भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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६० ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ॥११८ युक्तं युक्तं त्यजेद्वायुं युक्तं युक्तं प्रपूरयेत् । युक्तं युक्तं प्रबध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ॥११९ चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् । तत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते ॥१२० यथा तृतीयकाले तु रविः प्रत्याहरेत्प्रभाम् । तृतीयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं हरेत् ॥१२१ इत्युपनिषत् ॥ प्राणायाम का अभ्यास होने से सब रोग दूर हो जाते हैं और प्राणायाम से रहित होने से सब रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ११६ ॥ हिचकी, खांसी, श्वास, सिर, कान और आंख की पीड़ा आदि विविध प्रकार के रोगों का कारण वायु का विकार ही होता है ॥ ११७ ॥ जिस प्रकार सिंह, हाथी, व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में किया जाता है उसी प्रकार वायु को भी क्रमशः वश में करना चाहिये, अन्यथा वह साधक का नाश कर देता है ॥ ११८ ॥ वायु को युक्तिपूर्वक ही बाहर निकालना चाहिये और युक्तिपूर्वक ही भीतर लेना चाहिये और युक्ति से ही रोकना चाहिये, तभी सिद्धि मिलती है ॥ ११९ ॥ चक्षु आदि इन्द्रियां जो विषयों की तरफ चलती हैं उस को रोकना प्रत्याहार है ॥ १२० ॥ जिस प्रकार तीसरे प्रहर में सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है, उसी प्रकार योगी तीसरे अङ्ग में स्थिर होकर मन के विकारों का शमन करे, यह उपनिषद् है ॥ १२१ ॥ ॥ योगचूड़ामणि उपनिषद् समाप्त ॥ ―――― Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi