१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके अंदर नौ अंग्रेज और कुछ भारतीय लोग थे। दीवार पर दिल्ली के बादशाह का निशान लगा देखकर भारतीय लोग अपने स्वदेश बंधुओं को तेजी से आकर मिलने लगे और उन नौ अंग्रेजों पर निराशा की छाया मंडराने लगी। सिपाहियों की लगातार मार के आगे अंग्रेज कितनी देर टिक सकेंगे, यह दिख ही रहा था। उन्होंने समय अपने पर बारूदखाना उड़ा देने का निश्चय किया था, इसमें संदेह नहीं; क्योंकि यदि वे बारूदखाना स्वयं सौंप देते तो भी उनके प्राण सिपाही न लेते, इसपर उनका कोई भरोसा नहीं था। इधर सिपाही भी यह जानते हुए भी कि बारूदखाना उड़ाया जाएगा तो अपनी ओर की प्रचंड हानि होगी, टूट पड़े थे। इतने में दोनों ओर से लोग जिस भयानक आवाज की प्रतीक्षा में आशंकित थे वे हजारों तोपें एक साथ छूटने की जंगी आवाज हुई और उस बारूदखाने से आग की प्रचंड ज्वाला आकाश की ओर बढ़ गई। उन अंग्रेज वीरों ने स्वयं के प्राणों की आशा छोड़क रवह बारूदखाना शत्रु के कब्जे में न देते हुए अपने हाथों से सुलगा दिया और उस एक आवाज के साथ करीब पच्चीस सिपाही और आसपास के रास्तों पर के तीन सौ आदमी आकाश में उड़ गए। परंतु क्रांति पक्षवालों ने इस बारूदखाने की आग में जान-बूझकर जो अपना नाम करवा लिया वह यों ही नहीं था। क्योंकि जो लोग इस बारूद के विस्फोट में बलि हुए उनके आत्मयक्ष से उस राज्य क्रांति को अपूर्व शक्ति मिली। जब तक यह प्रचंड बारूदखाना अंग्रेजों के कब्जे में था तब तक मुख्य केंद्र के नेटिव सिपाही अपने अधिकारियों की अधीनता में थे। वे अपने स्वदेश बंधुओं पर हमला नहीं कर रहे थे, पर अंग्रेजों के विरुद्ध भी नहीं हुए थे। दोपहर चार बजे सारा दिल्ली शहर हिलानेवाले विस्फोट की आवाज सुनते ही वे केंटोनमेंट के सिपाही इकट्ठे हुए और 'मारो फिरंगी को' की गर्जना करते हुए अंग्रेजों पर टूट पड़े। मुख्य रक्षक गार्डन को किसी ने उड़ा दिया। स्मिथ और रेह्ले को मार डाला और गोरा रंग देखते ही 'टूट पड़ो-मार डालो' की ध्वनि होने लगी। एक शतक के बाद जाग्रत हुआ राष्ट्र-क्षोभ अपने उग्र जबड़े के नीचे पुरूष, महिलाएं, बच्चे, घर, दरवाजे, पत्थर, ईंट, घड़ियां, मेज-कुरसियां, रक्त, मांस, अस्थियां-जिन-जिन चीजों को फिरंगी स्पर्श हुआ था सब पर क्रांतिकारियों का आक्रोश टूटा। उस सारी सचेतन दिल्ली के बादशाह का बहुत सख्त आदेश हो जाने के बाद ही बहुत से अंग्रेज लोग मृत्यु से बच पाए और राजमहल की कैद में पहुंचा दिए गए। परंतु लोकमत बादशाह के इस कृत्य के इतना विरुद्ध था कि चार-पांच दिन खींचतान करने के बाद उसे अपने कब्जे के उन पचास फिरंगियों को लोगों को सौंप देना अनिवार्य हो गया। 16 मई को एक सार्वजनिक मैदान पर वे पचास फिरंगी ले जाए गए। वह दृश्य देखने के लिए इकट्ठा हुए हजारों नागरिकों ने उनके सामने फिरंगी राज्य और अंग्रेजों की बेईमानी की पूरी-पूरी निंदा की और फिर सिपाहियों का आदेश होते ही एक क्षण में उन पचासों के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 112