भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पर गिर गया और फिर उस रेजिमेंट के साथ आए सारे अंग्रेजों को एक साथ कत्ल कर दिया गया। इस तरह अपने स्वदेश-प्रेम पर फिरंगी रक्त की मुहर लगाकर मेरठ के घुड़सवार नीचे उतरे और दिल्ली के सिपाहियों से गले मिलने लगे। यह समाचार सुनते ही शहर का कश्मारी दरवाजा खुल गया और उस इतिहास-प्रसिद्ध दरवाजे से 'दीन-दीन' की गजना करते स्वतंत्रता योद्धा दिल्ली में प्रवेश कर गए। मेरठ सेना की दूसरी टुकड़ी कलकत्ता दरवाजे से अंदर घुसने लगी। वह दरवाजा पहले बंद किया हुआ था, परंतु इन सिपाहियों की भयानक थपकी पड़ते ह ीवह धीरे-धीरे हटने लगा और जल्दी ही उस दरवाजे पर नियुक्त पहरेवालों ने 'दीन-दीन' कहते विद्रोहियों को अंदर कर लिया। कलकत्ता दरवाजे से अंदर घुसे सिपाही प्रथम दरियागंज के यूरोपीय बंगलों की ओर गए और वे भवन कुछ क्षणों में आग बन गए। जो विदेशी लोगों को आश्रय दिया हुआ है, यह ज्ञात हुआ। विलायती आदमियों को अंदर लेने के कारण दरियागंज के घरों को जो दंड मिला उसे देखने के बाद भी यह अस्पताल यदि विलायती लोगों को अंदर लेने का साहस करे तो किसी को भी गुस्सा आना स्वाभाविक है। उस अस्पताल की जमकर पिटाई करने के बाद वह शस्त्रधारी उग्रता अपने असंख्य अवयवों के साथ दिल्ली के घर-घर में गोरे रक्त को सूंघने चली! पर निशान के बिना सेना कैसी? और ऐसी सेना का कपड़े का निशान किस काम का? इसलिए जहां भी गोरा सिर मिले वहां उसे भाले पर टांगकर उसका भयानक निशान 'दीन' के ताल पर नाचते हुए वह अपूर्व सेना आगे बढ़ती गई। बादशाह के नाम का जयघोष करते हुए सिपाही और शहर के सैकड़ों लोग दिल्ली के राजमहल में घुसने लगे। रास्ते से घायल होकर भागता आया कमिश्नर फ्रेजर एक छोटे दरवाजे पर खड़ा था। उसे देखते ही मुगल बेग नाम के आदमी ने उसके गाल पर वार किया। यह इशारा होते ही सब विद्रोही दौड़ पड़े और सीढ़ियों पर क्षत-विक्षत हुआ कमिश्नर फ्रेजर आने-जानेवालों के पैरों तले कुचला जाने लगा। उसे कुचलते सिपाही वहां न रुककर ऊपर चढ़ गए और जिस कमरे में जेनिंग और उसका परिवार रहता था, वहां जाकर वे डरावने राक्षस की तरह खड़े हो गए। इतने में किसी ने उस कमरे का दरवाजा लगाने का प्रयास किया; पर वह एक धक्के से चरमरा गया और सिपाहियों की तलवार के नीचे वह जेनिंग, उसकी युवा कन्या, उसके यहां की मेहमान एक अंग्रेज स्त्री का खात्मा हो गया। दिल्ली के रास्ते पर से मरते-मरते दौड़ा कैप्टन डगलस कहां है? भेजो उसे यम के घर! और ये कोने में घुसे कलेक्टर साहब! उन्हें भी जीवन की पेंशन पर भेजो। अब दिल्ली के राजमहल में फिरंगी सत्ता कानाम भी शेष नहीं रहा। अब जरा शांत बैठने में कोई हानि नहीं। घुड़सवारों ने अपने घोड़े राजमहल के मैदान में बांधे और सारी रात दौड़ते आए सिपाही दीवानेखास के राजमहल में अपना सामान रख विश्राम करने लगे। इस तरह दिल्ली का राजमहल लोक-सेना के हाथ आ गया और अब आगे क्या 1857 का स्वातंत्र्य समर – 109