१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबातों से भरा एक घोषणापत्र निकालने का अधिकार है या नहीं, जहां यही विवादास्पद विषय है वहां नया घोषणापत्र निकालने का अर्थ वह विवाद समाप्त करना नहीं बल्कि उसे चिढ़ाना है। लेकिन हिंदुस्थान के पास अब यह घोषणापत्र पढ़ने का समय नहीं है, क्योंकि दिल्ली में उसी समय घोषित दिव्य घोषणापत्र की ओर सबकी आंखें लगी हुई हैं। एक ही समय दो घोषणापत्र जारी हुए। कलकत्ता में गुलामी का, दिल्ली में स्वतंत्रता का। हिंदुस्थान को उस समय दिल्ली का घोषणापत्र भाया, इसलिए केंनिंग ने कलम तोड़कर कमांडर-इन-चीफ, दिल्ली को तुरंत तोपें दागने का ओदश दिया। कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन जब शिमला में था तब उसे दिल्ली के विद्रोह का तार मिला। उसे पढ़कर, अब क्या करना चाहिए, इसका विचार वह कर ही रहा था कि केनिंग ने उसे तुरंत दिल्ली जीतने का आदेश दिया। विद्रोहियों की योजना का या शक्ति का अंग्रेजों को इतना अज्ञान था कि उन्हें लगता था, दिल्ली एक हफ्ते में छीनी जा सकती है और एक बार दिल्ली जीती तो उस माह के अंत में विद्रोह का अंत हो जाएगा। पंजाब का मुख्य अधिकारी सर जॉन लॉरेंस भी दिल्ली पर कब्जा करने को जोर डाल रहा था। परंतु दिल्ली जीतना कितना कठिन है, इसका कनिंग और लॉरेंस की तुलना में कुछ अधिक सही अनुमान अॅन्सन को था, अतः समुचित सामग्री इकट्ठी करने के पहले दिल्ली की ओर नहीं जाने की नीति उसने बनाई। शिमला की ठंडी हवा छोड़ मुख्य सेना स्थल की ओर अॅन्सन आ भी न पाया था कि वहां शिमला में हुल्लड़ मच गया। गुरखाओं की नासिरी बटालियन ने विद्रोह किया, यह समाचार शिमला आते ही अंग्रेजों का धीरज छूट गया। उस वर्ष शिमला में बनाए गए हवादार बंगलों और वृक्षों के बगीचों में आज तक भोगे राजविलास का अब भयंकर किराया देना पड़ेगा। गुरखा पलटन आई, ऐसा एक शोर होते ही गोरी औरतें और बच्चे जिधर राह दिखे उस तरफ भाग निकले। इस भागमभाग में अंग्रेज पुरूषों ने स्वाभाविक ही महिलाओं को पीछे छोड़ दिया-और वह भी अपने सामान के थैले पीठ पर बंधे होते हुए। अंग्रेजी धैर्य का प्रदर्शन दो दिन निरंतर चलता रहाः लेकिन जब गुरखा न आए तो हारकर वह प्रदर्शन बंद करना पड़ा। इसी समय कलकत्ता में भी रोज ऐसा ही होता था। कलकत्ता के पास बैरकपुर की नेटिव रेजिमेंट ने विद्रोह किया, यह अफवाह बार-बार उठती और अंग्रेजों की औरतें, बच्चे और पुरुष रास्ते से पोर्ट की ओर दौड़ते दिखाई देते। कितनों ने इंग्लैंड का टिकट निकाल लिया, कितनों ने अपनी गठरियां बांधकर पोर्ट की ओर भागने की तैयारी रखी और अनेक दफ्तर के काम छोड़ कोने-कोने में छिपे रहते। ऐसा डर मेरठ और दिल्ली में था, फिर भी अंग्रेजों का कानपुर अभी बचा हुआ था! कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन ने अंबाला आते ही दिल्ली पर घेरा डालने के लिए सीजट्रेन तैयार करना शुरू किया। हिंदुस्थान पर आज तक कभी ऐसा संकट न आया था। अंग्रेजों की शक्ति की बंद मुट्ठी लाख की होते हुए भी अंदर की स्थिति शोचनीय थी। अॅन्सन को किसी 1857 का स्वातंत्र्य समर — 117