भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-4 मध्यांतर और पंजाब दिल्ली स्वतंत्र हो जाने की वार्त्ता विद्युत वेग से फैलते ही उसकी आकस्मिकता ने सारे हिंदुस्थान में अपनों और परायों दोनों को क्षण भर के लिए तो चकित कर दिया। अंग्रेजों को तो तुरंत यह भी समझते न बना कि हम जो सुन रहे हैं उसका अर्थ क्या है? सारे देश में शांति का साम्राज्य है, ऐसा जान कलकत्ता में लॉर्ड केनिंग सोए पड़े थे और इधर कमांडर-इन-चीफ ॲन्सन शिमला की ठंडी हवा में जाने के लिए सज रहे थे। उन्हें पहले जब दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का अधूरा तार आया तब उस तार का वास्तविक हड़बड़ी चकित-विस्मित सारे हिंदुस्थानी लोगों में भी मची हुई थी। क्योंकि दिल्ली के इस अकल्पनीय विद्रोह के आकस्मिक हल्ले में अंग्रेजों को भावी संकट की सूचना मिलने से उस संकट का परिहार करने का अवसर मिल गया। अकल्पित हमले से दिल्ली का सिंहासन जैसे एक-दो दिन में उनसे झटक लिया गया, वैसे ही 31 मई को निश्चित पूर्व संकेत के अनुसार एक समय में यदि सब जगह विस्फोट होता तो सारे हिंदुस्थान का सिंहासन एक झटके में हथियाया जा सकता था। अ बवह योजना तो मेरठ के विद्रोह के कारण उलझ गई थी, फिर भी दिल्ली कब्जे में आ जाने से विद्रोह को राज्य क्रांति का स्वरूप मिल गया और इस असंभव वार्त्ता से एक विलक्षण चेतना का जन्म हो गया था। 1857 का स्वातंत्र्य समर -115