भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

से मेरठ का आकाश भयानक हो उठा। विद्रोह प्रारंभ होते ही पूर्व संकेतों के अनुसार मेरठ से दिल्ली की ओर जानेवाली तार तोड़ डाली गई और उस रास्ते पर अपना कड़ा पहरा बैठा दिया। वह अंधियारी रात होने से अंग्रेजों को बड़ी आफत हुई। कोई तबेले में छुपा तो कोई सारी रात पेड़ के नीचे बैठा रहा-कोई घर की तीसरी मंजिल पर तो कोई जमीन के गड़ढे में। किसी ने किसान का वेश बनाया तो कोई बटलर के पांव पकड़े रहा। विद्रोही सिपाही अंधियारी होते ही दिल्ली की ओर कूच करने लगे थे; परंतु उनके प्रतिशोध का अधूरा काम मेरठ के लोगों ने स्वयं ही पूरा किया। अंग्रेजों के लिए इतना गुस्सा उत्पन्न हुआ था कि अंग्रेजों के स्पर्श होने से जो घर जलाने लायक हो गए थे, पर पत्थर के हाने से जलाए नहीं जा सकते थे, उन्हें चूर-चूर कर दिया गया। वहां के कमिश्नर ग्रीडेड के बंगले को आग लगा दी गई, फिर वह वह अंदर ही छिपा बैठा रहा। यह बात बाहर ज्ञात हुई तो मेरठ के लोग सशस्त्र होकर कर्कश गर्जना करते इकट्ठा हो गए। त बवह कमिश्नर अपने बटलर के पांव पड़ने लगा और पैरों के नीचे फैली आग और चारों ओर शत्रुओं का घेराव, मृत्यु के ऐसे जबड़े से अपने परिवार को बचाने के लिए उसकी चिरौरी करने लगा। वह बटलर उस पर द्रवित हो गया और क्रांतिकारियों से बोला, "कमिश्नर घर में नहीं है" और जहां वह छिपा था उसकी विपरीत दिशा में चलने का आग्रह करते हुए उन्हें दूर तक ले गया। इतने में वह कमिश्नर गिरते घर से भाग गया। मिसेज चैबर्स के बंगले में विद्रोहियों ने उसे छुरा भोंककर, खींच-घसीटकर फेंक दिया। कैप्टन क्रेजी ने अपनी पत्नी और बच्चों का गोरा रंग छिपाने के लिए उन्हें घोड़े की जीन पहनने को दी और उन्हें काले रंग से रंगकर एक मंदिर के खंडहर में रात भर छिपाके रखा। डॉक्टर ख्रिस्टे और व्हेटरनरी सर्जन फिलिप्स को पत्थरों से कुचलकर मारा गया। लेफ्टिनेंट हेंडरसन और लेफ्टिनेंट पेंट का पीछा कर उन्हें गारद कर दिया गया। घरों में आग लगाने से कितने ही औरत-बच्चें जल मरे। जैसे-जैसे अंग्रेजी रक्त अधिकाधिक गिरता गया वैसे-वैसे विद्रोहियों की कर्कश गर्जना और भयानक अट्टाहस का उत्साह बढ़ने लगा। रास्तों में पड़े अंग्रेजों के शवों को लोग लतियाने लगे। बीच में किसी विद्रोही को गोरे लोगों पर वार करते किंचित् दया आ जाती तो अन्य हजारों लोग 'मारो फिरंगी को' कहते-चिल्लाते-दौड़ते आते और कारावास में डाले गए उन पचासी निरपराध धर्मवीरों में से एकाध वहां होता तो उसके हाथ पर चढ़ाई गई फिरंगी बेड़ी के निशान की ओर अंगुली दिखाकर-'इसका प्रतिशोध लेना है' कहते हुए वार-पर-वार करने लगते।⁴⁷

वास्तविकता यह थी कि यदि कहीं पहले विद्रोह खड़ा होने की संभावना नहीं थी तो वह मेरठ में; क्योंकि वहां नेटिव सिपाहियों की दो पैदल रेजिमेंट और एक

1857 का स्वातंत्र्य समर – 105

⁴⁷ एक हिंदू द्वारा लिखित 'विद्रोह के कारण'।