भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

चलतीं। राज्य क्रांति कोई घड़ी की तरह ठीक-ठीक चलनेवाला यंत्र नहीं है। राज्य क्रांतियां स्वैर संचारप्रिय होती हैं। उनपर सिद्धांतों का बंध नही रह सकता है, बाकी फुटकर नियम उनके अपूर्व धक्के से गिर जाते हैं। राज्य क्रांति का एक नियम है और वह यह कि उसकी पकड़ बनी रहनी चाहिए। मध्यांतर में चाहे नई और अकल्पित परिस्थितियां उत्पन्न हों, परंतु उनके कारण रूके बिना उन्हें एक तरफ करते हुए आगे बढ़ना होगा। राज्य क्रांति एक विचित्र पक्षी है, जो बहुत दिनों बाद पिंजरे से बाहर निकलने पर गंतव्य को जाने के पहले आकाश में देर तक उड़ान भरता है। जिसे उस गरूड़ जैसे पक्षी पर बैठकर इच्छित स्थान को पहुंचना हो वह उसकी पीठ पर अटल आसन लगाए। उड़ान भरकर उसकी मस्ती ठंडी हो जाने के बाद तक जो उसकी पीठ पर जमकर बैठा है उसी के पूरे नियंत्रण में वह आ जाता है। मेरठ के लोगों ने इस राज्य क्रांति के पंछी को पिंजरे से कुछ पहले ही उड़ा दिया था; फिर भी उससे न घबराए श्रीमंत नाना साहब, लखनऊ के मौलवी, झांसी की बिजली छबीली आदि धुरंधर उस्तादों ने उस पक्षी की कैसे पकड़ की, वह सब हे इतिहास! अब तू हमें बता। उस गरूड़ पक्षी को पकड़े रखने की दृढ़ता हिंद भूमि के सब हाथों में न होने के कारण वह गरूड़ आकाश में कैसे उड़ गया, हे इतिहास! यह तू हमें बता। तू हमारे साथ पहले वर्ग के स्तुति गीत गा और दूसरे वर्ग के लिए हमारे साथ-साथ आक्रोश करने लग! 1857 का स्वातंत्र्य समर – 139