१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकंपोजिटर कंपोजिंग कर रहे थे, तभी दरवाजे पर 'दीन-दीन' की गर्जना हुई और कुछ ही देर में छापाखाने का हर ईसाई चीर दिया गया। वहां का सबकुछ-मशीनें आदि जो कुछ भी था-फिरंगियों के स्पर्श से अपवित्र हो गया था, अतः उसका नष्ट करके क्रांति की वह भयानक हवा आगे बढ़ी। परंतु अभी भी वह चर्च खड़ा होकर अपने धर्मयुद्ध की ओर देखता रहे, यह पूरी तरह अनुचित है। इस चर्च में हिंदुस्तान में तुम्हारा राज्य रहना ही भयानक पाप है, अपने अनुयायियों को एक दिन भी इस चर्च ने ऐसा कहा था क्या? उलटे ऐसे पाप के अधिकारियों को ऐहिक और परलौकिक संरक्षण देने के लिए इस पक्षपाती चर्च ने अपने पंखों को फैलाया हुआ है। हिंसा की ऐसी गुफा हमने अपने देश में निर्मित होने दी, उसका प्रायश्चित्त गया और सूअर के रक्त से बने कारतूसों के रूप में हमें मिला। अभी भी संभलों और उस चर्च की व्यवस्था करने के लिए पहले उसी की ओर बढ़ो! देखते क्या हो? फोड़ो वह क्रॉस! दीवारों की सारी चमड़ी उखाड़ो, उस व्यासपीठ का चूरा बनाओ और बोलो-दीन! रोज चर्च में आते समय यह घंटा बजता है। अब हम उसको घनघनाएं। बज घंटा, बज! आज तू इतना बज रहा है, पर कोई गोरा तेरी ओर क्यों नहीं बढ़ रहा? तुझे इन काले हाथों का स्पर्श भाता है क्या? हाथ का स्पर्श भला न लग रहा हो तो गिर जा नीचे! हमारे वे बंधु अपने पैरों का स्पर्श करने बुला रहे हैं। सारे घंटे टूटकर नीचे गिरने के बाद उनके गिरने की आवाज के साथ वे सिपाही भी विकट हास्य करते हुए एक-दूसरे को कहने लगे-“कैसा तमाशा है! क्या मजा है!!” परंतु उधर देसरी तरफ इससे भी भयानक तमाशा चल रहा था। राजमहल के एक ओर अंग्रेजों की सेना के लिए तैयार किया हुआ एक बारूदखाना था। इस बारूदखाने में लड़ाई में आवश्यक सारा सामान ठूंस-ठूंसकर भरा हुआ था। उसमें कम-से-कम नौ लाख कारतूस, आठ-दस हजार बंदूकें, तोपें और सीजट्रेन भरी हुई थी। यह बारूदखाना अपने कब्जे में लेने का क्रांतिवीरों ने दृढ़ संकल्प किया। पर यह काम सरल नहीं था। उस बारूदखाने में नियुक्त अंग्रेज चाहे तो वहां लड़ने पहुंचनेवाले सबका नाश करने में एक क्षण भी लगनेवाला नहीं हैं। क्योंकि उस बारूदखाने को सुलगा देने के लिए एक तीली जलाकर डालना काफी था। इस काम में हाथ डालना बहुत ही जोखिमपूर्ण था। फिर भी वह बारूदखाना कब्जे में लिये बगैर क्रांति का जीवन क्षण भर भी सुरक्षित न रहता। अतः यह काम पूरा करने को हजारों सिपाही तैयार हो गए। उन्होंने उस बारूदखाने के अंग्रेज अधिकारी को शरण आने के लिए बादशाह के नाम से संदेश भेजा। परंतु ऐसे कागज के टुकड़ों को मान देकर अंग्रेजों ने इस देश का शासन प्राप्त नहीं किया था। लेफ्टिनेंट बिलोमी ने उस चिट्ठी को उत्तर देने का भी मान नहीं दिया। यह अपमान देखकर गुस्सा हुए हजारों सिपाही उस बारूदखाने की दीवार पर चढ़ने लगे। बारूदखाने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 111