१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतरह भी जल्दी करना असंभव हो गया। अंग्रेजों के काले सिपाहियों को 'चल' कहते ही चलाया जा सकता था, परंतु अब गोरे सिपाहियों को केवल 'चल' कहने से कैसे चलेगा? उनका एक-एक का दिमाग और आज तक बढ़ता मिजाज अब एकाएक कैसे संभले। उसमें भी अब नेटिवों से पहले जैसी हर तरह की सहायता मिलना पूरी तरह असंभव था। गाड़ियां मिली नहीं, मजूर मिले नहीं, रसद मिली नहीं, जख्मी लोगों के लिए डोली मिली नहीं। ऍडज्युटेंट, क्वार्टर मास्टर, मेडिकल चीफ-हर कोई अपने-अपने विभाग की तैयारी करना छोड़ –नकार' का घंटा बजाने लगा। हिंदुस्थानी लोगों के आश्रय बिना अंग्रेजी सत्ता धूल पर की गई लिपाई जैसी है। सन् 1857 में इस कुचली हुई धूल में थोड़ा चैतन्य आते ही अंग्रेजों को अंबाला से दिल्ली तक आना कठिन हो गया। क्योंकि-"Natives of all classes stood aloof, waiting and watiching the issue of events. From the capitalists to the coolie al shrunk alike from rendering assisatance to those whose power might be swept away in a day."^{53} उपर्युक्त लेखक कहता है, हिंदुस्थान के नेटिव ऐसे ही चुप हो बैठते तो अंग्रेजी सत्ता वास्तव में एक दिन में फेंक दी गई होती। परंतु सन् 1857 में वह दिन उगनेवाला नहीं था। सन् 1857 उस दिन के भोर की रात थी। जिन्हें वह भावी भोर दिखने लगी वे नींद छोड़कर उठे। परंतु जिन्हें वह तत्कालीन रात ही दिखी वे अपना गुलामी का खींचा हुआ ओढ़ावन और खींचकर सो गए। इन उनींदे लोगों में कुभकर्ण का सम्मान पानेवाले पटियाला, नाभा और जींद-ये तीन रियासतें थी। इन रियासतों के हाथों में सन् 1857 की क्रांति का जीवन या मृत्यु थी। ये रियासतें दिल्ली और अंबाला के बीच में थी, अतः उनके आधार के बिना अंग्रेजों की पीठ बिलकुल सुरक्षित रहनेवाली नहीं थी। ये रियासतें अन्य रियासतों की तरह केवल चुप रही होती तो भी क्रांति सफल होने की बहुत संभावना थी। परंतु पटियाला, जींद और नाभा-इन तीनों ने जब अंग्रेजों से भी अधिक क्रूरता से सन् 1857 की राज्य क्रांति को चोट पहुंचाना प्रारंभ किया तब पंजाब और दिल्ली, इन दो हिस्सों की यह जंजीर एकाएक टूट गई और उस क्रांति के अवयवों की संगति क्षणार्थ में नष्ट हो गई। इन रियासतों ने दिल्ली के बादशाह की ओर से आए निमंत्रण को धिक्कार दिया; निमंत्रण देने आए सवारों को मार डाला;स्वयं के खजाने से अंग्रेजों पर धन की सतत वर्षा की। जिस प्रदेश से अंग्रेजी सेना जानेवाली थी उस प्रदेश को सैन्य संरक्षण दिया; अंग्रेजों के साथ निशान को संभालने घर-द्वार छोड़कर दौड़ने आए तब इन सिख रियासतों ने-इन गुरू गोविन्द सिंह के चेलों ने-अत्यधिक क्रूरता से उनका वध किया, यंत्रणा दी ।^{54} 1857 का स्वातंत्र्य समर – 118 ^{53} 1. के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 2। ^{54} 2. इस वर्णन से अधिक हृदयद्रावक वर्णन इ57 के क्रांतियुद्ध में मिलना मुश्किल है। जिस प्रदेश से अंग्रेजों को संरक्षण मिलता था उसी प्रदेश के स्वधर्म और स्वराज्य के लिए हथेली पर सिर लिये