भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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इधर सिपाहियों के बीच बहस चल रही थी कि पूरा कत्लेआम करना है या नहीं। 20वीं पलटन और तीसरी घुड़सवार पलटन के सिपाही बोले, "चर्च में फिरंगियों के जाते ही 'हर-हर महादेव" बोलो। और लश्करी ओर मुलुकी, सैनिक और नागरिक बच्चे-औरतें-मर्द-जो मिले उसे काटते दिल्ली चलो।" यहीं अंत में तय हुआ। इधर मेरठ में पास-पड़ोस के गांवों से भी टूटे-टाटे शस्त्र हाथ में लिये हजारों लोग आकर मिल रहे थे। स्वदेश-कार्य के लिए आए उन ग्रामीणों की तरह मेरठ के नागरिक भी सज्जत होने लगे। फिर भी अंग्रेजों को तिनके भर जानकारी नहीं थी। रविवार की शाम के पांच बजे चर्च का घंटा उस शांत वातावरण में हल्के-हलके बजने लगा और अंग्रेज लोग अपनी-अपनी पत्नियों सहित हंसते-खेलते चर्च की ओर जाने लगे। परंतु उस दिन का चर्च का घंटा अंग्रेजों के लिए प्रार्थना नहीं बजा रहा था-वह तो उनकी मृत्यु वेला बजा रहा था। क्योंकि उधर सिपाहियों की लाइन में एक ही गर्जना उठ रही थी-'मारो फिरंगी को'। इस ध्वनि से सारा वातावरण भर गया। सबसे पहले कारावास में पड़े धर्मवीरों की बेड़ियां तोड़ने सैकड़ों घुड़सवार उधर गए। उस कारावास के रक्षक भी क्रांतिपक्ष के ही थे, अतः 'मारो फिरंगी की' की रण-ध्यानि सुनते ही वे कारागृह छोड़कर अपने साथियों से मिल गए। दूसरे ही क्षण उस अभागे कारागृह की दीवारें ढहने लगीं। दस वर्ष कठोर कारावास भोगने के लिए फिरंगियों द्वारा पहनाई गई बेंडियां थर-थर कांपने लगी। एक देशभिमानी लुहार आगे आया और उसने जल्द ही उन बेड़ियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। प्रचंड वीर गर्जना करते वे कारावास भोग रहे धर्मवीर बाहर आए, घोड़ों पर चढ़े और अपनी मुक्ति के लिए आए देशबंधुओं के साथ उस कारावास को पीछे छोड़ चर्च की ओर पूरे जोश से दौड़े। इधर पैदल टुकड़ी ने दंगा शुरू कर दिया। ग्यारह पलटनों का कर्नल फिनीस अपने घोड़े पर बैठ यों ही उधर आया था। सिपाहियों के सामने खड़ा होकर हमेशा की अकड़ के साथ उन्हें डांटने-डपटने लगा तो सिपाही उसका काल बन उस पदा दौड़ पड़े। 20वीं पलटन के एक सिपाही ने अपनी पिस्तौल उस पर चलाई और वह कर्नल अपने घोड़े के साथ भूमि पर गिर गया। पैदल और घुड़सवार, हिंदू और मुसलमान सारे-के-सारे गोरे रक्त के लिए इतने बेचैन हो गए थे कि यह फिनीस का रक्त तो दरिया में खसखस थी। मेरठ के बाजार में यह समाचार पहुंचते ही वह पूरा शहर जलने लगा और जहां-जहां भी अंग्रेज मिला वहां-वहां उसे गारद किया गया। सदर बाजार के सारे लोग हाथ में तलवारें, भाले, लाठियां, छुरियां-जो जिसके हाथ में लगा वह शस्त्र लेकर गली-गली में दौड़ने लगे। जिस किसी भवन पर अंग्रेजी सत्ता के चिह्न थे वे सारे भवन, बंगले, कार्यालय सब आग में जलने लगे। आकाश में धुएं के बादल, अग्नि, अग्नि की रंग-बिरंगी ज्वालाएं हजारों लोगों के हल्ले-गुल्ले की मिली-जुली आवाजें और सबसे ऊंची आवाज-मारों फिरंगी को- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 104