भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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रखना अनिवार्य हो गया था, उस शांति का लाभ अंग्रेजों ने पंजाब में पूरी तरह उठाया। पंजाब में यूरोपियन सेना अधिक होने के कारण वहां की नेटिव रेजिमेंटों को या तो निःशस्त्र करना या असमय और अपरिपक्व अवस्था में विद्रोह करने को बाध्य करके उनका सहज नाश करना बहुता ही सुलभ हो गया। राज्य क्रांति के पक्ष से सिख रियासतदार और अन्य सिख लोग मिलकर अपने से ही मिल रहे हैं, यह देखकर ही वे सरहद से सतलज तक पंजाब में जितने भी हिंदुस्थानी थे उन्हें वहां से भगाकर पंजाब में विद्रोह का बीज समाप्त कर सके। इस समय लश्कर में ही नहीं अपितु गांवों और शहरों में आराम से रह रहे हजारों हिंदुस्थानी लोग पंजाब से अंग्रेजों की इच्छा के कारण सीमा पार कराए गए और इस तरह पंजाब हाथ में आते ही वहां की यूरोपियन सेनाओं को दिल्ली की ओर तीव्रता से भेजा जाने लगा। पंजाब के अंग्रेजों के पूर्ण नियंत्रण में रहने के दो मुख्य कारण थे। एक तो यह कि सिखों ने अंग्रेजों का साथ दिया। इन लोगों ने उस समय केवल चुप्पी ही साध ली होती तो अंग्रेजों के हाथों में पंजाब एक दिन भी नहीं रह पाता। इन सिख लोगों को क्रांतिकारियों ने अपनी ओर करने के लिए प्रयास नहीं किए, ऐसा भी नहीं था। दिल्ली के स्वतंत्र होते ही बादशाह के एक 'ईमानदार सेवक' ने उन्हें पंजाब के सारे समाचार सूचित करने के लिए एक लंबा, विस्तृत एवं बहुत ही मार्मिक पत्र लिखा था। उसमें वह ईमानदार पत्र-लेखक ताजुद्दीन लिखता है-“पंजाब के सारे सिख सरदार कायर, डरपोक और हिंदुस्थानी लोगों का साथ न देकर फिरंगियों के कुत्ते बने हुए हैं। मैं स्वयं उनसे मिला, उनसे संवाद किया और उनको जी-जान से कहा कि फिरंगियों से मिलकर जो तुम देशद्रोह कर रहे हो वह किसलिए? स्वराज्य में तुम्हारा लाभ नहीं है? फिर अपने इस लाभ के लिए ही तुम्हें बादशाह से मिलना चाहिए। इसपर वे मेरे सामने कहते हैं-देखिए, हमस ब अवसर की प्रतीक्षा में हैं। दिल्ली के बादशाह का आदेश लेकर घुड़सवार सिख राजाओं के पास आए तब उन्होंने उन्हें मरवा दिया। पंजाब पर नियंत्रण रखना अंग्रजों को सुलभ हुआ, उसका यह पहला और विशेष कारण है। सिखों के इस विरोध की परवाह न कर पंजाब से अंग्रेजों को भगाना किसी तरह भी संभव नहीं, ऐसा नहीं था। अंग्रेज जिस विलक्षण ढीलेपन से मई माह तक रहते थे उस ढीलेपन का लाभ उठाकर पूर्व संकल्प के अनुसार सब ओर एक साथ विद्रोह हुआ होता तो सिखों पर भी क्रांतिकारियों का आतंक छाने से कम-से-कम उनमें फूट तो निश्चित ही पड़ जाती। विशेषकर पंजाब के नेटिव सिपाहियों को एक-एक कर पकड़कर अंग्रेज जिस तरह उन्हें नरम कर सके वैसा बिल्कुल नहीं हो पाता। पंजाब में स्वराज्य की इच्छा नहीं थी। ठाणेश्वर के ब्राह्मण, लुधियाना के मौलवी, फिरोजपुर के दुकानदार और पेशावर के मुसलमान-सभी 'स्वराज्य 1857 का स्वातंत्र्य समर – 137