भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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मरणासन्न हो गिर पड़ा। तभी उस भयंकर रणभूम में आधी रात का अंधियारा दूर करने और स्वतंत्रता-भक्तों के संतप्त सिरों पर शीतल चंद्रिका की वर्षा करने हेतु रजनीनाथ का आकाश में उदय हो गया था। इस चंद्र प्रकाश से क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की सारी व्यूह रचना समझ में आ गई और वे अपना स्थान छोड़कर अंग्रेजों पूरी शक्ति से टूट पड़े। इस अद्भूत आक्रमण के सामने अंग्रेजी सेना, सिख और अन्य राजनिष्ठ अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। अपनी इस आधी रात की विजय और जल्दी ही उदित उषःकाल की सुंदर प्रभा से और अधिक खिली वीरश्री से वे सारे क्रांतिकारी सैनिक दूसरे दिन दोपहर के लगभग लुधियाना शहर में घुसने लगे। लुधियाना में एक मौलवी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होकर स्वराज्य-संस्थापना करने के लिए लगातार उपदेश करता घूमता रहता था। उस मौलवी के प्रचार से लुधियाना शहर पंजाब में क्रांतिकारियों का एक सशक्त केंद्र बन गया था। गुलामी की बेडियां तोडने के लिए अंतिम चोट करने का समय आ गया है, ऐसी सूचना मिलते ही वह सारा शहर 'दीन' की गर्जना करता उठ खड़ा हुआ। सरकारी भंडार लूटे गए; येरोपियन चर्च, यूरोपियन के घर, अंग्रेजी अखबारों के छापाखाने-ऐसे सारे स्थान जलाकर खाक कर दिए गए और जब सिपाही अंदर घुसने लगे तो उन्हें साथ लेकर यूरोपियनों के प्रमुख स्थानों और विशेष रूप से सरकार के आगे दुम हिलानेवाले सारे नेटिव कुत्ते खोज निकालने के लिए नागरिकों में स्पर्धा शुरू हो गई। कारावास तोड़े गए। जो कुछ भी सरकारी था या जो कुछ अंग्रेजों का था वह वह अग्नि की भेंट न चढ़ पाया तो चूर-चूर कर दिया गया और इस तरह लुधियाना शहर विद्रोह की आग में जलने लगा। विद्रोहियों का दिल्ली जाना आवश्यक था; जबकि लुधियाना के किले पर रहकर पंजाब का वह नाका पकड़े रहना भी आत्यावश्यक था। यदि दिल्ली की भांत लुधियाना भी विद्रोह का केंद्र हो जाता तो उससे अंग्रेजी सत्ता को जोरदार धक्का लगा होता । हालांकि विद्रोही यह समझते नहीं थे, सिपाही; न उनका कोई सेनापति था, न ही कोई नेता। उनके पास यात्रा हेतु आवश्यक सामग्री भी नहीं थी। ऐसे समय में वहां कोई नाना साहब, खान बहादुर या मौलवी अहमद शाह होता तो उसने लुधियाना को कभी न छोड़ा होता। परंतु उन सबके न होने के कारण उन्हें दिल्ली की ओर जाने के सिवाय दूसरा मार्ग ही नहीं था और इसीलिए-स्वराज्य या गुलामी, इसका अंतिम निर्णय अब दिल्ली की प्राचीर पर ही होगा-ऐसी गर्जना करते हुए वे दिल्ली की ओर दिन-दहाड़े गाते-बजाते जा रहे थे, फिर भी उनका पीछा करने की किसी में हिम्मत नहीं थी। मेरठ के विद्रोह के कोई तीन हफ्ते बाद तक क्रांतिकारियों को जो शांति बनाए 1857 का स्वातंत्र्य समर – 136