१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। सिपाही की तलवार से बचने कोई महिला या बच्चा गिड़गिड़ाने लगता तो-'मेरठ की बेड़ियों का बदला, गुलामी का बदला, बारूदखाने का बदला'-कहते हुए लोग बड़े जोर से चिल्लाने लगते। इस बदले की धार चढ़ी तलवार वह गिड़गिड़ाता भूरा सिर छांट देती। 11 मई को अंग्रेजों के कत्लेआम का आरंभ होकर उसकी पूर्णाहूति 16 मई को हुई। इस बीच सैकड़ों अंग्रेज जान बचाके दिल्ली से भाग गए। किसी ने मुंह पर काला रंग पोतकर नेटिव होने का स्वांग रचा तो कोई जंगल-जंगल भागता धूप में छिपने का साहस किया, भेद खुलते ही गांववालों के हाथों मारा गया। कोई –यात्रा में थककर रास्ते में बैठ जाने पर –पास-पड़ोस के गांववालों द्वारा फिरंगी कहकर काट डाला गया और कोई दयालु गांववाले मिल जाने से उनकी कृपा पाकर मेरठ छावनी पहुंच गया। बारूदखाने के विस्फोट में विद्रोही सैनिकों को भरमूर बंदूकें मिली और उसके कारण हर सिपाही के हिस्से में जो कत्ल हुआ, उसका समाचार सुनते ही सैकड़ों गांवों ने अपनी सीमा में फिरंगी को घुसने न देने का संकल्प लिया। परंतु इन गांवों या दिल्ली में इतने बवंडर के चलते हुए भी एक भी अंग्रेज महिला के शील पर किसी ने आक्रमण नहीं किया था। यह बात अब अंग्रेजों द्वारा की गई जांच-पड़ताल में ही सिद्ध हुई है।⁵¹ दिल्ली में कत्ल हो जाने के बाद उस अवसर के प्रत्यक्ष देखे हुए वर्णन के नाम पर कितने ही अंग्रेज धर्माधिकारियों ने जो भयंकर वर्णन किए हैं उनसे अधिक निंदात्मक, असत्य और घटिया बयान आज तक किसी ने नहीं किया होगा। दिल्ली के रास्तों पर महिलाओं को नंगा कर घुमाया, सार्वजनिक रूप से उनका शील भंग किया गया, उनके स्तन काटे गए, छोटी बच्चियों पर अत्याचार किए गए आदि अमानवीय झूठ जिनके धर्मोपदेशक प्रकाशित करते हैं उन अंग्रेज लोगों की सत्यनिष्ठा कितनी घटिया होगी।⁵² सन् 1857 की राष्ट्रीय क्रांति इसलिए नहीं हुई थी कि हिंदुस्थान के लोगों को गोरी औरतें नहीं मिलती थी। उलटे, गोरी महिला के मनहूस कदम (मराठी में पाढरा पाप अर्थात् गोरे पांव) फिर से अपने घर में न पड़ें, इसलिए सन् 1857 का राष्ट्र-क्षोभ उद्भूत हुआ था। इस तरह मेरठ की महिलाओं के फुफकार से उठे उस भयानक चक्रवात के चक्कर में पड़ पांच दिन के अंदर हिंदुस्थान में सौ वर्ष से जमा हुआ गुलामी का विषवृक्ष भरभराकर गिर गया। इन पहले पांच दिनों में क्रांति पक्ष में नेताओं को जो अपूर्व 1857 का स्वातंत्र्य समर – 113 ⁵¹ 1. “चाहे कितनी भी क्रूरता अथवा रक्तपात क्यों न किया गया और बाद में कितनी भी जनश्रुतियां क्यों न प्रसाहित की गई हों कि महिलाओं से भी छेड़छाड़ की गई है, उनका अपमान किया गया है; किंतु जहां तक मैंने जांच की है, इसकी सत्यता का कोई भी प्रमाण मुझे नहीं मिला।” –ऑनरेबल सर विलियम म्यूर, के.सी.एस.आई., गुप्तचर विभाग के प्रमुख ⁵² चार्ल्स बाल कृत –इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 105।