१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर स्वधर्म के लिए जंगी जेहाद करो', ऐसा उपदेश देते हुए घूम रहे थे। उपर्युक्त पत्र लेखक भी लिखता है- "बादशाह के दरबार से यदि कोई सरदार सेना के साथ इधर भेजा जाए तो पंजाब चुटकी बजाते ही स्वतंत्र हो जाएगा। सारी हिंदुस्थानी सेना विद्रोह कर उनके झंडे के नीचे आ जाती और सिखों का भागना मुश्किल हो जाता। मेरा ऐसा विश्वास है कि सारे हिंदू और मुसलमान आपके भाग्यशाली सिंहासन का प्रेम मुजरा करेंगे। और यह भी कि जून माह में ही विद्रोह करना इष्ट है, क्योंकि अंग्रेज सोल्जरों को धूप की गरमी में लड़ना बहुत कठिन होता है। वे लड़ने के पहले ही चटाचट मरने लगते हैं। इसलिए पत्र देखते ही आप कोई सरदार पंजाब में भेजे। पंजाब के लोकमत का झुकाव दिल्ली की ओर होते हुए भी वह दिल्ली का लाभ नहीं ले सका, इसका कारण यह था कि दिल्ली में विद्रोह हो जाने के बाद तीन सप्ताह तक क्रांति की लहर का ठहरी रहना अपरिहार्य हो गया था। यही विद्रोह यदि पहले से निश्चित संकेतों के अनुसार एक सप्ताह में होता तो अंग्रेज कहीं भी हलचल नहीं कर सकते थे। पंजाब में अकेली एक-एक और अनाथ सेनाएं निःशस्त्र नहीं की जा सकती थीं। क्रांति की लहर निरंतर उबलने से सिखों जैसे अनिश्चित विचार के लोग भी उसमें बह सकते थे और प्रारंभ में ही विजय प्राप्त हो जाने पर जिनके मन क्रांति की ओर झुके हुए थे, पर क्रांति में सम्मिलित होने से डरते थे, उन्हें भी जोश आ जाता। सारांश यह है कि सिख लोगों के देशद्रोह के कारण और अधपकी स्थिति में अंग्रेजों ने इन तीन सप्ताहों में चारों ओर यथासंभव बंदोबस्त करके कलकत्ता से इलाहाबाद तक यूरोपियन सेनाओं का निरंतर प्रवाह चालू रखा था। बंबइ, मद्रास, राजपूताना और सिंध प्रांत में विद्रोह से सहानुभूति रखनेवाले कोई हैं या नहीं, इसकी बारीकी से जांच कर उनको पंजाब की भांति ही समय रहते पूरी तरह नष्ट कर डालने के प्रयास आरंभ हो गए थे। और इस अग्रिम सूचना के लिए ईश्वर का आभार मानते हुए अब विद्रोह की ज्वालाएं स्थान-स्थान पर समाप्त कर दी गई हैं, यह विश्वास भी उन्हें होने लगा। इन तीन हफ्तों में अंग्रेजों की कार्यवाहियों के चलते क्रांति पक्ष की ओर से इक्का-दुक्का विद्रोह को छोड़कर सब ओर यथासंभव गोपनीयता रखी गई थी। 30 मई तक दोनों पक्षों की ऐसी स्थिति थी। यह स्थिति मई की 30 तारीख के बाद किस तरह पलट गई, अंग्रेजों के मन में उत्पन्न होता विश्वास कैसे चकनाचूर हुआ और तीन हफ्तों में हुई हानि की परवाह न करते हुए क्रांति की ज्वालाएं कैसे एकाएक भड़क उठी, यह देखना आवश्यक है। राज्य क्रांतियां किसी सूत्रबद्ध नियम से नहीं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 138