विशेष तत्व को प्राप्त करते हैं ॥ ११४ ॥ आकाश मण्डल में पवन के जाने से महान ध्वनि ( नाद ) सुनाई देने लगती है, घण्टा आदि का शब्द सुनने में आता है और नाद-सिद्धि होती है ॥ ११५ ॥ प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत् । प्राणायामवियुक्तेभ्यः सर्वरोगसमुद्भवः ॥११६ हिक्का कासस्तथा श्वासः शिरः कर्णाक्षिवेदना । भवन्ति विविधा रोगाः पवनव्यत्ययक्रमात् ॥११७ यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः ।