१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसफलता मिली, उसका मूल कारण था अंग्रेजों की गुलामी से छूटने की उत्कट इच्छा का सारी जनता में पैदा होना। मेरठ की महिलाओं से दिल्ली के बादशाह तक सबके हृदय में स्वतंत्रता और स्वधर्म-रक्षण की अनिवार्य इच्छा प्रादुर्भूत होने से और उस इच्छा को गुप्त संगठन के द्वारा पहले से ही व्यवस्था प्राप्त हो जाने से केवल पांच दिन के अंदर हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी में स्वराज्य की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई। दिनांक 16 मई को दिल्ली में फिरंगी सत्ता का एक भी चिह्न शेष नहीं रहा था। अंग्रेजी वस्तुओं से दिल्ली को इतनी घृणा हो गई थी कि कोई अंग्रेजी भाषा का एक शब्द भी बोले तो उसे जमकर मार खानी पड़ती। अंग्रेजी निशान के टुकड़े गली-कूचों में कुचले जा रहे थे। और अपने आज तक के अपमान के दाग दासता के उष्ण रक्त से धोकर स्वच्छ हुआ स्वराज्य का चिह्न उस प्रचंड क्रांति के सिर पर डोल रहा था। यह स्वतंत्रता की इच्छा इतनी प्रबल थी कि पहले पांच दिन में देशद्रोह की छूत कहीं नहीं लगी। पुरुष और महिलाएं, श्रीमंत व गरीब, तरूण और वृद्ध, सिपाही और नागरिक, मौलवी और पंडित, हिंदू और मुसलमान - सारे-के-सारे स्वदेश के निशान के नीचे अपने-अपने शस्त्र निकालकर परदेशी दासता पर हमले कर रहे थे। ऐसी विलक्षण स्वदेश-प्रीति और स्वातंत्र्य-प्रीति उबल रही थी और पर-सत्ता के प्रति इतनी घृणा उत्पन्न हो गई थी। इसलिए मेरठ की ललनाओं के बागबाणों से दिल्ली का सिंहासन प्रादुर्भूत हुआ। ये पांच दिन हिंदुस्थान के इतिहास में हमेशा चिरस्मरणीय रहें, क्योंकि मुहम्मद गजनवी के आक्रमणों से प्रारंभ हुआ हिंदू और मुसलमान का प्रचंड युद्ध समाप्त हो जाने की घोषणा इन पांच दिनों में हुई और हिंदू और मुसलमान के बीच का परायापन तथा विजतो-विजित भाव नामशेष होकर उनमें आपसी बंधुत्व भाव इन्हीं दिनों में प्रकट हुआ। मुसलमानों की परतंत्रता से श्री शिवराज, प्रताप सिंह, छत्रसाल, प्रतापादित्य, गुरू गोविंद सिंह तथा महादजी शिंदे द्वारा मुक्त हुई भारत माता ने-'इसके बाद तुम सब समान और सरोहर हो और मैं तुम दोनों की मां हूं, इस दिव्य मंत्र का उच्चारण किया। हिंदुस्थान अपना देश है और हमस ब सगे भाई हैं, ऐसी गर्जना करते हिंदू-मुसलमानों ने सम समानता से और एकमत से दिल्ली के तख्त पर स्वराज्य का उभय स्वीकृत झंडा तभी खड़ा किया। ऐसे ये पांच दिन इतिहास में चिरस्मरणीय रहें। इन पांच दिनों में हिंदुस्थान में लोकशक्ति का प्रथमोदय हुआ। अपेन पर कौन राज्य करे, इस प्रश्न का निर्णय करने का कार्य लोकपक्ष का है। इस संवेदना का जन्म हिंदुस्थान में इन पांच का निर्णय करने का कार्य लोकपद्वक्ष का है। इस संवेदना का जन्म हिंदुस्थान में इन पांच दिनों में हुआ। लोकपक्ष ने ही उस राज सिंहासन पर स्वसम्मत पुरुषार्थ की योजना की। लोगों को जो पसंद होगा उसी का राज्य स्वदेश पर चले, यह भावना और राजनीति लोकपक्ष का कर्तव्य है, यह चेतना हिंदुस्थान के शरीर में इन पांच दिनों में उदय हुई। लोकपक्ष की यह जयंती हिंदुस्थान के इतिहास में अविस्मरणीय रहे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 114