भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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कारावास की ओर चल दिए। उस समय अपने धर्म की रक्षा के लिए कारावास में जा रहे उन सिपाहियों को स्वदेश बंधुओं ने कैसे नेत्र संकेत किए, यह भविष्य शीघ्र ही कहेगा। गाय और सूअर के रक्त से बने कारतूस अपने पर जबरन लादे जाएं और उसे कोई रोके तो उसे दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड भुगतना पड़े, ऐसा भयंकर अपराध जिस दासता में होता है, उस फिरंगी दासता का हम टेंटुआ दबाएंगे और दस वर्ष के लिए तुम्हें पहनाई गई बेड़ियां और सौ वर्षों से अपनी मातृभूमि के पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियां इन दोनों को जल्दी ही तोड़ देंगे, यह उन नेत्र संकेतों का अर्थ हो सकता है। यह घटना प्रातःकाल की थी। प्रिय देशबंधुओं को अपनी आंखों के सामने परदेशी और परधर्मी लोग बेड़ियां डालकर कारावास में डालें और उस दृश्य को खुली आंखों से देखें, इसका दुःख झेलते, मन-ही-मन जलते सिपाहियों का अपनी-अपनी बैरकों में लौटते ही धीरज टूटने लगा। शहर के बाजार में वे गए तो वहां की महिलाएं उनका तिरस्कार कर कहने लगी-‘‘तुम्हारे बाप कारावास में भेजे गए हैं और तुम यहां मक्खियां मारते फिर रहे हो। थू तुम्हारी जिंदगी पर!!’’46 पहले ही गुस्से से पगलाए सिपाहियों को यह कैसे सहन होता कि रास्ते में औरतें उनके जीवन पर थूकें! उस दिन रात में सारी लाइन पर सिपाहियों की गुप्त बैठकें होती रही। क्या अब भी मई की 31 तारीख तक रुकना है!? इधर अपने भाइयों के कारावास में पड़े होते हुए हम नामर्दों की तरह चुप होकर बैठें! रास्ते में औरतें-बच्चे अपने पर देशद्रोही कहकर थूकने लगें, फिर भी दूसरों की राह देखते चुप बैठना? 31 मई की तारीख अभी कितनी दूर है। तब तक उन फिरंगियों के झंडे तले रहना? नहीं-नहीं, कल ही रविवार है। इस रविवार का सूर्य नारायण अस्तमान होने के पहले कारावास के उन देशवीरों की बेड़ियां टूट ही जानी चाहिए। स्वदेश जननी की बेड़ियां टूटनी ही चाहिए और स्वतंत्रता का झंडा लहराना ही चाहिए। तत्काल दिल्ली संदेश भेजे गए-‘‘हम तारीख 11 या 12 को वहां आ रहे हैं; सारी तैयारी करके रखो।—’’ 10 मई का रवि उदय हुआ। सन् 1857 की गुप्त तैयारी की अंग्रेजों को इतनी कम जानकारी थी कि मेरठ के सिपाहियों की दूसरों से तो क्या आपस में भी कुछ सामान्य योजना बन रही है, इसकी भी उनको आशंका नहीं हुई। रविवार को सुबह उनका नित्यकर्म शांति से शुरू हुआ। घोड़े की गाड़ियां, शीत उपचार, सुगंधित फूल, हवाखोरी, गाना-बजाना-सारी बातें हमेशा की तरह चालू हो गई। साहबों के घर के नेटिव नौकर अकस्मात् नौकरी पर नहीं आए, इसका भी उन्हें कोई अधिक आश्चर्य नहीं हुआ। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 103 46 1. जे.सी. विल्सन। 2. रेड पैंफलेट, खंड 1 ।