१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरना है, इस विषय पर बादशाह, बेगम साहिबा और सिपाहियों के नेता वार्त्ता करने लगे। पहले निर्धारित योजना के अनुसार 31 मई तक रुकना अब मूर्खता थी। अतः कुछ सोच-विचार के बाद बादशाह ने क्रांतिकारियों से मिल जाना तय किया। इतना होते-होते मेरठ से विद्रोह कर निकला तोपखाने का बहुत सा भाग दिल्ली आ पहुंचा और उसने बादशाह के सम्मान में और स्वतंत्रता के लिए राजमहल में आकर इक्कीस तोपों की सलामी दी। सिपाहियों और अन्य लोगों की वार्त्ता के बाद भी जो थोड़ी चंचलता बादशाह के मन में शेष थी वह भी इन तोपों की गड़गड़ाहट में पिघल गई। और उस राजकीय सलामी की घन-गर्जना में उस वृद्ध बादशाह के हृदय का अनंत राज-तेज हड़बड़ाकर जाग उठा। उसकी उस भव्य और आदरणीय मूर्ति के सामने फिरंगियों के रक्त से सनी तलवार चलाते हुए सिपाहियों के नेता ने कहा, "खाविंद! मेरठ में अंग्रेजों की पराजय हो चुकी है, दिल्ली अपने हाथ में है और पेशावर से कलकत्ता तक के सारे सिपाही आपके आदेश की राह देख रहे हैं। अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियां तोड़कर अपनी प्रकृतिदत्त स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सारा हिंदुस्थान जाग उठा है। ऐसे समय में यह स्वतंत्रता का निशान अपने हाथ में लें, जिससे हिंदुस्थान के सारे बहादुर उसके सम्मान के लिए मरने को तैया हो जाएंगे। हिंदुस्थान अपना स्वराज्य वापस लेने के लिए लड़ने लगा है और अब उसका नेतृत्व यदि आपने स्वीकार किया तो पल भर में हम उन फिरंगी राक्षसों को या तो समुद्र में डुबो देंगे या उनके शवों की दावत गिद्धों को देंगे।⁴⁹ हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियों के नेताओं का यह एक स्वर और उद्दीपक भाषण सुनकर बादशाह को स्वतंत्रता का उत्साह आने लगा। उसकी कल्पना के सामने शाहजहां और अकबर की मूर्तियां आने-जाने लगीं और अब गुलामी में रहने की अपेक्षा स्वदेश को स्वतंत्र करते-करते मरना ही अधिक श्रेयस्कर है, ऐसी दैवी स्फूर्ति उसके हृदय में संचरित होने लगी। आगे बादशाह ने कहा, "मेरे पास खजाना नहीं है और तुम्हें वेतन भी नहीं मिलेगा।" तब वे सिपाही बोले, "हम अंग्रेजों का खजाना लूटेंगे और आपके खजाने में भरेंगे"⁵⁰ "तो फिर आपका नेतृत्व मैं स्वीकार करता हूं।" ऐसा अभिवचन उस वृद्ध बादशाह से मिलते ही उस राजभवन में जमा उस प्रचंड जनसमूह ने बड़े जोर से गर्जना की। राजमहल में जब यह सब गड़बड़ी चल रही थी तब शहर में जोर का ऊधम हो रहा था। दिल्ली के सैकड़ों लोग घर में जो शस्त्र मिले वही लेकर विद्रोही सिपाहियों से मिल रहे थे और यूरोपीय लोगों को काट डालने के लिए यहां-वहां घूम रहे थे। बारह बजे के आसपास दिल्ली के बैंक पर हमला हुआ। उसमें बैंक का मैनेजर बेरेस फोर्ड, उसकी पत्नी और उसके पांच बच्चे मार डाले गए। वह भवन भी नष्ट कर दिया गया। फिर 'दिल्ली गजट' के छापाखाने की ओर लोग गए। मेरठ का समाचार छापने के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 110 ⁴⁹ चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 74। ⁵⁰ मेटकॉफ।