भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

प्रकरण-5 अलीगढ़ और नसीराबाद मेरठ में उत्पन्न भूकंप का धक्का जैसे ऊपर अंबाला और पंजाब की ओर सारा प्रदेश ध्वस्त कर रहा था वैसे ही उस भूकंप के धक्के की दूसरी लहर मेरठ के निचले प्रदेश की उस सारी भूमि को कंपित कर रही थी। दिल्ली के नीचे अलीगढ़ शहर में नौवीं नेटिव पैदल रेजिमेंट थी। इस रेजिमेंट को अलीगढ़ के मुख्य थाने के साथ-साथ मैनपुरी, इटावा और बुलंदशहर में भी रखा हुआ था। इस रेजिमेंट पर सरकार का इतना विश्वास था कि चाहे हिंदुस्थान के सारे सिपाही विद्रोह कर जाएं, फिर भी 9वीं रेजिमेंट राजनिष्ठ बनी रहेगी। बुलंदशहर के बाजार में राज्य क्रांति के गुप्त षड्यंत्र प्रारंभ होने का समाचार कानों में आ जाने के बाद भी इस क्रांति से 9वीं रेजिमेंट के सिपाही निश्चित ही अलग रहेंगे, ऐसा समझकर बुलंदशहर के अधिकारी सबकुछ सुरक्षित अनुभव करते रहे। मई माह के करीब बुलंदशहर के आसपास के गांवों ने अपने में से एक मानवीय, विश्वस्त एवं स्वातंत्र्य-प्रिय ब्राह्मण चुना और उसे तत्काल बुलंदशहर भेज दिया। एक ओर जिसकी राजनिष्ठा पर अंग्रेजों का अपना पूरा विश्वास है और दूसरी ओर जिसे मातृभूमि अपने अश्रुपूरित नेत्रों से अपलक देख रही है-ऐसी उस बुलंदशहर की सैनिक छावनी की ओर वह ब्राह्मण भयानक कल्पनाओं और अपने भावी यश-अपयश के बादलों से घिरा अपना हृदय लिए तेजी से जाने लगा। मातृभूमि की स्वतंत्रता और स्वधर्म की रक्षा के लिए क्या मेरे स्वदेश बंधु मेरा निवेदन मानेंगे? क्या स्वराज्य के उच्चतर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 140