१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
कंपोजिटर कंपोजिंग कर रहे थे, तभी दरवाजे पर 'दीन-दीन' की गर्जना हुई और कुछ ही देर में छापाखाने का हर ईसाई चीर दिया गया। वहां का सबकुछ-मशीनें आदि जो कुछ भी था-फिरंगियों के स्पर्श से अपवित्र हो गया था, अतः उसका नष्ट करके क्रांति की वह भयानक हवा आगे बढ़ी। परंतु अभी भी वह चर्च खड़ा होकर अपने धर्मयुद्ध की ओर देखता रहे, यह पूरी तरह अनुचित है। इस चर्च में हिंदुस्तान में तुम्हारा राज्य रहना ही भयानक पाप है, अपने अनुयायियों को एक दिन भी इस चर्च ने ऐसा कहा था क्या? उलटे ऐसे पाप के अधिकारियों को ऐहिक और परलौकिक संरक्षण देने के लिए इस पक्षपाती चर्च ने अपने पंखों को फैलाया हुआ है। हिंसा की ऐसी गुफा हमने अपने देश में निर्मित होने दी, उसका प्रायश्चित्त गया और सूअर के रक्त से बने कारतूसों के रूप में हमें मिला। अभी भी संभलों और उस चर्च की व्यवस्था करने के लिए पहले उसी की ओर बढ़ो! देखते क्या हो? फोड़ो वह क्रॉस! दीवारों की सारी चमड़ी उखाड़ो, उस व्यासपीठ का चूरा बनाओ और बोलो-दीन! रोज चर्च में आते समय यह घंटा बजता है। अब हम उसको घनघनाएं। बज घंटा, बज! आज तू इतना बज रहा है, पर कोई गोरा तेरी ओर क्यों नहीं बढ़ रहा? तुझे इन काले हाथों का स्पर्श भाता है क्या? हाथ का स्पर्श भला न लग रहा हो तो गिर जा नीचे! हमारे वे बंधु अपने पैरों का स्पर्श करने बुला रहे हैं। सारे घंटे टूटकर नीचे गिरने के बाद उनके गिरने की आवाज के साथ वे सिपाही भी विकट हास्य करते हुए एक-दूसरे को कहने लगे-“कैसा तमाशा है! क्या मजा है!!” परंतु उधर देसरी तरफ इससे भी भयानक तमाशा चल रहा था। राजमहल के एक ओर अंग्रेजों की सेना के लिए तैयार किया हुआ एक बारूदखाना था। इस बारूदखाने में लड़ाई में आवश्यक सारा सामान ठूंस-ठूंसकर भरा हुआ था। उसमें कम-से-कम नौ लाख कारतूस, आठ-दस हजार बंदूकें, तोपें और सीजट्रेन भरी हुई थी। यह बारूदखाना अपने कब्जे में लेने का क्रांतिवीरों ने दृढ़ संकल्प किया। पर यह काम सरल नहीं था। उस बारूदखाने में नियुक्त अंग्रेज चाहे तो वहां लड़ने पहुंचनेवाले सबका नाश करने में एक क्षण भी लगनेवाला नहीं हैं। क्योंकि उस बारूदखाने को सुलगा देने के लिए एक तीली जलाकर डालना काफी था। इस काम में हाथ डालना बहुत ही जोखिमपूर्ण था। फिर भी वह बारूदखाना कब्जे में लिये बगैर क्रांति का जीवन क्षण भर भी सुरक्षित न रहता। अतः यह काम पूरा करने को हजारों सिपाही तैयार हो गए। उन्होंने उस बारूदखाने के अंग्रेज अधिकारी को शरण आने के लिए बादशाह के नाम से संदेश भेजा। परंतु ऐसे कागज के टुकड़ों को मान देकर अंग्रेजों ने इस देश का शासन प्राप्त नहीं किया था। लेफ्टिनेंट बिलोमी ने उस चिट्ठी को उत्तर देने का भी मान नहीं दिया। यह अपमान देखकर गुस्सा हुए हजारों सिपाही उस बारूदखाने की दीवार पर चढ़ने लगे। बारूदखाने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 111
के अंदर नौ अंग्रेज और कुछ भारतीय लोग थे। दीवार पर दिल्ली के बादशाह का निशान लगा देखकर भारतीय लोग अपने स्वदेश बंधुओं को तेजी से आकर मिलने लगे और उन नौ अंग्रेजों पर निराशा की छाया मंडराने लगी। सिपाहियों की लगातार मार के आगे अंग्रेज कितनी देर टिक सकेंगे, यह दिख ही रहा था। उन्होंने समय अपने पर बारूदखाना उड़ा देने का निश्चय किया था, इसमें संदेह नहीं; क्योंकि यदि वे बारूदखाना स्वयं सौंप देते तो भी उनके प्राण सिपाही न लेते, इसपर उनका कोई भरोसा नहीं था। इधर सिपाही भी यह जानते हुए भी कि बारूदखाना उड़ाया जाएगा तो अपनी ओर की प्रचंड हानि होगी, टूट पड़े थे। इतने में दोनों ओर से लोग जिस भयानक आवाज की प्रतीक्षा में आशंकित थे वे हजारों तोपें एक साथ छूटने की जंगी आवाज हुई और उस बारूदखाने से आग की प्रचंड ज्वाला आकाश की ओर बढ़ गई। उन अंग्रेज वीरों ने स्वयं के प्राणों की आशा छोड़क रवह बारूदखाना शत्रु के कब्जे में न देते हुए अपने हाथों से सुलगा दिया और उस एक आवाज के साथ करीब पच्चीस सिपाही और आसपास के रास्तों पर के तीन सौ आदमी आकाश में उड़ गए। परंतु क्रांति पक्षवालों ने इस बारूदखाने की आग में जान-बूझकर जो अपना नाम करवा लिया वह यों ही नहीं था। क्योंकि जो लोग इस बारूद के विस्फोट में बलि हुए उनके आत्मयक्ष से उस राज्य क्रांति को अपूर्व शक्ति मिली। जब तक यह प्रचंड बारूदखाना अंग्रेजों के कब्जे में था तब तक मुख्य केंद्र के नेटिव सिपाही अपने अधिकारियों की अधीनता में थे। वे अपने स्वदेश बंधुओं पर हमला नहीं कर रहे थे, पर अंग्रेजों के विरुद्ध भी नहीं हुए थे। दोपहर चार बजे सारा दिल्ली शहर हिलानेवाले विस्फोट की आवाज सुनते ही वे केंटोनमेंट के सिपाही इकट्ठे हुए और 'मारो फिरंगी को' की गर्जना करते हुए अंग्रेजों पर टूट पड़े। मुख्य रक्षक गार्डन को किसी ने उड़ा दिया। स्मिथ और रेह्ले को मार डाला और गोरा रंग देखते ही 'टूट पड़ो-मार डालो' की ध्वनि होने लगी। एक शतक के बाद जाग्रत हुआ राष्ट्र-क्षोभ अपने उग्र जबड़े के नीचे पुरूष, महिलाएं, बच्चे, घर, दरवाजे, पत्थर, ईंट, घड़ियां, मेज-कुरसियां, रक्त, मांस, अस्थियां-जिन-जिन चीजों को फिरंगी स्पर्श हुआ था सब पर क्रांतिकारियों का आक्रोश टूटा। उस सारी सचेतन दिल्ली के बादशाह का बहुत सख्त आदेश हो जाने के बाद ही बहुत से अंग्रेज लोग मृत्यु से बच पाए और राजमहल की कैद में पहुंचा दिए गए। परंतु लोकमत बादशाह के इस कृत्य के इतना विरुद्ध था कि चार-पांच दिन खींचतान करने के बाद उसे अपने कब्जे के उन पचास फिरंगियों को लोगों को सौंप देना अनिवार्य हो गया। 16 मई को एक सार्वजनिक मैदान पर वे पचास फिरंगी ले जाए गए। वह दृश्य देखने के लिए इकट्ठा हुए हजारों नागरिकों ने उनके सामने फिरंगी राज्य और अंग्रेजों की बेईमानी की पूरी-पूरी निंदा की और फिर सिपाहियों का आदेश होते ही एक क्षण में उन पचासों के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 112
टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। सिपाही की तलवार से बचने कोई महिला या बच्चा गिड़गिड़ाने लगता तो-'मेरठ की बेड़ियों का बदला, गुलामी का बदला, बारूदखाने का बदला'-कहते हुए लोग बड़े जोर से चिल्लाने लगते। इस बदले की धार चढ़ी तलवार वह गिड़गिड़ाता भूरा सिर छांट देती। 11 मई को अंग्रेजों के कत्लेआम का आरंभ होकर उसकी पूर्णाहूति 16 मई को हुई। इस बीच सैकड़ों अंग्रेज जान बचाके दिल्ली से भाग गए। किसी ने मुंह पर काला रंग पोतकर नेटिव होने का स्वांग रचा तो कोई जंगल-जंगल भागता धूप में छिपने का साहस किया, भेद खुलते ही गांववालों के हाथों मारा गया। कोई –यात्रा में थककर रास्ते में बैठ जाने पर –पास-पड़ोस के गांववालों द्वारा फिरंगी कहकर काट डाला गया और कोई दयालु गांववाले मिल जाने से उनकी कृपा पाकर मेरठ छावनी पहुंच गया। बारूदखाने के विस्फोट में विद्रोही सैनिकों को भरमूर बंदूकें मिली और उसके कारण हर सिपाही के हिस्से में जो कत्ल हुआ, उसका समाचार सुनते ही सैकड़ों गांवों ने अपनी सीमा में फिरंगी को घुसने न देने का संकल्प लिया। परंतु इन गांवों या दिल्ली में इतने बवंडर के चलते हुए भी एक भी अंग्रेज महिला के शील पर किसी ने आक्रमण नहीं किया था। यह बात अब अंग्रेजों द्वारा की गई जांच-पड़ताल में ही सिद्ध हुई है।⁵¹ दिल्ली में कत्ल हो जाने के बाद उस अवसर के प्रत्यक्ष देखे हुए वर्णन के नाम पर कितने ही अंग्रेज धर्माधिकारियों ने जो भयंकर वर्णन किए हैं उनसे अधिक निंदात्मक, असत्य और घटिया बयान आज तक किसी ने नहीं किया होगा। दिल्ली के रास्तों पर महिलाओं को नंगा कर घुमाया, सार्वजनिक रूप से उनका शील भंग किया गया, उनके स्तन काटे गए, छोटी बच्चियों पर अत्याचार किए गए आदि अमानवीय झूठ जिनके धर्मोपदेशक प्रकाशित करते हैं उन अंग्रेज लोगों की सत्यनिष्ठा कितनी घटिया होगी।⁵² सन् 1857 की राष्ट्रीय क्रांति इसलिए नहीं हुई थी कि हिंदुस्थान के लोगों को गोरी औरतें नहीं मिलती थी। उलटे, गोरी महिला के मनहूस कदम (मराठी में पाढरा पाप अर्थात् गोरे पांव) फिर से अपने घर में न पड़ें, इसलिए सन् 1857 का राष्ट्र-क्षोभ उद्भूत हुआ था। इस तरह मेरठ की महिलाओं के फुफकार से उठे उस भयानक चक्रवात के चक्कर में पड़ पांच दिन के अंदर हिंदुस्थान में सौ वर्ष से जमा हुआ गुलामी का विषवृक्ष भरभराकर गिर गया। इन पहले पांच दिनों में क्रांति पक्ष में नेताओं को जो अपूर्व 1857 का स्वातंत्र्य समर – 113 ⁵¹ 1. “चाहे कितनी भी क्रूरता अथवा रक्तपात क्यों न किया गया और बाद में कितनी भी जनश्रुतियां क्यों न प्रसाहित की गई हों कि महिलाओं से भी छेड़छाड़ की गई है, उनका अपमान किया गया है; किंतु जहां तक मैंने जांच की है, इसकी सत्यता का कोई भी प्रमाण मुझे नहीं मिला।” –ऑनरेबल सर विलियम म्यूर, के.सी.एस.आई., गुप्तचर विभाग के प्रमुख ⁵² चार्ल्स बाल कृत –इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 105।
सफलता मिली, उसका मूल कारण था अंग्रेजों की गुलामी से छूटने की उत्कट इच्छा का सारी जनता में पैदा होना। मेरठ की महिलाओं से दिल्ली के बादशाह तक सबके हृदय में स्वतंत्रता और स्वधर्म-रक्षण की अनिवार्य इच्छा प्रादुर्भूत होने से और उस इच्छा को गुप्त संगठन के द्वारा पहले से ही व्यवस्था प्राप्त हो जाने से केवल पांच दिन के अंदर हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी में स्वराज्य की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई। दिनांक 16 मई को दिल्ली में फिरंगी सत्ता का एक भी चिह्न शेष नहीं रहा था। अंग्रेजी वस्तुओं से दिल्ली को इतनी घृणा हो गई थी कि कोई अंग्रेजी भाषा का एक शब्द भी बोले तो उसे जमकर मार खानी पड़ती। अंग्रेजी निशान के टुकड़े गली-कूचों में कुचले जा रहे थे। और अपने आज तक के अपमान के दाग दासता के उष्ण रक्त से धोकर स्वच्छ हुआ स्वराज्य का चिह्न उस प्रचंड क्रांति के सिर पर डोल रहा था। यह स्वतंत्रता की इच्छा इतनी प्रबल थी कि पहले पांच दिन में देशद्रोह की छूत कहीं नहीं लगी। पुरुष और महिलाएं, श्रीमंत व गरीब, तरूण और वृद्ध, सिपाही और नागरिक, मौलवी और पंडित, हिंदू और मुसलमान - सारे-के-सारे स्वदेश के निशान के नीचे अपने-अपने शस्त्र निकालकर परदेशी दासता पर हमले कर रहे थे। ऐसी विलक्षण स्वदेश-प्रीति और स्वातंत्र्य-प्रीति उबल रही थी और पर-सत्ता के प्रति इतनी घृणा उत्पन्न हो गई थी। इसलिए मेरठ की ललनाओं के बागबाणों से दिल्ली का सिंहासन प्रादुर्भूत हुआ। ये पांच दिन हिंदुस्थान के इतिहास में हमेशा चिरस्मरणीय रहें, क्योंकि मुहम्मद गजनवी के आक्रमणों से प्रारंभ हुआ हिंदू और मुसलमान का प्रचंड युद्ध समाप्त हो जाने की घोषणा इन पांच दिनों में हुई और हिंदू और मुसलमान के बीच का परायापन तथा विजतो-विजित भाव नामशेष होकर उनमें आपसी बंधुत्व भाव इन्हीं दिनों में प्रकट हुआ। मुसलमानों की परतंत्रता से श्री शिवराज, प्रताप सिंह, छत्रसाल, प्रतापादित्य, गुरू गोविंद सिंह तथा महादजी शिंदे द्वारा मुक्त हुई भारत माता ने-'इसके बाद तुम सब समान और सरोहर हो और मैं तुम दोनों की मां हूं, इस दिव्य मंत्र का उच्चारण किया। हिंदुस्थान अपना देश है और हमस ब सगे भाई हैं, ऐसी गर्जना करते हिंदू-मुसलमानों ने सम समानता से और एकमत से दिल्ली के तख्त पर स्वराज्य का उभय स्वीकृत झंडा तभी खड़ा किया। ऐसे ये पांच दिन इतिहास में चिरस्मरणीय रहें। इन पांच दिनों में हिंदुस्थान में लोकशक्ति का प्रथमोदय हुआ। अपेन पर कौन राज्य करे, इस प्रश्न का निर्णय करने का कार्य लोकपक्ष का है। इस संवेदना का जन्म हिंदुस्थान में इन पांच का निर्णय करने का कार्य लोकपद्वक्ष का है। इस संवेदना का जन्म हिंदुस्थान में इन पांच दिनों में हुआ। लोकपक्ष ने ही उस राज सिंहासन पर स्वसम्मत पुरुषार्थ की योजना की। लोगों को जो पसंद होगा उसी का राज्य स्वदेश पर चले, यह भावना और राजनीति लोकपक्ष का कर्तव्य है, यह चेतना हिंदुस्थान के शरीर में इन पांच दिनों में उदय हुई। लोकपक्ष की यह जयंती हिंदुस्थान के इतिहास में अविस्मरणीय रहे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 114
द्वितीय भाग: प्रस्फोट (मेरठ, दिल्ली, मंगल पाण्डे व क्रांति)
प्रकरण-4 मध्यांतर और पंजाब दिल्ली स्वतंत्र हो जाने की वार्त्ता विद्युत वेग से फैलते ही उसकी आकस्मिकता ने सारे हिंदुस्थान में अपनों और परायों दोनों को क्षण भर के लिए तो चकित कर दिया। अंग्रेजों को तो तुरंत यह भी समझते न बना कि हम जो सुन रहे हैं उसका अर्थ क्या है? सारे देश में शांति का साम्राज्य है, ऐसा जान कलकत्ता में लॉर्ड केनिंग सोए पड़े थे और इधर कमांडर-इन-चीफ ॲन्सन शिमला की ठंडी हवा में जाने के लिए सज रहे थे। उन्हें पहले जब दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का अधूरा तार आया तब उस तार का वास्तविक हड़बड़ी चकित-विस्मित सारे हिंदुस्थानी लोगों में भी मची हुई थी। क्योंकि दिल्ली के इस अकल्पनीय विद्रोह के आकस्मिक हल्ले में अंग्रेजों को भावी संकट की सूचना मिलने से उस संकट का परिहार करने का अवसर मिल गया। अकल्पित हमले से दिल्ली का सिंहासन जैसे एक-दो दिन में उनसे झटक लिया गया, वैसे ही 31 मई को निश्चित पूर्व संकेत के अनुसार एक समय में यदि सब जगह विस्फोट होता तो सारे हिंदुस्थान का सिंहासन एक झटके में हथियाया जा सकता था। अ बवह योजना तो मेरठ के विद्रोह के कारण उलझ गई थी, फिर भी दिल्ली कब्जे में आ जाने से विद्रोह को राज्य क्रांति का स्वरूप मिल गया और इस असंभव वार्त्ता से एक विलक्षण चेतना का जन्म हो गया था। 1857 का स्वातंत्र्य समर -115
अब इस चेतना का लाभ उठाकर एकदम विद्रोह किया जाए या पूर्व नियोजित संकेत के अनुसार 31 मई की राह देखी जाए? दिल्ली के विद्रोह की वार्त्ता सुन अन्यत्र क्या योजना चल रही है? दिल्ली की जल्दबाजी से जैसा घोटाला हुआ वैसे ही अन्य स्थानों की सम्मति लिये बिना हम भी विद्रोह करें और घोटाला फैल गया तो क्या होगा? ऐसी अनेक अनिश्चिताओं के कारण क्रांतिकारी नेताओं को-आगे क्या होना है-उसकी प्रतीक्षा करते हुए अपनी-अपनी जगह रूके रहना पड़ा। मंद गति जैसा क्रांति का प्राण हरण करनेवाला दूसरा विष नहीं है। क्रांति का विस्तार जितना त्वरित और जितना आकस्मिक होता है उतनी ही उसकी विजय की संभावना अधिक होती है। यह विस्तार का वेग शिथिल तो शत्रु को संरक्षण का अवसर मिल जाता है। जो पहले उठते हैं उनका उत्साह यह देखकर घटने लगता है कि अपने साथ कोई नहीं आ रहा और जो बाद में आते हैं उनके रास्ते में बीच के अवसर का लाभ लेनेवाला चतुर शत्रु अनेक बाधाएं खड़ी कर देता है। इसलिए उठाव और प्रसार के बीच में अधिक समय जाने देना क्रांतियुद्ध के लिए हमेशा हानिकारक होता है। फिर भी जहां तक बने, एक साथ विद्रोह करना निश्चित होते हुए भी बीच में ही आ पड़े पेंच के कारण विभिन्न स्थानों के क्रांतिकारी नेताओं को न ठहरते बन रहा था और न आगे बढ़ते। क्रांतिकारी पक्ष की इस अपरिहार्य स्तब्धता का अंग्रेजों को बहुत लाभ हुआ। अंग्रेजों के पैर हिंदुस्थान में पड़ने के बाद से आज तक उन्हें ऐसी भयानक वार्त्ता सुनने का अवसर कभी भी नहीं आया था। इस मई माह में बैरकपुर से सीधे आगरा तक कोई सात सौ पचास मील में केवल एक गोरी रेजिमेंट थी। ऐसी स्थिति में क्रांतिकारी पक्ष के पूर्व संकेतानुसार यदि यह सारा प्रदेश एकदम उठ गया होता तो दस इंग्लैंड भी इकट्ठा हो जाते तो भी हिंदुस्थान कब्जे में न रहता। यह गोरी रेजिमेंट दानापुर में रखी गई थी। उधर पंजाब में सरहद पर पर्याप्त गोरी सेना थी। परंतु उसे उधर-से-अधिक गोरी सेना को जमा करना। उसी समय अंग्रेजों के भाग्य से ईरान की लड़ाई समाप्त हुई थी-इसलिए उस सेना को हिंदुस्थान जल्दी आने के आदेश हुए। ईरान की लड़ाई सामप्त होते ही अंग्रेजों ने चीन से बखेड़ा खड़ा कर उधर सेना भिजवाई थी। परंतु हिंदुस्थान में यह भयानक आंधी आते ही केनिंग ने चीन की ओर जानेवाली सारी सेना बीच में ही रोक लेने का निश्चय किया। इन दो सेनाओं के सिवाय रंगून में स्थित गोरी रेजिमेंट भी कलकत्ता में रख ली गई और मद्रास फ्युजिलयर नामक गोरी सेना को तैयार रहने को लिख गया। ये गोरी सेनाएं जब सभी दिशाओं से यथासंभव वेग से कलकत्ता के लिए चली थीं तब केनिंग ने सिपाहियों के मन को फिर से एक बार कब्जे में लेने का प्रयास किया। उसने कहा, "आपकी जाति और वर्ण विषयक रीति में हाथ डालकर हिंदुस्थान के धर्म को दुखाने का हमारा कोई इरादा नहीं हैं सिपाही चाहें तो कारतूस अपने हाथों से बना लें। कंपनी का नमक जिन्होंने खाया है उनका ही यह विद्रोह करना पाप है।" इस प्रकार की 1857 का स्वातंत्र्य समर - 116
बातों से भरा एक घोषणापत्र निकालने का अधिकार है या नहीं, जहां यही विवादास्पद विषय है वहां नया घोषणापत्र निकालने का अर्थ वह विवाद समाप्त करना नहीं बल्कि उसे चिढ़ाना है। लेकिन हिंदुस्थान के पास अब यह घोषणापत्र पढ़ने का समय नहीं है, क्योंकि दिल्ली में उसी समय घोषित दिव्य घोषणापत्र की ओर सबकी आंखें लगी हुई हैं। एक ही समय दो घोषणापत्र जारी हुए। कलकत्ता में गुलामी का, दिल्ली में स्वतंत्रता का। हिंदुस्थान को उस समय दिल्ली का घोषणापत्र भाया, इसलिए केंनिंग ने कलम तोड़कर कमांडर-इन-चीफ, दिल्ली को तुरंत तोपें दागने का ओदश दिया। कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन जब शिमला में था तब उसे दिल्ली के विद्रोह का तार मिला। उसे पढ़कर, अब क्या करना चाहिए, इसका विचार वह कर ही रहा था कि केनिंग ने उसे तुरंत दिल्ली जीतने का आदेश दिया। विद्रोहियों की योजना का या शक्ति का अंग्रेजों को इतना अज्ञान था कि उन्हें लगता था, दिल्ली एक हफ्ते में छीनी जा सकती है और एक बार दिल्ली जीती तो उस माह के अंत में विद्रोह का अंत हो जाएगा। पंजाब का मुख्य अधिकारी सर जॉन लॉरेंस भी दिल्ली पर कब्जा करने को जोर डाल रहा था। परंतु दिल्ली जीतना कितना कठिन है, इसका कनिंग और लॉरेंस की तुलना में कुछ अधिक सही अनुमान अॅन्सन को था, अतः समुचित सामग्री इकट्ठी करने के पहले दिल्ली की ओर नहीं जाने की नीति उसने बनाई। शिमला की ठंडी हवा छोड़ मुख्य सेना स्थल की ओर अॅन्सन आ भी न पाया था कि वहां शिमला में हुल्लड़ मच गया। गुरखाओं की नासिरी बटालियन ने विद्रोह किया, यह समाचार शिमला आते ही अंग्रेजों का धीरज छूट गया। उस वर्ष शिमला में बनाए गए हवादार बंगलों और वृक्षों के बगीचों में आज तक भोगे राजविलास का अब भयंकर किराया देना पड़ेगा। गुरखा पलटन आई, ऐसा एक शोर होते ही गोरी औरतें और बच्चे जिधर राह दिखे उस तरफ भाग निकले। इस भागमभाग में अंग्रेज पुरूषों ने स्वाभाविक ही महिलाओं को पीछे छोड़ दिया-और वह भी अपने सामान के थैले पीठ पर बंधे होते हुए। अंग्रेजी धैर्य का प्रदर्शन दो दिन निरंतर चलता रहाः लेकिन जब गुरखा न आए तो हारकर वह प्रदर्शन बंद करना पड़ा। इसी समय कलकत्ता में भी रोज ऐसा ही होता था। कलकत्ता के पास बैरकपुर की नेटिव रेजिमेंट ने विद्रोह किया, यह अफवाह बार-बार उठती और अंग्रेजों की औरतें, बच्चे और पुरुष रास्ते से पोर्ट की ओर दौड़ते दिखाई देते। कितनों ने इंग्लैंड का टिकट निकाल लिया, कितनों ने अपनी गठरियां बांधकर पोर्ट की ओर भागने की तैयारी रखी और अनेक दफ्तर के काम छोड़ कोने-कोने में छिपे रहते। ऐसा डर मेरठ और दिल्ली में था, फिर भी अंग्रेजों का कानपुर अभी बचा हुआ था! कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन ने अंबाला आते ही दिल्ली पर घेरा डालने के लिए सीजट्रेन तैयार करना शुरू किया। हिंदुस्थान पर आज तक कभी ऐसा संकट न आया था। अंग्रेजों की शक्ति की बंद मुट्ठी लाख की होते हुए भी अंदर की स्थिति शोचनीय थी। अॅन्सन को किसी 1857 का स्वातंत्र्य समर — 117
तरह भी जल्दी करना असंभव हो गया। अंग्रेजों के काले सिपाहियों को 'चल' कहते ही चलाया जा सकता था, परंतु अब गोरे सिपाहियों को केवल 'चल' कहने से कैसे चलेगा? उनका एक-एक का दिमाग और आज तक बढ़ता मिजाज अब एकाएक कैसे संभले। उसमें भी अब नेटिवों से पहले जैसी हर तरह की सहायता मिलना पूरी तरह असंभव था। गाड़ियां मिली नहीं, मजूर मिले नहीं, रसद मिली नहीं, जख्मी लोगों के लिए डोली मिली नहीं। ऍडज्युटेंट, क्वार्टर मास्टर, मेडिकल चीफ-हर कोई अपने-अपने विभाग की तैयारी करना छोड़ –नकार' का घंटा बजाने लगा। हिंदुस्थानी लोगों के आश्रय बिना अंग्रेजी सत्ता धूल पर की गई लिपाई जैसी है। सन् 1857 में इस कुचली हुई धूल में थोड़ा चैतन्य आते ही अंग्रेजों को अंबाला से दिल्ली तक आना कठिन हो गया। क्योंकि-"Natives of all classes stood aloof, waiting and watiching the issue of events. From the capitalists to the coolie al shrunk alike from rendering assisatance to those whose power might be swept away in a day."^{53} उपर्युक्त लेखक कहता है, हिंदुस्थान के नेटिव ऐसे ही चुप हो बैठते तो अंग्रेजी सत्ता वास्तव में एक दिन में फेंक दी गई होती। परंतु सन् 1857 में वह दिन उगनेवाला नहीं था। सन् 1857 उस दिन के भोर की रात थी। जिन्हें वह भावी भोर दिखने लगी वे नींद छोड़कर उठे। परंतु जिन्हें वह तत्कालीन रात ही दिखी वे अपना गुलामी का खींचा हुआ ओढ़ावन और खींचकर सो गए। इन उनींदे लोगों में कुभकर्ण का सम्मान पानेवाले पटियाला, नाभा और जींद-ये तीन रियासतें थी। इन रियासतों के हाथों में सन् 1857 की क्रांति का जीवन या मृत्यु थी। ये रियासतें दिल्ली और अंबाला के बीच में थी, अतः उनके आधार के बिना अंग्रेजों की पीठ बिलकुल सुरक्षित रहनेवाली नहीं थी। ये रियासतें अन्य रियासतों की तरह केवल चुप रही होती तो भी क्रांति सफल होने की बहुत संभावना थी। परंतु पटियाला, जींद और नाभा-इन तीनों ने जब अंग्रेजों से भी अधिक क्रूरता से सन् 1857 की राज्य क्रांति को चोट पहुंचाना प्रारंभ किया तब पंजाब और दिल्ली, इन दो हिस्सों की यह जंजीर एकाएक टूट गई और उस क्रांति के अवयवों की संगति क्षणार्थ में नष्ट हो गई। इन रियासतों ने दिल्ली के बादशाह की ओर से आए निमंत्रण को धिक्कार दिया; निमंत्रण देने आए सवारों को मार डाला;स्वयं के खजाने से अंग्रेजों पर धन की सतत वर्षा की। जिस प्रदेश से अंग्रेजी सेना जानेवाली थी उस प्रदेश को सैन्य संरक्षण दिया; अंग्रेजों के साथ निशान को संभालने घर-द्वार छोड़कर दौड़ने आए तब इन सिख रियासतों ने-इन गुरू गोविन्द सिंह के चेलों ने-अत्यधिक क्रूरता से उनका वध किया, यंत्रणा दी ।^{54} 1857 का स्वातंत्र्य समर – 118 ^{53} 1. के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 2। ^{54} 2. इस वर्णन से अधिक हृदयद्रावक वर्णन इ57 के क्रांतियुद्ध में मिलना मुश्किल है। जिस प्रदेश से अंग्रेजों को संरक्षण मिलता था उसी प्रदेश के स्वधर्म और स्वराज्य के लिए हथेली पर सिर लिये
पटियाला, नाभा और जींद की सहायता मिलना पक्का होते ही अंग्रेजों में विलक्षण धीरज आ गया। पटियाला के राजा ने अपने भाई के साथ उत्तम सेना और तोपें देकर उसे ठाणेश्वर का रास्ता रोकने भेज दिया और जींद के राजा ने पानीपत को चौकी पर कब्जा जमाया। ये दो अति महत्त्वपूर्ण चौकियां इस तरह परस्पर रोकी जाने से अंबाला से दिल्ली तक के मार्ग और पंजाब का निरंतर यातायात-ये दो बहुत नाजुक बातें संरक्षित हो गईं और कमांडर-इन-चीफ ने 25 मई को अंबाला छोड़ दिल्ली की ओर स्वयं कूच किया। पर दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का समाचार सुनने के पश्चात् उसके धक्के से ॲन्सन पूरी तरह हताशा से भर गया था। उसमें भी शिमला की ठंडी हवा में जो आज तक कभी अनुभव नहीं हुई, ऐसी गरमी में उसे झुलसना पड़ा था। इन मानसिक और शारीरिक चिंताओं से कृश हुआ वह कमांडर-इन-चीफ करनाल तक आते-आते 27 मई को कालरा की बीमारी से मर गया। उस दिन उसके अधीनस्थ अधिकारी बर्नार्ड ने कमांडर-इन-चीफ के अधिकारों को संभाला। इस तरह पुराने कमांडर-इन-चीफ को गाड़कर अंग्रेजी सेना नए कमांडर के नेतृत्व में दिल्ली की ओर बढ़ी। उस समय उस अंग्रेजी सेना में इतना उत्साह था कि सुबह लड़ाई आरंभ कर शाम को दिल्ली शहर में शत्रु का रक्त गटगट पिएंगे, ऐसी घमंड भरी बातें वे खुलेआम करने लगे। गोरे सिपाहियों के काले हृदय में कितना हलाहल भरा हुआ है, यह सेना अंबाला से दिल्ली आ रही थी उस समय वे पूरे जग को यह दिखा रहे थे कि मेरठ की नेटिव सेना का क्या? वे तो हर तरह से काफिर (Heathen) थे। उन्होंने कारतूसों के निर्माण में हड्डियों का चूरा मिलाने की गप पर विश्वास कर मेरठ और दिल्ली में निरपराध अंग्रेजों को कत्ल किया। यह नेटिव के देश और धर्म का जंगलीपन था; परंतु इसके नीचे जो ढका हुआ है, संभव है, वह कभी स्पष्टता से प्रकट भी न हो। क्योंकि काफिरों की अपेक्षा ईसाई गप्पों की विश्वसनीय बातों और जंगलीपन में सुधार को ही परमेश्वर अधिक धिक्कारेगा और उस गंदगी को धोने के लिए उसे रक्त की वर्षा करनी पड़ेगी। अंबाला से दिल्ली की ओर आते समय हजारों गांवों में से जिन-जिनपर हाथ डाला जा सका, उन सारे भारतीय आदमियों को एक साथ पकड़ा जाता और तुरंत आधे घंटे में उनका कोर्ट मार्शल कर पंक्ति में खड़ा कर, सबको फांसी का दंड देकर, तरह-तरह की यंत्रणाएं देकर मार डाला जाता। मेरठ में नेटिवों ने भी अंग्रेजों को मार डाला 55 1857 का स्वातंत्र्य समर – 119 55 स्वकीयों को केवल रास्ता भी न मिले! इतना ही नहीं अपितु उनमें के हजारों लोगों को शत्रु से भी अधिक यंत्रणा देकर मा डाला जाए! इस अमानुषकि पाप का प्रायश्चित्त हिंदुस्थान के इतिहास में कभी हो तो हो। इस यंत्रणा का वर्णन –'टू नेटिव नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी इन दिल्ली' में देखने को मिलेगा।
था। परंतु वह जंगलीपन से अर्थात् एक आघात से मारा गया था। परंतु अंग्रेजों ने उस त्रुटि को सुधारकर बहुत अच्छा किया। वे कोर्ट मार्शल के आगे केवल दृष्टिपात होते ही फांसी का दंड दिए गए सैकड़ो लोगों को, उनके फांसी के खंभे खड़े करते हुए ही पैशाचिक यंत्रनाएं देने लगते, उनके सिर के बाल तड़ातड़ तोड़ते, उनके शरीर में बैनेट के सिरे से आर-पार छेद किए जाते और तत्पश्चात् इन सारी यंत्रणाओं और प्रत्यक्ष मृत्यु को भी जिसके उन गरीब, निर्दोष और निरपराध हिंदू लोगों के मुंह में, उनके फांसी पर चढ़ने सिपाही उन गरीब, निर्दोष और निरपराध हिंदू लोगों के मुंह में, उनके फांसी पर चढ़ने को तैयार होने पर भी, जबरन गाय का कच्चा मांस कुचल-कुचलकर भरते।56
वह कोर्ट मार्शल क्या झमेला था, यह जंगली पाठक वर्ग को बताना रह ही गया। गांवों के निरपराध लोगों को सैकड़ों की संख्या में पकड़कर उनका ‘न्याय’ किया जाता। यह न्याय की घुट्टी यूरोपियन राष्ट्र पहले से ही पिए होते हैं। नीदरलैंड की राज्य क्रांति में अल्वा ने भी ऐसा ही एक न्यायसन स्थापित किया था। उस न्यायसन की कार्यवाही इतने ध्यान से चलती कि वहां के न्यायाधीश बीच में ही सो जाते और दंड देने का समय आने पर उन्हें हिलाकर जगाए जाने पर जितने कैदी सामने दिखते उतनों की ओर एक गंभीर नज़र डालकर वह कहते, “चढ़ाओ इन्हें फांसी पर!” नीदरलैंड के इतिहास में अंकित इस ‘यमासन’ को अंग्रेजों ने सुधरकर विकसित किया था, इसमें कोई शंका नहीं, क्योंकि इनके न्यायाधीश कभी भी सोते नहीं थे। इतना ही नहीं, कोर्ट मार्शल पर नियुक्त होने के पूर्व उन्हें यह शपथ लेनी पड़ती थी की हम निरपराध या अपराधी यह भेद न करके सबको फांसी का दंड देंगे। यह पवित्र शपथ लेकर अंग्रेज लोग निरपराध नेटिव को फांसी पर चढ़ाने के लिए जहां न्याय करते हैं उस स्थान को अंग्रेजी भाषा में ‘कोर्ट मार्शल’ कहा जाता है।
मेरठ और दिल्ली में मारे गए मुट्ठी भर अंग्रेज लोगों के लिए हजारों निरपराध लोगों से ऐसा पैशाचिक प्रतिशोध लेते हुए कमांडर बर्नार्ड दिल्ली के पास पहुंचने के पहले मेरठ में शेष बची गोरी सेना से मिलने का अवसर देख रहा था। मेरठ में अंग्रेजों की बड़ी सेना थी, यह पहले कहा जा चुका है। वह सेना अंबाला से निकली सेना से
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56 1. होम्स कृत-‘हिस्ट्री ऑफ द सीज ऑफ दिल्ली’। 2. ‘सैनिक पंच न्यायालय के आसन को ग्रहण करने के पूर्व प्रत्येक पंच द्वारा यह शपथ ग्रहण की जाती थी कि मैं बंदी के अपराध अथवा निर्दोष होने की चिंता न करते हुए उसे प्राणदंड दूंगा। और यदि उनमें से कोई इस विवेकहीन निर्णय के विरूद्ध अपना मुख खोलता भी था तो उसके अन्य साथी उसका मुख बंद कर देते थे। निर्णय के तत्काल उपरांत ही फांसी के फंडों पर जाते हुए बंदियों को प्रताड़ना दी जाती थी और उनका उपहास भी किया जाता था। उन्हें अनाड़ी-हत्यारे भांति-भांति की यंत्रणाएं देते थे और पड़े-लिखे अधिकारी मनोरंजन करते थे।’ —होम्स कृत-‘हिस्ट्री ऑफ द सेपॉय वार’ पृष्ठ 124
मिलने नीचे उतर रही थी। परंतु इन सेनाओं के मिलने के पहले ही उनसे दो-दो हाथ करने क्रांतिकारी दिल्ली से आगे आए हुए थे। हिंडन नदी के किनारे दोनों 30 मई को मिले। क्रांतिकारियों का दायां बाजू तोपों से सुरक्षित था। अतः उस ओर मुंह मारने का प्रयास करने में अंग्रेजों को सफलता नहीं मिल रही थी। दाई ओर तोपों और संगीनों की लड़ाई अच्छी जम रही थी, इतने में अंग्रेजों की मार के सामने बिल्कुल न टिकते हुए क्रांतिकारियों का बायां बाजू उखड़ने लगा। यह देखते ही उनकी पंक्तियों में भगदड़ मच गई और पांच तोपों को शत्रु के हाथों छोड़कर वे दिल्ली लौट आए। इस पहली लड़ाई में तत्काल मृत्यु गले लगाई। अन्य अपने कर्तव्य करें न करें, परंतु स्वयं मरने के पहले अपना जीवन किसी तरह सार्थक कर जाऊं ऐसी उदात्त स्फूर्ति से उस 11वीं रेजिमेंट के सिपाही ने अंग्रेजों के हाथों तोप पड़ेगी, यह जानते ही जान-बूझकर तोप और बारूदखाने में बंदूक चलाई। उसके जगी धमाके में कैप्टन एंड्रयूज और उसके सारे साथी जलकर सिरकमल अर्पित करने के बाद उस देशवीर ने अपना भी सिरकलम उसकी सेवा में जिस तरह अंग्रेज इतिहासकार रम जाते हैं, वैसे ही केवल राष्ट्र-कार्य के लिए प्राण निछावर करनेवाले उस शूर सिपाही के स्तुति स्तोत्र गाने में क्या उसके देशबंधुओं को नहीं रंगना चाहिए? पर इस शहीद का नाम भी इतिहास को ज्ञात नहीं। इस देशवीर के लिए 'के' कहता है-“विद्रोहियों में भी ऐसे अनेक शूरवीर विद्यमान थे जो अपने राष्ट्र-कार्य की सफलता हेतु प्रसन्न वदन मृत्यु का आलिंगन करने को तत्पर रहते थे तथा काल को भी चुनौती देते थे।57 इस पहली लड़ाई में अंग्रेजों की पूर्ण विजय हो जाने से कलकत्ता तक इस अनुमान से डाक द्वारा यह पूछताछ होने लगी कि अब एक-दो दिन में दिल्ली गिरने को है; परंतु वास्तविक स्थिति कितनी अलग थी। इस अभूतपूर्व, आकस्मिक और अस्त-व्यस्त क्रांतियुद्ध का विकराल स्वरूप देखकर भी वह पहला धक्का सहकर उस पर अंकुश लगाने की खूबी और हिम्मत यद्यपि उत्पन्न नहीं हुई थी, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रुकना नहीं, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रुकना नहीं, यह इच्छा अवश्य अति उत्कटता से दिल्ली के हजारों नागरिकों के हृदय में उछल रही थी और इसीलिए दिनांक 30 मई की पराजय के लिए सारी रात नागरिकों द्वारा धिक्कारे गए सिपाही फिर से 31 मई को बाहर निकले। क्रांतिकारियों की तोपों की भारी मार शुरू होते ही अंग्रेजों ने भी अपनी तोपें दागनी शुरू की। क्रांतिकारियों की तोपें आज अच्छे अनुशासन और बड़ी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 121 57 के कृत-'हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्युटिनी', खंड 2, पृष्ठ 138।
जिद से हमला कर रही थीं, इसलिए अंग्रेजों को प्राणहानि भी बहुत होने लगी। मई माह की धूप अंग्रेजों को असह्य थी सो अलग। फिर भी अंग्रेजों ने कल की तरह हमला करने का प्रयास किया, पर वह सफल नहीं हो रहा था। अंत में शाम को अंग्रेज अंतिम हमला करने निकले। इसके आगे उन्हें रोकना कठिन होगा, यह देखते ही क्रांतिकारियों ने तोपों का एक भयानक हमला किया और उस हमले से अंग्रेजों की तितर-बितर हुई सेना फिर से एकत्रित हो तब तक अपनी तोपें संभालते हुए रणांगण छोड़ दिया। कोई बात नहीं एक दिन में स्थिति कुछ सुधरी ही है। कल और ऐसी तीसरी पराजय झेली तो भी अंग्रेजों की दुर्दशा होगी, क्योंकि अब उनमें क्रांतिकारियों से छोटी हाथापाई करने लायक भी शक्ति नहीं है। जून की पहली तारीख को ऐसी चिंता में पड़े अंग्रेजी कैंप के पीछे से एक सेना आती दिखी। अपनी पिछाड़ी पर चली आ रही यह सेना काले रंग की है, यह देखते ही अंग्रेजों में हड़बड़ी मच गई और वे किसी तरह संरक्षण के लिए तैयार होते, तभी उनके ध्यान में आया कि वह क्रांतिकारियों की सेना नहीं है। अपितु मेजर रीड की अधीनता में अंग्रेजों की ओर से लड़ने गुरखे आ रहे हैं। अंबाला से नीचे आ रही अंग्रेजी ऐसी स्थिति में बेचारे गरीब क्रांतिकारी क्या करेंगे? ये दोनों अंग्रेजी सेनाएं 7 जून को एक-दूसरे से मिल गईं। इस समय दिल्ली पर घेरा डालने के लिए तैयार करवाई गई सीजट्रेन भी नाभा के राजा की सहायता से सही-सलामत आ पहुंची। इस सीजट्रेन के अंबाला पहुंचते ही उसे साथ लेकर 5वीं रेजिमेंट सहित अंग्रेजों की इकट्ठी हुई वह सेना हमला करने के लिए दिल्ली के पास के अलीपुर गांव तक आ पहुंची। अंग्रेजी सेना क अलीपुर पहुंचने का समाचार सुनते ही क्रांतिकारी फिर से दिल्ली के बाहर निकले और उनका बुंदेल की सराय नामक स्थान पर अंग्रेजी सेना से सामना हुआ। इस समय अंग्रेजों की सेना भरपूर सामग्री, उत्तम सेनापति, ताजा दम सैनिकों और लाभ का स्थान-इतनी बातों से युक्त थी तो क्रांतिकारियों की ओर उनकी सदिच्छा के सिवाय दूसरी कोई शक्ति नहीं थी। जिसने रणभूमि का कभी मुंह भी नहीं देखा, ऐसे एक राजपुत्र पर सेनापतित्व का दायित्व था। उनकी संख्या में सिपाहियों से असैनिक ही अधिक थे और उसमें भी अपने ही देशबंधु सिख और गुरखा-फिरंगियों की ओर हाने से उनका मन निरूत्साहित था। ऐसी स्थिति में यह लड़ाई एक बहुत बड़ा तमाशा होगा, की विलक्षण चेतना उन सिपाहियों के मन में उत्पन्न हो गई थी, जिससे उन्होंने अंग्रेजी सेना को टक्कर देने में ऐसा कमाल किया कि अंग्रेजों को जल्दी ही समझ में आ गया, यह तमाशा न होकर वास्तव में जान लेने या देनेवाली लड़ाई है। दिल्ली की सेना की तोपें इतनी जिद और जोर से जोर मार करने लगीं कि ऐसा लगने लगा जैसे उसके सामने अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 122
सेना की कुछ भी नहीं चलेगी। अंग्रेजी तोपखाने के गोलंदाज और अधिकारी चट-पट मरने लगे और क्रांतिकारियों की तोपों की मार और भी तेज हो गई। यह देखते ही अंग्रेजों ने अपनी पैदल सेना को तोपों पर हमला करने का कड़ा आदेश दिया। अंग्रेजी पैदलों का वह हल्ला देखते-ही-देखते क्रांतिकारियों के तोपखाने से आकर भिड़ गया, फिर भी उस दिन क्रांतिकारी तोपें छोड़कर एक इंच भी इधर-उधर नहीं हुए। स्वराज्य और स्वदेश के लिए लड़नेवाले वीरों को शोभा दे, ऐसी ही अटल रीति से अंग्रेजी सेना की संगीन छाती में घुसने तक उन्होंने अपना स्थान नहीं छोड़ा। परंतु ऐसे शूर मर्दों को अपनी कृति से उत्तेजना देना तो दूर, उनके साथ अंत तक केवल खड़ा रहनेवाला सेनापति भी उन्हें नहीं मिला था, बल्कि जब अंग्रेजों की संगीन छाती में घुसने के बाद भी अपना स्थान छोड़कर एक पैर भी पीछे न हटानेवाले वीर स्वदेश और स्वधर्म के लिए प्राण न्योछावर कर रहे थे तो उनका कमांडर-इन-चीफ तोप की पहली आवाज होते ही सिर पर पांव रखकर दिल्ली भाग गया था। इतने में उस अभागी सेना क बाई ओर अंग्रेजों के घुड़सवार टूट पड़े और उनपर पीछे से होपग्रांट ने घुड़सवार-तोपखाने से हमला किया। इस तरह अपनों और परायों द्वारा अनाथ हुई वह सेना दिन भर लड़ी गई लड़ाई का कुछ भी श्रेय न मिलने पर तितर-बितर होकर दिल्ली में घुसने लगी। वैसे ही धकियाते जाने का आदेश दिय और वह अंग्रेजी सेना उस दिन शाम तक दिल्ली की दीवारों से आ भिड़ी। उस दिन की लड़ाई में क्रांतिकारियों का शहर-बाहर का सारा कब्जा नष्ट हो गया और अंग्रेजों को दिल्ली पर मोरचा लगाने के लिए अति उत्तम स्थान मिल गये। यहां यह कहना आवश्यक है कि उस दिन की लड़ाई में सीमूर की गुरखा पलटन ने बड़ा पराक्रम दिखाया, इसलिए अंग्रेजी इतिहासकार उन्हें बहुत शाबासी देते हैं। स्वदेश स्वतंत्रता के गले पर छुरी चलाने सदा-सर्वदा के लिए शापित शूरता दिखाने के कारण उन गुरखों के नाम सदा-सर्वदा के लिए शापित हुए हैं, इसमें तिल भर भी शंका नहीं। इन देशद्रोही गुरखों की सहायता से अंग्रेजों ने बुंदेल का सराय की लड़ाई जीती अवश्य, परंतु इस जय ने उनके मनोराज्य को धूल में मिला दिया; क्योंकि दिल्ली के बाहर दोपहर लड़ाई लड़कर उस दिन की रात दिल्ली के राजमहल में रिपुरक्त का प्राशन करते बिताएंगे, ऐसी जो अंग्रेज सैनिकों को आशा ही नहीं भरे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के रक्षणार्थ म्यान में केवल असैनिक लोग ही नहीं भरे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के रक्षणार्थ म्यान से बाहर निकली तलवारें भी सिद्धांतनिष्ठा के संकल्प के साथ उस प्राचीर पर बीच-बीच में झलकती हैं, यह अप्रिय सत्य अंग्रेजों की नजर में इस लड़ाई ने ला दिया। इस लड़ाई में अंग्रेजों के एक सौ चौंतीस लोग घायल हुए तथा चार अधिकारी और सैंतालीस लोग मारे गए। परंतु इन सब मृतकों में अंग्रेजी लश्कर में दुःख और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 123
उदासीनता फैलानेवाली जो मृत्यु हुई वह ऍडज्यूटंट जनरल कर्नल चेस्टर की थी। लड़ाई की भीड़ में यह मृत्यु हुई। क्रांतिकारियों की ओर की हानि बताते हुए अंग्रेज इतिहासकार उपन्यासकारों से भी बढ़-चढ़कर कैसा वर्णन करते हैं, यह आगे दिखेगा। परंतु इस प्रथम महत्त्वपूर्ण लड़ाई की गड़बड़ में भी विशेष रूप से उल्लेखनीय एक बात अवश्य कहनी है कि उस दिन अंग्रेजों के हाथ लगी क्रांतिकारियों की तोपों की संख्या एक 13 कहता है और दूसरा पूरी 26, जबकि ये दोनों ही वहां उपस्थित सरकारी अधिकारी थे। इस तरह दिनांक 98 जून को संध्या समय अंग्रेजी सेना ने दिल्ली की प्राचीर तक आकर तंबू ठोंके। अंबाला और मेरठ से दिल्ली की ओर अंग्रेजी सेना को अबाधित रीति से लाने का कार्य-पंजाब की स्थिति पर पूरी तरह अवलंबित होने से उस महत्त्वपूर्ण प्रांत में मेरठ के विद्रोह के क्या परिणाम हुए, वहां के स्वदेशी लोगों ने क्या प्रयास किए और उनका प्रतिकार करने के लिए अंग्रेजों के सोचे हुए उपायों को कितनी सफलता प्रांत को पूर्णतया ब्रिटिशों के अधीन लाने के बाद डलहौजी ने उन लोगों का सैनिकी बाना और स्वतंत्रता प्रेम, इन दो सद्गुणों का नाश करनेवाली अपनी राज्य व्यवस्था की नीति रखी। सर हेनरी लॉरेंस और सर लॉरेंस इन दो प्रमुख कूटनीतिज्ञों को प्राप्त इन नवीन प्रांत की राज्य व्यवस्था मिलते ही उन्होंने पंजाब के लोगों को पूरी तरह निःशस्त्र कर दिया। उनमें से अधिकतर सिख सिपाहियों को उन्होंने अपनी सेना में मिला लिया। उत्तरी हिंदुस्थान की अंग्रेजी सेना का अधिकांश ऊपर लाकर उसके डेरे पूरे पंजाब भर में फैला दिए और इस योजना से सारे सूत्र चलाए कि सब लोग खेती की ओर ध्यान देकर अपनी उपजीविका कमाने के नशे में गर्क हो जाएं। लोगों के किसान हो जाने पर उनके सैनिकी गुण घुटते जाते हैं, वे शांति के बहुत भूखे हो जाते हैं और उनकी खेती में बाधक राज्य क्रांतियों की लहरों को उनकी अनुमति सहज नहीं मिलती। ऐसी गहरी राजनीति सिंह का साम्राज्य और स्वतंत्रता नष्ट हुए दस वर्ष बीतते-बीतते पंजाब में हर कोई तलवार छोड़कर हल की मूंठ पकड़ने लगा और जिसने स्वयं हल नहीं पकड़ा ऐसे सिख सिपाहियों ने अंग्रेजी लश्कर में प्रवेश क रवह (हल) अंग्रेजों की ओर से अपनी मातृभूमि पर चलाया। ऐसी स्थिति में पंजाब में वास्तव में कुछ भी गड़बड़ नहीं होगी, ऐसा उस प्रांत के मुख्य अधिकारी जॉन लॉरेंस को विश्वास था। मई माह प्रारंभ होने तक अन्य अंग्रेज कूटनीतिज्ञों की तरह उस प्रांत के मुख्य अधिकारी सर जॉन लॉरेंस 'मरी' हिल्स की ठंडी हवा में जाने को तैयार हुआ कि तभी 10 मई को मेरठ के विद्रोह की और 11 मई को दिल्ली स्वतंत्र होने का विद्युत समाचार पंजाब पर आ गिरा। यह सुनते ही पंजाब के उस 1857 का स्वातंत्र्य समर - 124
चाणक्य (धूर्त) चीफ कमिश्नर को समाचार की भयंकरता पूरी तरह समझ में आ गई और अंग्रेजी साम्राज्य को उलट देनेवाले इस आघात से निपटने वह रावलपिंडी में ही जमकर बैठ गया। इस समय पंजाब की अंग्रेजी सेना का अधिकतर हिस्सा मियां मीर में था। मियां मीर की छावनी, लाहौर के बहुत पास थी, अतः लाहौर के किले पर उन्हीं सिपाहियों में से चुने हुए सिपाही सुरक्षा के लिए रखे गए थे। इस छावनी में देशी सिपाही यूरोपियन सोल्जर से चार गुना अधिक होते हुए भी मेरठ का सामचार आने तक उनके लिए अंगेजी अधिकारियों के मन में कोई विशेष आशंका नहीं थी और इसीलिए वे क्रांतिकारियों से मिले हुए हैं या नहीं, यह एकाएक निश्चित करना बहुत कठिन हो गया। उस समय लाहौर में रॉबर्ट मोंटगुमरी मुख्य अधिकारी था। मोंटगुमरी ओर जॉन लॉरेंस ये दोनों ही डलहौजी की प्रशिक्षा में तैयार हुए थे, अतः त्वरित बुद्धि और अकस्मात् आ पड़े संकट से पर पाने में आवश्यक साहस और धैर्य में प्रवीण थे। फिर भी पंजाब के सिपाहियों में स्वतंत्रता की चेतना कहां तक उत्पन्न हुई है, इसकी सही जानकारी प्राप्त करना आवश्यक था। इस कार्य पर एक ब्राह्मण ने अपना देशद्रोही कार्य उत्तम रीति से सिद्ध करके मोंटगुमरी से निवेदन किया कि "साहब, वे सारे फसादी हैं और फसाद में बुरी तरह डूबे हुए हैं।" ऐसा कहकर उसने अपना हाथ अपने गले से लगाकर दिखाया। इस ब्राह्मण की यह वार्त्ता सुनकर अंग्रेजों की आंखों का भ्रम-पटल हट गया। विद्रोह की गुप्त तैयारी केवल उत्तरी हिंदुस्थान में ही नहीं अपितु उसकी ज्वालाएं सारे पंजाब में उचित अवसर पर उफन पड़ने तक दबी बैठी हैं, यह उन्हें स्पष्ट नजर आ गया और यह भयानक रहस्य प्रकट करनेवाले मेरठ के विद्रोह को धन्यवाद देते हुए मोंटगुमरी ने मियां मीर की नेटिव सेना को तत्काल निःशस्त्र करने का आदेश दिया। मई माह की तेरहवीं तारीख को सुबह के समय मियां मीर में एक जनरल परेड बुलाई गई। सिपाहियों को इसकी कोई पूर्व सूचना न मिले, इसलिए उस सुबह के पहले दिन सारे अंग्रेज लोगों के लिए एक जंगी सिपाहियों के ध्यान में आने के पूर्व ही उन्हें अचानक यूरोपियन सोल्जरों, घुड़सवारों ओर तोपखाने के घेरे में ले लिया गया और इस कपट नाटक का नेटिव सिपाहियों को पता चलते ही हमेशा की तरह परेड के बीच ही एकाएक तोपखाने को बत्ती लेकर तैयार रहने का आदेश हुआ और यह विचित्र सुनकर चकित उन रेजिमेंटों को हथियार नीचे रखने के आदेश दिए गए। गुस्से से गुर्राए पर प्रदीप्त तोपखाने के कारण हताश उन हजारों नेटिव सिपाहियों ने अपने-अपने हथियार नीचे डाले और एक अक्षर भी बोले बिना अपनी-अपनी लाइनों की ओर लौट गए। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 125
अति शूर और जिसके पराक्रम से ही अफगानिस्तान में अंग्रेजों के प्राण बचे थे, उसी पंजाबी सेना को मयां मीर में निःशस्त्र करने की इस विधि-प्रक्रिया में ही वहां की सेना की एक टुकड़ी लाहौर के किले पर भेजी गई। उस टुकड़ी ने लाहौर किले के तोपखाने पर नियुक्त अंग्रेजी सोल्जर की सहायता से वहां के नेटिव सिपाहियों को निःशस्त्र कर किले से निकाल दिया ओर किला अपने कब्जे में ले लिया। 13 मई को अंग्रेजों ने जिस फुरती से यह साहस भरा कृत्य पूरा किया उस फुरती से यदि एक अणु मात्र भी ढील हुई होती तो उस दिन से पंद्रह दिन के अंदर सारा पंजाब विद्रोह की आग में जलने लगा होता; क्योंकि पेशावर, अमृतसर, फिल्लौर, जालंधर इन अलग-अलग स्थानों पर स्थित पलटनें बड़ी उत्सुकता से इसकी प्रतीक्षा कर रही थी कि मियां मीर के सिपाही लाहौर के किले पर कब टूट पड़ते हैं। फिरंगियों द्वारा मियां मीर के सिपाहियों को निःशस्त्र कर लाहौर का किला कब्जे में लेने का समाचार फैलते ही पंजाब भर में अंग्रेजों का दबदबा फिर बढ़ने लगा।^{58} परंतु लाहौर के दुर्ग से भी अति महत्त्वपूर्ण स्थान अमृतसर का गोविंदगढ़ था। अमृतसर नगर सिखों के लिए काशी क्षेत्र होने से यहां किसी प्रकार की गड़बड़ी होने पर उन सारे लोगों के संतप्त हो जाने की संभावना थी, इसलिए क्रांतिकारी सिपाहियों की उस पर अधिक नजर थी। मियां मीर के निःशस्त्र सिपाही गोविंदगढ़ जीतने के लिए अमृतसर की ओर आ रहे हैं, यह अफवाह उठ जाने से अंग्रेजों में दहशत फैल गई और उन्होंने अमृतसर को बचाने के लिए सिख और जाट किसानों से विनती की। इस विनती को उन राजनिष्ठ देशद्रोहियों ने माना और अमृतसर का किला-लाहौर के किले की तरह ही अंग्रेजों ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया। इस तरह 15 मई के पहले ही लाहौर और अमृतसर, ये दो शहर तात्कालिक रूप से क्रांति की ज्वालाओं से सुरक्षित कर लिए गए। इतनी सुरक्षा होते ही सर जॉन लॉरेंस केवल अपने मातहत प्रदेश की चिंता नहीं कर रहा था; दिल्ली का समाचार मिलते ही उसने कहा कि यह सिर्फ विद्रोह नहीं है अपितू राज्य क्रांति होनेवाली है। फिर भी उसका अनुमान था कि दिल्ली यदि झटके में वापस आ गई तो फिर भी उसका अनुमान था कि दिल्ली यदि झटके में वापस आ गई तो फिर और कहीं विद्रोह नहीं होगा। इसी आधार पर उसने जनरल अॅन्सन को जून माह के पहले दिल्ली जीत लेने के लिए पत्र-पर-पत्र लिखे। इतना ही नहीं अपतुि पंजाब में सब ओर शांति बनाए रखने का काम अपने जिम्मे लेकर दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर – 126 58 “यदि पंजाब हाथ से चला जाता तो हमारा सर्वनाश हो जाना निश्चित था। ऊपरी प्रदेश में सेना पहुंचने से पहले ही सभी अंग्रेजों की अस्थियां धूप में सूखने के लिए डाल दी गई होतीं। इस संकट से बचकर पूरब में अपनी सत्ता पुनः स्थापित करना तथा गर्व से माथा ऊंचा उठाना इंग्लैंड के लिए असंभव ही हो जाता। –लाइफ ऑफ लॉर्ड लॉरेंस
पर हमला करने के लिए और अंबाला में सेना की कमी को पूरी करने के लिए पंजाब से लश्कर भेजना प्रारंभ किया। इस सहायता की पहली खेप डॉली के अधीन भेजी गइ गाइड कोर रेजिमेंट थी। जॉन लॉरेंस का डॉली की बहादुरी पर बहुत विश्वास था और इसीलिए दिल्ली पर चढ़ाई करने के लिए उसने उसी को चुनां डॉली अपनी रेजिमेंट लेकर मंजिल-दर-मंजिल दिल्ली की ओर बढ़ा और बुंदेल की सराय की लड़ाई के दूसरे दिन वहां की अंग्रेजी सेना से आकर मिल गया। दिल्ली के घेरे में अब दो नेटिव रेजिमेंट हो गई थी-एक गुरखों की रीड के अधीन और दूसरी डॉली के अधीन पंजाब से आई हुई। इन दोनों रेजिमेंटों पर अंग्रेजों की बड़ी कृपा थी और वह अनुचित थी, यह कौन कहे? इन नेटिव रेजिमेंटों ने उस कृपा के बदले वैसा ही देशद्रोह किया था। डॉली की रेजिमेंट के दिल्ली की ओर रवाना होने के बाद सर जॉन लॉरेंस ने पंजाब की कुल परिस्थिति का सूक्ष्म निरिक्षण किया। उस प्रदेश में हिंदू, सिख और मुसलमानों का आपस में अखंड द्वेष शुरू था। उत्तर हिंदुस्थान में हिंदू और मुसलमान दोनों को ही स्वदेशाभिमान का जैसा चैतन्य मिला हुआ था वैसा पंजाब के लोगों को उस समय मिला नहीं था। वास्तव में उनकी स्वतंत्रता गए दस वर्ष भी नहीं हुए थे। अंग्रेजों के कंठनाल पर सन् 1949 में जो सिख सिपाही कुल्हाड़ी चला रहे थे वे ही 1857 में उनके गले क्यों लगे क्यों लगने लगे, इस विलक्षण कूट प्रश्न का खुलासा इसी बात में होनेवाला है कि उनकी स्वतंत्रता जाते-न-जाते ही सन् 1857 की क्रांति आ गई थी। मुसलमानों की परतंत्रता पर जिस शूर और स्वाभिमानी जाति को इतना गुस्सा आया था कि सौ वर्ष तक अखंड लड़ाई कर अंत में पंजाब को स्वतंत्र किए बिना उन्होंने तलवार नीचे नहीं रखी, उसी 'खालसा' पंथ के अनुयायियों ने अंग्रेजों की गुलामी को इतना चाहा हो, ऐसा बिलकुल नहीं है। पर अंग्रेजों का राज गुलामी है या नहीं, यह उन सिपाहियों की बुद्धि में पूर्णता से आ भी नहीं पाया कि सन् 18567 आ गया। अंग्रेजों का राज हिंदुस्थान पर ऐसे ही समय आया जिस समय हिंदुस्थान में एक ऐतिहासिक जल प्रलय शुरू हो गया था। अनेक सदियों के बाद स्थान-स्थान पर अलग-अलग जमा जलसर अपने-अपने अपेक्षित बांधों को फोड़कर एक प्रचंड महानदी में विलीन हो रहे थे। यह महानदी थी हिंदुस्थान की एकराष्ट्रीय प्रवत्ति। आज विश्व में जो-जो राष्ट्र एकीकृत और संगठित हुए हैं उन सबको वह एकीकृत अस्तित्व आने के पहले, और आने के लिए ही ऐसी अराजकता और गृह कलह की अग्नि में पिघलना पड़ा था। इटली का गृहयुद्ध, जर्मनी का गृहयुद्ध-उनमें उनके विभिन्न प्रांतों और विविध जातियों की कड़ी शत्रुता और प्रतिशोध लेने के लिए एक-दूसरे पर किए गए अत्याचार-आदि की ओर देखें तो ऐसा लगता है जैसे हिंदुस्थान का यह गृहयुद्ध कुछ भी नहीं था। परंतु उपर्युक्त देशों को गृह कलह की भयानक आग में तथा 1857 का स्वातंत्र्य समर - 127
गुलामीगिरी की अत्यंत तीव्र उष्णता में पिघलना पड़ा, इसीलिए आज उनका एक संगठित सुंदर और सबल व्यक्तित्व बना है, यह भी कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। वैसी ही ऐतिहासिक उत्क्रांति से भारतभूमि की घटना गुजर रही थी। गुलामी की आंच हिंदुस्थानी लोगों को अच्छी तरह लग जाने से वे संगठित होने लगे थे। परंतु पंजाब को यह गुलामगिरी की आंच पूरी तरह लगने में दस वर्ष की अवधिंक कम थी और इसीलिए विशेषतः सिख सन् 1857 के उबलते राष्ट्र-तेज में विलीन न हो सके थे। 59 पंजाब के अंग्रेज अधिकारियों के ध्यान में यह सत्य आ गया था और इसीलिए उन्होंने सिखों और जाटों में मुसलमानों के प्रति द्वेष अधिक-से-अधिक भड़का देने का कार्य शुरू किया। सिख लोगों में मान्य एक पुराने भविष्य कथन का उन्हें स्मरण कराया गया। पहले मुगल बादशाह ने जहां अपने गुरु को मार डाला था उसी दिल्ली पर 'खालसा साहब' एक बार हमला कर उसे धूल में मिला देनेवाले हैं, ऐसा भविष्य संदेश हर सिख को दिया गया था। उस भविष्य कथन की पूर्णता का 'कंपनी साहब' को क्या लाभ? बहादुरशाह के स्थान पर कोई रणजीत सिंह दिल्ली पर राज्य करने लगेगा? हिंदुस्थान में रणजीत सिंह और बहादुरशाह दोनों ही न हों, इस हेतु जो प्रयास कर रहे थे उनको एकांगी भविष्य में कुछ संशोधन करना आवश्यक और सहज था। संशोधन करके जारी किए गए भविष्य के नए संस्करण में ऐसा लिखा हुआ था कि दिलली मिट्टी में तब ही मिलेगी जब खालसा साहब और कंपनी साहब एक होंगे। भविष्य तो भविष्य ही है। एक बात बुरी है, वह यह कि आज के भविष्य कल भूत हो जाते हैं। पर कम-से-कम आज जितना हो सके उतना लाभ ले लेना बुद्धिमानी है। इस भविष्य के अतिरिक्त सिख लोगों में दिल्ली के प्रति अधिक गुस्सा दिलाने के लिए एक झूठी घोषणा की गइ कि दिल्ली में बादशाह ने यह आदेश जारी किया है कि 'सारे सिखों को एक साथ कत्ल किया जाए!' अरे रे! बेचारा गरीब बादशाह!! इसी समय वह दिल्ली की सड़कों पर स्वयं घूम-घूमकर यह कह रहा था कि यह युद्ध केवल फिरंगियों के विरूद्ध है, अतः स्वदेशी लोगों को खरोंच तक न लगने दी जाए। परंतु क्रांतिकारियों के बहुत जोर लगाने पर भी सिख अंग्रेजों की ओर ही रहे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 128 59 1. सर जॉन लॉरेंस ने अपने 21 अक्तूबर, 1857 को लिखे गए एक पत्र में लिखा था-“यदि सिख हमारे विरूद्ध क्रांतिकारियों के साथ मिल जाते तो हमारी रक्षा करना मानवी शक्ति से परे था। किसी को यह आशा नहीं थी, न ही कोई यह कल्पना ही कर पाया था कि अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता को हड़पनेवालों से प्रतिशोध लेने का अवसर ये लोग गंवा देंगे और इस लोभ का संवरण कर लेंगे।।” 2. मेटकॉफ कृत-‘टू नेटिव नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी’।
पंजाब में जहां-जहां सेना की रेजिमेंट थीं वे अधिकतर हिंदुस्थानी लोगों की थी। इस कारण उन सबने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए कमर कसी हुई थी और वे अपने नियत संकेत-समय की प्रतीक्षा में रूके थे। केवल हिंदुस्थानी सिपाही ही पंजाब में स्वातंत्र्य को ललचाए थे, ऐसा बिल्कुल नहीं था; लश्कर के बाहर हर तरह के व्यवसायी नागरिक भी राज्य क्रांति के ‘बीज’ यहां-वहां छितराए हुए थे। मियां मीर के सिपाहियों को निःशस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किले यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये, तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी सुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहां के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए 13 मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिंगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किसी यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये, तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी असुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहां के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए 13 मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिंगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने का विचार त्यागकर तथा उनको केवल अलग-अलग रखने का निर्णय लेकर उनमें से एक पलटन को शहर के बाजार में से ले जाया गया। परंतु किस लेन-देन के लिए वह फिरोजपुर का बाजार से चले तो उन्हें दुकानदारों और दूसरे लोगों ने स्वराज्य की हवा बेचना प्रारंभ किया, जिससे बाजार से निकलते-निकलते सिपाहियों के मन की चंचलता नष्ट हो गई; दृढ़ निश्चय हो गया और 'हर-हर महादेव' की घोषणा हो गई। सिपाहियों के आक्रमण से गोला-बारूद का भंडार बचाना कठिन लगते ही उसे उड़ा देने के सिवाए अंग्रेजों का अन्य उपाय ही न रहा। बारूद का भंडार उड़ा देखकर स्वराज्य का निशान जिस दिल्ली की प्राचीर पर स्वदेश वीरों को बुला रहा था उस प्राचीर की ओर सिपाही दौड़ चले। इसी समय फिरोजपुर शहर भी विद्रोही हो गया और यूरोपियन लोगों के बंगले, तंबू, भोजनालय, प्रोस्टेंट चर्च कैथोलिक चर्च जलाते, गिराते, लूटते, नष्ट करते लोग यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन पहले ही बैरकों के पीछे जाकर सुरक्षित बैठे थे। सिपाहियों का पीछा करने जो अंग्रेजी सेना भेजी गई थी वह, जो सामने आया उसे मारते और अपनी क्रूरता पर घमंड करते हुए लौट आई। पंजाब में अंग्रेजों की सत्ता को जैसे अंदरूनी असंतोष का डर था वैसे ही उसे सरहद पार के अफगानी डकैतों का भी डर था। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध की गुप्त चर्चा के समय लखनऊ की गुप्त समिति ने काबुल के अमीर की सहायता मांगने का प्रयास किया था। क्योंकि सन् 1856 के अगस्त माह में मि. फारसिथ के हाथ एक पत्र पड़ा था जिसमें यह स्पष्ट लिखा था- “लखनऊ के मुसलमानों ने अमीर दोस्त मोहम्मद से संबंध जोड़े हैं। अवध का राज्य अधिगृहीत हो गया है और अब हैदराबाद पर एक 1857 का स्वातंत्र्य समर - 129
कुल्हाड़ी चलते ही मुसलमानी सत्ता का नाम भी फिर से सुनाई न देगा। इसका समय पर ही कुछ उपचार करना होगा। यदि लखनऊ के इस प्रश्न का उस राजनितिपटु अमीर ने अस्पष्ट उत्तर दिया-‘‘जो होगा, देख लेंगे।‘’ परंतु काबुल के अमीर से अंग्रेजों का हाल ही में समझौता हो जाने के कारण उन्हें अमीर से अधिक पेशावर के नजदीक की स्वतंत्र मुसलमान जमातों से अधिक डर था और मुसलमानी जमातों में कोई अंग्रेजों से मिल न जाए, यह उपदेश करते सैकड़ों मुल्ला यात्रा पर निकले थे। पेशावर में इस समय जो अंग्रेज अधिकारी थे वे सारे ही साहसी, राजनीतिपटु और युद्ध-विशारद थे, इसमें कोई शंका नहीं। निकल्सन, एडवर्ड्स, चेंबरलेन आदि अधिकारियों के उत्साह के कारण और उन्हें जॉन लॉरेंस जैसे वरिष्ठ अधिकारी से प्राप्त अचूक सहायता के कारण पेशावर की ओर का यह संकट बड़े धैर्य से टाला गया। उन्होंने तत्काल ही जान लिया कि विद्रोह करना चाहनेवाली मुसलमान जमातों को किस तरह अपनी ओर करना चाहिए और धन का लालच मिलते ही वे सारे पहाड़ी लोग अंग्रेजी सेना में नौकरी पाने की जल्दी करने लगे। पहाड़ी लोगों को धनबल पर खरीदते ही जॉन लॉरेंस ने पंजाब में इधर-उधर सुलगते असंतोष को वहीं-का-वही दबा देने के लिए एक घुमंतू सेना का निर्माण किया। इस सेना में अनुभवी, कसे हुए, जिनकी ईमानदारी पर अंग्रेजों को पूरा विश्वास था, ऐसे नेटिव सिपाही एवं अंग्रेज सोल्जर लिये जाते। इस`सेना का गठन होते-होते ही उसके लिए एक काम तैयार हो गया, क्योंकि पेशावर की ओर के भारतीय सिपाहियों में मियां मीर की निःशस्त्रता की घटना का समाचार पहुंचते ही बडी खलबली मच गई थी, इसलिए इस भारतीय सेना पर स्वयं पहली चोट करने की योजना पेशावर के साहसी अंग्रेज अधिकारियों ने बनाई और वे इस सारी सेना को निःशस्त्र करने को तैयार हो गए। परंतु उस भारतीय सेना के अंग्रेज कमांडर आदि अधिकारियों को अपने सिपाहियों का यह अमपान बहुत बुरा लगा। सन् 1857 में जो एक विलक्षण गुप्तता चारों ओर रखी गई थी उसी के जाल में फंसे ये अंग्रेज अधिकारी यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं थे कि उनके अधीनस्थ सिपाही विद्रोह पर उतारू हैं। फिर भी कॉटन और निकल्सन ने इस नेटिव सिपाहियों को 21 मई को सुबह के समय यूरोपियन सेना से घेरकर निःशस्त्र करने का आदेश दिया। इस अकस्मात् हुए हमले से बच पाना असंभव है, यह देखकर सारे सिपाहियों ने अपने हथियार नीचे रखे और यह अपमान भरा कृत्य देखकर क्रोधित उनके अंग्रेज अधिकारी भी अपने सिपाहियों के साथ कंपनी को धिक्कारने लगे। पेशावर की नेटिव सेना को निःशस्त्र करने के बाद पंजाब सरकार को होती-मर्दानी में रखी 55वीं नेटिव रेजिमेंट की ओर देखने की फुरसत मिली। यह 55वीं नेटिव 1857 का स्वातंत्र्य समर - 130