१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
प्रकरण-5 अलीगढ़ और नसीराबाद मेरठ में उत्पन्न भूकंप का धक्का जैसे ऊपर अंबाला और पंजाब की ओर सारा प्रदेश ध्वस्त कर रहा था वैसे ही उस भूकंप के धक्के की दूसरी लहर मेरठ के निचले प्रदेश की उस सारी भूमि को कंपित कर रही थी। दिल्ली के नीचे अलीगढ़ शहर में नौवीं नेटिव पैदल रेजिमेंट थी। इस रेजिमेंट को अलीगढ़ के मुख्य थाने के साथ-साथ मैनपुरी, इटावा और बुलंदशहर में भी रखा हुआ था। इस रेजिमेंट पर सरकार का इतना विश्वास था कि चाहे हिंदुस्थान के सारे सिपाही विद्रोह कर जाएं, फिर भी 9वीं रेजिमेंट राजनिष्ठ बनी रहेगी। बुलंदशहर के बाजार में राज्य क्रांति के गुप्त षड्यंत्र प्रारंभ होने का समाचार कानों में आ जाने के बाद भी इस क्रांति से 9वीं रेजिमेंट के सिपाही निश्चित ही अलग रहेंगे, ऐसा समझकर बुलंदशहर के अधिकारी सबकुछ सुरक्षित अनुभव करते रहे। मई माह के करीब बुलंदशहर के आसपास के गांवों ने अपने में से एक मानवीय, विश्वस्त एवं स्वातंत्र्य-प्रिय ब्राह्मण चुना और उसे तत्काल बुलंदशहर भेज दिया। एक ओर जिसकी राजनिष्ठा पर अंग्रेजों का अपना पूरा विश्वास है और दूसरी ओर जिसे मातृभूमि अपने अश्रुपूरित नेत्रों से अपलक देख रही है-ऐसी उस बुलंदशहर की सैनिक छावनी की ओर वह ब्राह्मण भयानक कल्पनाओं और अपने भावी यश-अपयश के बादलों से घिरा अपना हृदय लिए तेजी से जाने लगा। मातृभूमि की स्वतंत्रता और स्वधर्म की रक्षा के लिए क्या मेरे स्वदेश बंधु मेरा निवेदन मानेंगे? क्या स्वराज्य के उच्चतर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 140
वातावरण में उड़ान भरने में सक्षम पंख इन सैनिक बंधुओं के पास हैं? मेरे इस भविष्यवाद को धिक्कारकर गुलामी के अंधियारे के गह्वर में सोये सुंदर उषःकाल के दर्शन हेतु मैं उनकी उस नींद को भंग कर रहा हूं। इसलिए मेरे सिर पर ये देशबंधु आघात ही करेंगे! मनोविकारों की ऐसी उथल-पुथल हृदय में चलते हुए भी जिसके चेहरे पर मूर्त शांति विराजमान थी, ऐसा वह ब्राह्मण अपना विलक्षण संदेश लिये लश्कर में प्रवेश कर गया। उन सिपाहियों को दीक्षा देते हुए उसने कहा कि एक बड़ी सी बरात निकालकर उस हल्ले-गुल्ले में आप सब विद्रोह देते हुए उसने कहा कि एक बड़ी सी बरात निकालकर उस हल्ले-गुल्ले में आप सब विद्रोह करें और सारे अंग्रेजों को मौत के घाट उतारकर दिल्ली की ओर चलें। अंग्रेजों का राज्य उलटने के सिद्धांत का विरोधी कोई था ही नहीं; पर उसमें भी उस सिद्धांत को यथार्थ में कैसे बदला जाए, इस प्रश्न का हल भी सुनकर उसकी ग्राह्यता-अग्राह्यता पर विचार चल रहा था। तभी उस रेजिमेंट के तीन सिपाहियों ने अंग्रेजों को यह समाचार देकर उस ब्राह्मण को कैद कर लिया। तत्काल बुलंदशहर से उस ब्राह्मण को रेजिमेंट के मुख्य थाने की ओर रवाना किया गया और उन सब सिपाहियों के सामने फांसी पर लटकाने का दंड दिया गया। यह घटना जब अलीगढ़ में घटित हो रही थी, तभी इधर बुलंदशहर के उन तीन राजनिष्ठों पर सब ओर से थू-थू होने लगी। उनपर गालियों की बौछार करते हुए बुलंदशहर का सारा लश्कर अधिकारियों की अनुमति न लेते हुए जिस स्थान पर वह क्रांतिदूत ले जाया गया था, उस अलीगढ़ शहर की ओर चल दिया। दिनांक 20 मई की शाम को उस ब्राह्मण को फांसी दी गई। बगल में सारी रेजिमेंट खड़ी की गई थी। अब क्या करें? दिनांक 31 मई तक रुकें तो ब्राह्मण निकलता नहीं, निकल ही गया है और फांसी पर उसकी मृत देह प्रतिशोध का बीभत्स व्याख्यान देती लटकी हुई है। भयानक व्याख्यान! शब्द के स्थान पर जहां रक्त की धाराएं स्खलित बह रही हैं। उस भयानक वक्ता ने जीवित रहते जो व्याख्यान कभी न किया हो, वह आज फांसी पर लटके एक शब्द भी न बोलते हुए कर दिया था। क्योंकि आधे क्षण में ही उन असंख्य सिपाहियों की भीड़ में से उछलकर एक सिपाही आगे आया और अपनी तलवार उस फांसी पर लटकते ब्राह्मण की ओर करके चिल्लाया, “अरे यार, यह शहीद रक्त में नहा रहा है।“ बारूद के ढेर पर चढ़ी चिंगारी भी किंचित् देर से सुलगती, पर उस शूर सिपाही के मुंह से छूटी तेजस्वी चिंगारी को उन हजारों सिपाहियों के हृदय में घुसने में उतना भी समय नहीं लगा। उन्होंने अपनी तलवारें बाहर निकालीं और ‘फिरंगियों का नाश हो' की गर्जना करते क्रोध से पगलाए वे हजारों नाचने लगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह देखते ही अंग्रेज कर्मचारी भयभीत हो गये। राजनिष्ठ 9वीं रेजिमेंट विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं, उसने अंग्रेजों को सूचित किया कि अपने प्राण बचाने हों तो तत्काल अलीगढ़ छोड़ दें। इस उदारता का लाभ लेकर अलीगढ़ के सारे अंग्रेज अधिकारी, उनकी पत्नियां, बच्चे, लेडी आउटेरम आदि सारे-के-सारे अंग्रेज चुपचाप उस शहर से निकल गए। रात बारह बजे तक अलीगढ़ में 1857 का स्वातंत्र्य समर - 141
अंग्रेजी सत्ता का नामोनिशान न रहा। अलीगढ़ स्वतंत्र हो जाने का समाचार 22 मई की शाम को मैनपुरी पहुंचा। मैनपुरी में 9वीं रेजिमेंट का कुछ हिस्सा रहता था, यह पहले ही बताया जा चुका है। उन सिपाहियों के मन में क्या था, यह अलीगढ़ की ओर से बंधुओं के समाचारों से स्पष्ट है। मई की 10 तारीख को मेरठ में क्रांति होने के बाद अंग्रेजों से लड़े सिपाही राजनाथ सिंह के अपने गांव जीवंती लौटने का समाचार मैनपुरी के अधिकारियों को मिलने पर उन्होंने अपनी 9वीं रेजिमेंट के कुछ सिपाहियों को उसे पकड़ने के लिए भेजा। परंतु उन सिपाहियों ने राजनाथ सिंह को पकड़ने की जगह सुरक्षा के साथ उसे जीवंती के बाहर पहुंचा दिया और अंग्रेजों को सूचना दी कि जीवंती में राजनाथ सिंह नाम का कोई व्यक्ति रहता ही नहीं। सिपाही रामदीन सिंह ने आदेश की अवहेलना की, इसलिए उसे कैद कर अंग्रेज अधिकारियों ने सिपाहियों के पहरे में अलीगढ़ भेज दिया। परंतु आधे रास्ते में आने के बाद पहरे के सिपाहियों ने रामदीन सिंह को मुक्त कर दिया। उन्होंने उसकी बेड़ियां काट डाली और वे चुपचाप मैनपुरी लौट आए। 62 इस स्थिति तक पहुंचा वह नेटिव लश्कर केवल संकेत समय के लिए रुका हुआ था और उस एक निश्चित समय के पूर्व शत्रु को अपने पैर काट डालने का अवसर न मिले, इसलिए ऊपर से इतना शांत व्यवहार कर रहा था कि यह 9वीं रेजिमेंट 'राजनिष्ठतम गिनी हुई। परंतु ऊपर बताये गए ब्राह्मण के दौरे के बाद से सिपाहियों का ही नहीं अपितु अलीगढ़ की सारी जनता का गुस्सा अतिरेक की सीमा चला गया था। यह 9वीं रेजिमेंट अलीगढ़ में फैलते जा रहे असंतोष को दबाने जब शहर में भेजी गई तब शहर से निकलते समय बाजार के खटीक और कसाई लोगों ने उन सिपाहियों से पूछा कि यूरोपियनों को कब मारेंगे और स्वतंत्रता के लिए कब उठेंगे? खटीक और कसाई भी जिसके लिए जल्दी कर रहे हों वह कृत्य अब भी टालना सिपाहियों को अच्छा कैसे लगे! और तभी अलीगढ़ का समाचार आया। रेजिमेंट के अन्य लोगों द्वारा विद्रोह कर देने के बाद अब केवल अपना ही रुका रहना निंदनीय है, यह देखकर मैनपुरी का लश्कर विद्रोह कर उठा। उन्होंने भी अलीगढ़ के अपने भाइयों की भांति अंग्रेजों को जीवनदान दिया, शस्त्रागार से शस्त्र और भरपूर गोला-बारूद ऊंटों पर लादकर उन सारे सिपाहियों ने 23 मई को दिल्ली की ओर तत्काल कूच किया। इसी समय इटावा की टुकड़ी में भी धुआंधार हो रही थी। इस इटावा शहर के मुख्य मजिस्ट्रेट डेनियल की सहायता से पड़ोस के रास्ते पर गश्त करने को एक चुनी हुई सेना तैयार की। 19 मई को मेरठ से आए कुछ सिपाही इस सेना से मिले। वे मुट्ठी भर सिपाही शरण में आ गए और उन्हें कुछ थोड़े लोगों के सशस्त्र पहरे में रखने का आदेश मिला। यह आदेश हमारे सिरमाथे है, ऐसा दिखाते हुए मेरठ के उन सिपाहियों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 142 62 चार्ल्स बाल, खंड 1, पृष्ठ 134।
अपने शत्रु को पूरी तरह असावधान कर दिया और फिर वे ही शस्त्र लेकर उन्होंने उन सबको कत्ल कर दिया। यह समाचार फैलते-न-फैलते वे सिपाही पड़ोस के एक हिंदू देवालय में जा घुसे और अंदर शस्त्र-सज्जित हो घात लगाकर बैठ गए। इटावा शहर का कलेक्टर मि. एलन ह्यूम यह समाचार पाते ही मि. डेनियल के साथ कुछ नेटिव सेना लेकर उस मंदिर पर हमला करने निकला। ह्यूम को यह विश्वास था कि उसके सिपाहियों के हमला करने के पूर्व उन विद्रोहियों को गांववालों ने उनका सफाया करना छोड़ उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें ढेर सारी रसद पहुंचा दी थी। गांववालों ने हमें धोखा दिया; पर कम-से-कम अपने साथ आए सिपाही और पुलिस तो धोखा नहीं देंगे, इस विश्वास से मंदिर पर आमने से आक्रमण करने आए ह्यूम साहब उन सिपाहियों को उनके मंदिर में छोड़कर इटावा की ओर भाग गए। उस दिन अर्थात् तारीख 19 मई को ही इटावा की नेटिव सेना विद्रोह करेगी, ऐसी खबर सब ओर थी। परंतु उस सेना का मुख्यालय अलीगढ़ में होने से और उधर से विद्रोह का आदेश अभी न मिलने से इटावा की नेटिव सेना अवश्य ही चुप होकर बैठ गई होती, परंतु मध्यांतर में ही उस शहीद ब्राह्मण के आत्मयज्ञ की ज्वालाएं एकाएक भड़क उठने का समाचार इटावा में 22 तारीख को पहुंच जाने से वहां के सिपाहियों को विद्रोह करना आवश्यक हो गया। दिनांक 23 मई को वहां की सारी सेना ने ‘हर-हर-महादेव' की घोषणा कर दी और एक हाथ में तलवार तथा दूसरे हाथ में जलती कब्जे में ले लिया। कारावास तोड़ दिए गए और सारे अंग्रेजों को कह दिया गया कि वे तुरंत भाग जाएं, अन्यथा एक सिरे से उनका कत्ल होगा। यह अभूतपूर्व एवं भयप्रद समाचार सुनते ही भयभीत हुए अंग्रेज लोग अपनी पत्नी-बच्चों को सहित जिधर रास्ता सूझा उधर दौड़ पड़े। स्वयं एलन ओ. ह्यूम ने नेटिव सिपाहियों की उदारता का लाभ लेकर, एक नेटिव महिला का वेश धारण कर ‘यः पलायति स जीवति' का आश्रय लिया।⁶³ इस ह्यूमबाई के भागते ही इटावा पूर्ण स्वतंत्र हो जाने की मुनादी पीटी गई और बाद में वे सारे सिपाही दिल्ली की ओर जानेवाली अपनी रेजिमेंट के मुख्य भाग से मिल गए। इस तरह यह पूरी रेजिमेंट एक व्यक्ति के कारण एकाएक विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं अपितु खजाना लूटना, देश स्वतंत्र करना, विदेशियों को अपनी तलवार की 1857 का स्वातंत्र्य समर – 143 ⁶³ रेड पैंफलेट, खंड 2, पृष्ठ 70 ।
नोंक पर रहते हुए भी जीवन-दान देना और बढ़ जाना, इस सारे कार्यक्रम का अभ्यास अलीगढ़, बुलंदशहर, मैनपुरी और इटावा जैसे दूर-दूर के भाग में भी एक साथ करने, दिल्ली का सारा नेटिव लश्कर विद्रोह कर दे, फिर भी वे विद्रोह नहीं करेंगे-जिसपर यह विश्वास सरकार का था वहीं रेजिमेंट कोई और नहीं उठा, उससे पहले तलवार निकालकर उठ खड़ी हुई। यह सब समाचार मिलने के बाद अंग्रेजों को अपने जीवन का तनिक भी भरोसा नहीं रह गया था। अजमेर से कोई छह कोस पर नसीराबाद नाम का गांव है। वहां अंग्रेज सिपाहियों की छावनी थी और वहां 30वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट, नेटिव तोपखाना, पहली बंबई लांसर और मेरठ से वहां लाई गई 15वीं रेजिमेंट-इतनी सेना इकट्ठा थी। मेरठ से कुछ दिनों पूर्व ही लाई गई इस रेजिमेंट में अंग्रेजी सरकार के प्रति अति द्वेष और उसे उतार फेंकने की उत्कट लालसा पूरी तरह भरी हुई थी। मेरठ की गुप्त सभाओं में जो-जो प्रस्ताव हुए वे सब आमने-सामने नसीराबाद के सिपाहियों को समझाकर कहने को प्राप्त हुआ। यह दुर्लभ अवसर मेरठ के उन एक जहर राजनीतिक प्रचारकों (उपदेशकों) ने व्यर्थ गंवाया होता तो ही आश्चर्य होता। बंबई लांसर्स के कुछ गैर नेटिवों को छोड़कर सारा नेटिव लश्कर एकमत हो गया, क्योंकि उस दिन तोपखाने का प्रभाव बहुत ढीला हो गया था। अतः निर्धारित संकेत मिलते ही मेरठ की 15वीं रेजिमेंट ने पहले तोपखाना हथिया लिया। उसे वापस लेने बंबई के लांसर्स के साथ अंग्रेज अधिकारी आगे बढ़े। परंतु कुछ ही देर में उस लांसर्स के सिपाही मैदान से भाग गए और उनके अंग्रेज अधिकारी प्रेत बनकर भूमि पर गिर गए। इतना ही नहीं, उनके शरीरों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। कर्नल पेनी, कैप्टन स्पॉटिस वुड भी इस लड़ाई में मारे गए। फिर उस शहर से आशा छोड़कर सारे अंग्रेज बोरिया-बिस्तर लिये भाग खड़े हुए। विद्रोहियों ने खजाना अपने नियंत्रण में कर लिया और उनमें से सर्वसम्मति से चुने गए नेटिव सेनापति ने दिल्ली के बादशाह के नाम से सिपाहियों में इनाम बांटे। यूरोपियनों के घर जलाए गए, नसीराबाद स्वतंत्र हो जाने की घोषणा की गई। विद्रोहियों का दो-तीन हजार लोगों का वह समुदाय अपने शस्त्र चमकाता लश्करी ठाट से अपने स्वदेशी नए सेनापति के अधीन लश्करी बैंड बजाता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ चला। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 144
प्रकरण-6 रूहेलखंड रूहेलखंड प्रदेश की मुख्य राजधानी का शहर बरेली है। इस राज्य में रोहिला जाति के पठानों का राज था और उसे जब से अंग्रेजों ने छीना, तभी से इस अपमान का बदला लेने के लिए घात लगाए बैठे शूर, बलिष्ठ और क्रूर मुसलमानों की एक बड़ी बस्ती वहां थी। सन् 1857 के आसपास अंग्रेजों के शिकंजे से छूटने के लिए विद्रोह की चर्चा जिन किन्हीं प्रदेशों में रंग ला रही थी उसमें रूहेलखंड की और उसकी राजधानी की भी गिनती करनी होगी। बरेली में इस समय 9वीं इरेंग्यूलर घुड़सवार, नेटिव पैदल की अठारह और 68वीं रेजिमेंट तथा नेटिव तोपखाने की एक बैटरी-इतनी नेटिव सेना थी। इस ब्रिगेड का ब्रिगेडियर सिवाल्ड था। अप्रैल में कुछ सिपाहियों ने कारतूसों के संबंध में आशंका व्यक्त की थी। परंतु उधर ध्यान न देते हुए सरकार ने सिपाहियों ने कारतूसों को एक-एक में अलग करके उनसे कारतूस चलवाए। आगे भी एक-दो बार गड़बड़ होने से सिपाहियों में क्षोभ बढ़ ही रहा था; फिर भी सरकार को उनके चेहरों पर संतोष ही दिखता रहा। इसी समय 14 मई को मेरठ विद्रोह का समाचार बरेली आ पहुंचा। यह समाचार आते ही अंग्रेजों ने अपने बाल-बच्चे नैनीताल भेजकर घुड़सवारों को तैयार रहने का आदेश दिया। यह घुड़सवार पलटन नेटिव ही थी, पर थी सरकार के पूर्ण विश्वास की। इस घुड़सवार रेजिमेंट के साथ बरेली की सभी नेटिव सिपाहियों को परेड पर बुलाकर अंग्रेज अधिकारियों ने दिनांक 14 मई को उन्हें उत्तम आचरण रखने का आदेश किया। नए कारतूस अब काम में नहीं लाए जा रहे हैं, सिपाहियों को जो पसंद हैं वही पुराने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 145
कारतूस वे काम में लाएं। नए कारतूस यदि दिखाई दिए तो मैं उनका चूरा कर दूंगा, ऐसा स्पष्ट कहते हुए एक अधिकारी ने सिपाहियों में व्याप्त कारतूसों का डर दूर करने का प्रयास किया। वास्तव में देखें तो अब सिपाहियों के भय पर व्याख्यान देते समय कारतूसों की बात करना विषयांतर ही था। ˙˙˙स्वयं कमांडर-इन-चीफ द्वारा सारे हिंदुस्थान में सिपाहियों को सैनिक आदेश से यह घोषित कर दिया गया था कि आगे से नए कारतूस काम में लाना सरकार ने बंद कर दिया है। मरेठ के विद्रोह के बाद जब सरकार ने स्वयं ही कदम पीछे हटा लिया और जिन कारतूसों के लिए मई माह के पहले इतनी जिद की थी-वे ही कारतूस काम में लाना स्वयं ही बंद किया तो-इस आदेश में सरकार की भयग्रस्तता और दुर्बलता के सिवाए सिपाहियों व लोगों को कुछ और नहीं दिखा। कारतूसों के कारण सिपाही भड़के हैं, यह समझने में सरकार से जो गलती हुई उसका पूरा विस्फोट बरेली में होने का अवसर आ गया था। ब्रिगेडियर ने यह कहकर कि नया कारतूस दिखते ही मैं उसे चूरा कर दूंगा, उनका डर दूर करने का प्रयास किया। परंतु अब इस तरह के आदेश से शांति स्थापित होने के दिन नहीं रहे थे; क्योंकि सिपाहियों को डर कारतूसों का नहीं था, वहां कारतूसों के संबंध में कैसा भी आदेश दिया जाए, तो भी उसका क्या उपयोग? अंग्रेजों को आदेश देने का अधिकार रहे या न रहे, यही जहां चर्चा थी वहां नया आदेश देने से वह चर्चा बंद न होकर उलटे अधिक तीव्र होनी थी; अब कारतूसों के प्रकरण में अच्छा या बुरा, कैसा भी व्याख्यान देना विषयांतर ही था; क्योंकि दिल्ली में स्थापित स्वकीय सिंहासन की ओर से हिंदुस्थान का स्वातंत्र्य ध्वज थामे रखने के लिए रूहेलखंड के लोगों के लिए आग्रहपूर्ण और एक आवश्यक निमंत्रण आया हुआ है। अब इस निमंत्रण-पत्रिका को ठुकराना है क्या? "दिल्ली के फौजी बहादुरों की ओर से बरेली के फौजी बहादुरों को प्रेमालिंगन! भाई, दिल्ली में अंग्रेजों से लड़ाई हो रही है। परमेश्वर की कृपा से अपनी एक पराजय भी उनकी दस पराजय के बराबर हानि कर रही है। अनगिनत स्वदेशी वीर इधर आ रहे हैं। ऐसे समय आप वहां भोजन कर रहे हों तो हाथ धोने यहां आना। शाहों का बादशाह और वैभव का आगर जो अपना दिल्ली का बादशाह है, वह आपका बढ़िया मान-सम्मान करेगा और आपकी सेवा का उत्तम पुरस्कार भी देगा। आपकी तोपों की गड़गड़ाहट के लिए हमारा कार्य और आपके दर्शनों के लिए हमारे नेत्र चातक की तरह बाट जोह रहे हैं। आइए, जल्दी आइए! क्योंकि बंधु! भवदागमन के वसंत के बिना यहां गुलाब कैसे खिलेगा? दूध के सिवाए बच्चा कैसे जिएगा?⁶⁴ अब ऐसी निमंत्रण-पत्रिका को कैसे ठुकराया जाए? ऐसे निमंत्रणों के बीच रूहेलखंड के अंतिम स्वतंत्र रोहिला सरदार हाफिज रहमत का वंशज भी बरेली में गुप्त षड़यंत्र के ताने-बाने बुन रहा था। इस खानबहादुर खान को अंग्रेजों की ओर से वह हाफिज रहमत खां का वंशज होने के नाते 'एक' और वह अंग्रेज सरकार में जज था, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 146 64 असली पत्र : कॉलिंस नैरेटिव, पृष्ठ 33 ।
इसलिए 'दूसरी'-ऐसी दो पेंशनें मिलती थीं। अंग्रेज अधिकारियों का मुंह-लगा रहने में खान बहुत ही कुशल है, उधर यह कहा जाता था। सरकार का भी उसपर वैसा ही विश्वास था और बरेली के सारे गुप्त षड्यंत्रों का प्राण भी यही था। बरेली स्थित सारे नेटिव सिपाही और रुहेलखंड की स्वतंत्रता-प्रेमी जनता से इस निमंत्रण पत्र द्वारा जल्दी दिल्ली आने का आग्रह यद्यपि किया गया था, तब भी पहले से निश्चित 31 मई के दिन की राह में बरेली के सारे सिपाही अंग्रेजों के लश्करी आदेशों का पालन पूरी तरह करते हुए अपने-अपने काम कर रहे थे। इस बीच मेरठ से चले सौ सिपाही चुपके से लाइन में कुछ दिन रहकर और उधर के उत्क्षोभक समाचारों से क्रांति की हवा अधिक भरकर चले गए। फिर भी सिपाहियों ने ऊपर से शांति बनाए रखी थी। यूरोपियन लोग अपने बाल-बच्चे वापस बुला लें, यह निवेदन उसमें सिपाहियों के सूबेदार कर रहे थे। परंतु यह निवेदन माना जाने से पहले ही 29 मई को ऐसी भूमिका बनी कि प्रातः नदी पर नहाते समय उस दिन दोपहर को दो बजे ही यूरोपियनों को कत्ल करने की शपथ सिपाहियों ने ले ली। तत्काल अंग्रेजों ने अपने भरोसे की घुड़सवार रेजिमेंट तैयार की। वह भी बिना ना-नुकुर किए तैयार हो गई। परंतु वह पूरा दिन बीत गया, पर सिपाही उठे नहीं। यह समाचार झूठ निकला; फिर भी एक बात सिद्ध हो गई कि घुड़सवार पूरी तरह अपने अधीन हैं, यह कहते हुए अंग्रेज रात को लौट गए। फिर दूसरा पक्का समाचार आया कि घुड़सवार रेजिमेंट ने तो पहले ही शपथ ले ली है कि हम अपने देशबंधुओं पर शस्त्र नहीं उठाएंगे और फिरंगियों की ओर से नहीं लड़ेंगे। ऐसे में किस बात पर विश्वास किया जाए, यह अंग्रेजों की समझ में नहीं आ रहा था। इस तरह 29 मई ही नहीं, 30 मई भी निकल गई और उस दिन तो सिपाहियों का आचरण इतना राजनिष्ठ हो गया था कि वैसा शायद कभी नहीं था। ऐसे में सैनिक-असैनिक-सारे अंग्रेज अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि संकट टल गया है और अब डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। 31 मई उदित हुई। उस दिन कैप्टन ब्राउन लो के घर को एकाएक आग लग गई थी। परंतु अंग्रेजों के मन में डर उत्पन्न हो, ऐसा कोई विशेष कारण नहीं था। वह दिन रविवार का था। रविवार को होनेवाली लश्करी हाजिरी हो गई। नेटिव अधिकारियों की रिपोर्ट आ गई। अंग्रेज अधिकारियों को यह भी लगा कि आज सिपाही लोगों में विशेष संतोष और शांति दिख रही है। चर्च में अंग्रेजों ने प्रार्थना भी की। कहीं अणु मात्र भी गड़बड़ नहीं दिखी। घड़ी ने दोपहर के ग्यारह बजाए। तभी सिपाहियों की लाइन से एक तोप छूटी। तोप छूटते ही बंदूकों की आवाजें और चिल्ल-पों से आकाश भर गया। बरेली की क्रांति इतनी सूत्रबद्धता से की गई थी कि क्रांति आरंभ होते ही कौन किस यूरोपियन का खून करेगा, यह पहले ही ठहरा लिया 1857 का स्वातंत्र्य समर — 147
गया था। ग्यारह बजते ही 68वीं पैदल सेना ने अपनी लाइन के पास के यूरोपियनों पर आक्रमण किया। छोटी-छोटी टुकड़ियां अलग-अलग बंगलों की ओर तुरत-फुरत चल पड़ीं। बाकी बचे सिपाहियों ने इधर-उधर भागना चाहनेवाले अंग्रेजों की व्यवस्था करने, उनके घर लूटने, उनमें आग लगाने की दौड़ लगाई। उन कर्कश चीत्कारों को सुनकर डरे-सहमे यूरोपियन लोग घुड़सवारों की लाइन की ओर दौड़े। वहां आश्रयार्थ इकट्ठे होने की सारे मुलुकी और लश्करी अधिकारियों की योजना पहले से बनी थी। वहां जाते ही नेटिव घुड़सवार रेजिमेंट को विद्रोहियों पर आक्रमण करने का आदेश दिया गया। पर उस रेजिमेंट का मुख्य नेटिव अधिकारी मोहम्मद शफी विद्रोहियों से मिला था। घुड़सवारों को अपने पीछे दौड़कर आने का आदेश देता वह विद्रोहियों की ओर दौड़ चला। उसने घुड़सवारों को-‘स्वधर्म के लिए बलिदान दो। देखो, वह हरा निशान तुम्हें बुला रहा है। 'ऐसा चिल्लाकर कहा और सारे घुड़सवार दौड़ पड़े। फिर भी, जो कोई शेष रहे उन्हें लेकर अंग्रेजों ने एक बार परेड की ओर आने का प्रयास किया। पर विद्रोहियों की मार के आगे एक क्षण भी रुकना असंभव होने के कारण उन्होंने उधर से पीठ फेरी और सबके सब नैनीताल की ओर भागने लगे। ब्रिगेडियर सिवाल्ड इस पहले ही हमले में मारा गया। कैप्टन कर्बी, लेफ्टिनेंट फ्रेजर, सार्जेंट वाल्डन, कर्नल ट्रूप, कैप्टन रॉबर्ट्सन आदि जो भी अधिकारी विद्रोहियों के हाथ लगे, उन्हें उन्होंने काट डाला। इस कत्लेआम से बचकर लगभग बत्तीस अधिकारी नैनीताल तक सही-सलामत पहुंच सके। इस तरह छह घंटों के अंदर बरेली में अंग्रेजी शासन का अंत हो गया। अंग्रेजी निशान उतार फेंककर बरेली में स्वतंत्रता का झंडा फहराते ही नेटिव तोपखाने के मुख्य सूबेदार बख्त खान ने सारी नेटिव सेना का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। बख्त खान का नाम आगे दिल्ली की लड़ाई में हमको सुनने को मिलेगा। इस सेनापति ने सारे नेटिव सिपाहियों को स्वतंत्रता के बाद किस तरह व्यवहार करना है और नवस्थापित स्वराज्य में क्या-क्या कर्तव्य करने चाहिए, इसपर एक भाषण दिया और बाद में अंग्रेज ब्रिगेडियर की बग्घी में बैठकर यह स्वदेशी ब्रिगेडियर बरेली के रास्ते से जाने लगा।⁶⁵ उसके साथ अलग-अलग अंग्रेज अधिकारियों की गाड़ियों में नवनियुक्त अधिकारी भी चल दिए। खानबहादुर खान के नाम का जयघोष करके दिल्ली के बादशाह के सूबेदार की हैसियत से उन्होंने रूहेलखंड का शासन अपने हाथ में लिया। बरेली में स्थित यूरोपियनों के घर-द्वारों को जलाकर, लूटकर भस्म करने के बाद फिर कैद किए गए यूरोपियनों को खानबहादुर ने अपने सामने बुलवायां अंग्रेजी शासन में जज का काम करने से उन्हें न्याय कैसे किया जाता है, यह ज्ञात ही था। इसलिए उन्होंने उन यूरोपियन अपराधियों की जांच के लिए एक कोर्ट नियुक्त किया। इन अपराधियों में 1857 का स्वातंत्र्य समर – 148 ⁶⁵ चार्ल्स बाल कृत-‘इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 175 ।
वायव्य प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर का दामाद डॉ. 'हे' भी था। बरेली के सरकारी कॉलेज का प्रिंसिपल डॉ. कर्सन भी था। बरेली का जिला मजिस्ट्रेट भी था। एक दिन पूर्व ही राजनिष्ठ खानबहादुर खान इसके गले में गलबहियां डालकर बैठे थे। आज ये सिंहासन पर और वह अपरधी के पिंजरे में था। ज्यूरी की शपथ लेकर रीति अनुसार न्यायासन पर बैठे। अलग-अलग आरोप अलग-अलग अपराधियों पर लगातार उन्हें फांसी का दंड सुनाया गया और उन छह यूरोपियन लोगों को तुरंत फांसी पर चढ़ा दिया गया। तुरंत ही खानबहादुर के आदेश से एक विज्ञापन छापा गया कि यूरोपियन कमिश्नर भाग गया है। उसे जो पकड़कर लाएगा या उसका सिर काट लाएगा, उसे एक हजार रूपए का पुरस्कार सरकार के खजाने से दिया जाएगा। इस तरह यूरोपियन रक्त और मांस से अपना सिंहासन पक्का जमाने के बाद खानबहादुर ने सारा रूहैलखंड स्वतंत्र होने का समाचार दिल्ली भेजा। उस दिन विद्रोह ग्यारह बजे आरंभ हुआ और शाम को सूर्यास्त के पूर्व सारा प्रांत स्वतंत्र हो जाने की घोषणा दिल्ली की ओर चल दी। वह सारा प्रांत स्वतंत्र हो जाने की घोषणा केवल शाब्दिक थी, ऐसा भी नहीं है। उधर बरेली में विद्रोह की तोपें अपनी गड़गड़ाहट से अंग्रेजी सत्ता को कंपा रही थीं, इधर शाहजहांपुर में भी गोरे रक्त का छिड़काव होने लगा था। बरेली से शाहजहां लगभग चालीस मील की दूरी पर है। वहां 28वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट थी। मेरठ की खबर शाहजहांपुर 14 मई को पहुंची। परंतु अंग्रेज अधिकारियों को पता चल जाए, ऐसा एक भी खुला कृत्य न होने से 31 मई का दिन भी अन्य दिनों की तरह बड़ी शांति, संतोष और उल्लास में उदय हुआ। वह रविवार का दिन था। सारे अंग्रेज चर्च में भी गए। उनकी प्रार्थना अभी आधी ही थी कि चर्च की ओर सिपाही तीव्रता से दौड़ते हुए आने लगे। उस चर्च का चैप्लेन बाहर आया तो उसका हाथ सिपाहियों ने उड़ा दिया और विद्रोह की शुरूआत हो गई। शहर का मजिस्ट्रेट रिफेट्स भागते हुए मारा गया। सर बाडोर को चर्च के अंदर ही कुचल दिया गया। चर्च पर आक्रमण करने एक टोली इधर आई,तभी दूसरी एक टोनी कैंटोनमेंट में यूरोपियनों को मारने के लिए भेजी गई थी। उसने उधर आग लगाने और लूटने का काम चालू कर दिया था। असिस्टेंट मजिस्ट्रेट जान बचाने भागा तो बरामदे में ही काट डाला गया। सिपाहियों से दो बातें कहने का प्रयास डॉ. बाउलिंग ने किया और सिपाही भी उसकी बात सुनने लगे; परंतु दुर्भाग्य, उसने उनको 'राजद्रोही' कह दिया। उसके मुंह से यह शब्द निकलना था कि एक गोली सनसनाती हुई आई औ वह चल बसा। चर्च की ओर जो विद्रोही गए थे वे केवल तलवारें और लाठियां लेकर गए थे, इसलिए वे बंदूकें लेने लाइनों की तरफ आए। इसी बीच सिख सिपाही और बावरची आदि नौकरों ने कुछ अंग्रेज स्त्री-पुरूषों को पास के एक राजा के यहां पहुंचाया। पर राजा द्वारा अपनी असमर्थता व्यक्त कर उन्हें निकाल देने पर वे उघड़े बदन, नंगे पैर महमंदी की ओर निकल गए। इस तरह 31 मई की संध्या 1857 का स्वातंत्र्य समर – 149
तक शाहजहांपुर भी स्वतंत्र हो गया। बरेली से वायव्य दिशा में लगभग अड़तालीस मील की दूरी पर मुरादाबाद जिला मुख्यालय है। वहां 29वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट और नेटिव तोपखाने की आधी बैटरी-इतनी सेना थी। मेरठ के समाचार के बाद इस सेना के मन में कितनी राजनिष्ठा है, यह देखने का एक अपूर्व अवसर आया। मरेठ के कुछ सिपाही मुरादाबाद के पास ही ठहरे हुए हैं, ऐसा समाचार अंग्रेज अधिकारियों को 18 मई को मिला तो उन्होंने उनपर रात में ही छापा मारने का आदेश उस रेजिमेंट को दिया। उस आदेश को सिर-माथे लेकर उन सिपाहियों ने उस रात मेरठ के जंगल में सो रही सेना पर बहुत जोर का आक्रमण किया। परंतु जाने क्या हुआ कि मेरठ की उस मुट्ठी भर सेना पर सोते हुए-आकस्मिक और प्रबल आक्रमण होने पर भी उसमें से एक को छोड़ सारे सैनिक जीवित भाग गए। पर सिपाही उसके लिए क्या करें? उस रात अँधियारा भी विकट था। अंग्रेज अधिकारियों ने कहा, "सिपाहियों ने कमाल का आक्रमण किया; पर अँधियारे के कारण ही शत्रु जीवित भाग सका।" अब यह ज्ञात हुआ कि मेरठ की सेना पर मुरादाबाद के सिपाहियों ने दिखावे का आक्रमण किया था। इतना ही नहीं, उस रात भागे हुए मेरठ के कुछ सिपाही मुरादाबाद के सिपाहियों की लाइन में ही आकर रहने लगे थे। परंतु अंग्रेजों का 29वीं रेजिमेंट पर उस कमाल के आक्रमण से भारी विश्वास तक कुछ भी घटित नहीं हुआ। 31 मई उदित हुई और परेड पर सिपाही पूरे अनुशासन में एकत्र होने लगे। ओदश के बिना तुम लोग यह क्या कर रहे हो? ऐसा अंग्रेज अधिकारी जो पूछने लगे तो सिपाहियों ने उन्हें आदेश दिया कि "कंपनी का राज समाप्त हो गया है, अतः आप प्रदेश छोड़कर भाग जाएं, नही ं तो आपको कत्ल कर दिया जाएगा। तुरंत नहीं जा सकते तो दो घंटे की मोहलत दी जा सकती है। परंतु उतनी देर में मुरादाबाद खाली करना होगा।" सैनिकों के इस ओदश के साथ ही मुरादाबाद की पुलिस ने भी अब अंग्रेजों के आदेशों का पालन न करने की घोषण की और शहर के नागरिकों ने भी उससे सहमति जताई। एक ही समय तीनों ओर से चेतावनी मिलते ही मुरादाबाद के जज साहब, कलेक्टर साहब, मजिस्ट्रेट साहब, सर्जन साहब और अन्य सारे साहब अपने बाल-बच्चें लेकर एक पल भी विलंब न करते हुए मुरादाबाद में दिखे उन्हें काट डाला गया। मि. पॉवेल आदि कुछ लोगों ने इस्लाम धर्म अपनाया और अपने प्राण बचाए। सैनिकों ने खजाने पर कब्जा किया। सारी सरकारी संपत्ति पर भी कब्जा किया गया और मुरादाबाद पर 31 मई की शाम से पूर्व ही हरा झंडा लहराने लगा। 66 1857 का स्वातंत्र्य समर - 150 66 चार्ल्स बाल, भाग 1 ।
बरेली और शाहजहांपुर-इन दो शहरों के बीच बदायूं नामक जिले का मुख्यालय है। उस जिले का कलेक्टर और मजिस्ट्रेट मि. एडवर्ड्स उसी शहर में रहता था। अंग्रेजी राज के प्रारंभ से पुराने जमींदारों की दुर्दशा और लगान वसूली के लिए झटपट की जानेवाली नीलामी में हाथ से जाती हुई जमीनों से पूरे रूहेलखंड के बड़े-बड़े जमींदार और किसान बहुत त्रस्त हो गए थे। उसमें भी बदायूं में लगान पद्धति का इतना अत्याचार था कि यह जिला अंग्रेजी राज को मिटा देने के लिए किसी भी अवसर की ताक में था। यह बात स्वयं एडवर्ड्स को भी ज्ञात थी और इसलिए उसने बरेली से सेना की सहायता मांगी थी। परंतु स्वयं बरेली के उस समय क्या हाल थे, यह पहले बताया ही जा चुका है। फिर भी बरेली से यह लिखित प्राप्त हुआ कि 1 जून को हम यूरोपियन अधिकारी के अधीन सेना भेज रहे हैं। यह समाचार आते ही एडवर्ड्स बहुत खुश हुआ। वह 1 जून को बरेली के रास्ते की ओर आंखें गड़ाए बैठा रहा। उस रास्ते पर कोई सरकारी आदमी दौड़ता आ रहा है, वह भी उसे दिखने लगा। अर्थात् बरेली से आनेवाली सहायता का यह हरकारा ही है, यह मान एडवर्ड्स ने उतावली में उससे प्रश्न किए। परंतु प्रश्न के उत्तर में में बरेली से बदायूं को सेना सहायता के लिए आ रही है, यह न बताते हुए यह बताया गया कि बरेली में ही अंग्रेजी सत्ता समाप्त हो गई है। बदायूं में खजाने की सुरक्षा के लिए कुछ सिपाही रखे हुए थे। उसके अधिकारी से एडवर्ड्स ने पूछा, "बरेली सवतंत्र हो गई। बदायूं का क्या होगा? " अधिकारी ने कहा, "मेरे सिपाही राजनिष्ठ हैं। कोई डर नहीं है।" उसने उसने यह आश्वासन दिया ही था कि शाम को बदायूं में विद्रोह हो गया। खजाने के सैनिक, पुलिस और नागरिक-सबने फिरंगी राज डूब जाने की घोषणा कर दी और वह सारा जिला खानबहादुर खान के नियंत्रण में चला गया। सैनिकों ने खजाना लेकर दिल्ली की ओर कूच किया और बदायूं के रे अंग्रेज अधिकारी रात में ही जंगलों में होकर भागने लगे। खाने को अन्न नहीं, पहनने को कपड़ा नहीं-ऐसी स्थिति में छिपते-छिपते कभी-कभी किसी गांववाले के घर भैंसों के पीछे, जहां गोबर की दुर्गंध से नाक फट रही थी वहां हफ्ते-हफ्ते बिताते अंग्रेज महिलाएं, अंग्रेज कलेक्टर, मजिस्ट्रेट अपने प्राण बचाते भाग रहे थे। कुछ मारे गए, कुछ मर गए, कुछ दयालु नेटिवों के कृपाश्रय में प्राण बचाए बने रहे। इस तरह पूरा रूहेलखंड एक दिन के अंदर विद्रोह कर उठा। बरेली, शाहजहांपुर मुरादाबाद, बदायूं आदि जिलों के शहरों में स्थित सेना, पुलिस और जनता ने एक चेतावनी में ही दो घंटे के अंदर ब्रिटिश सत्ता को सीमा पर कर दिया। ब्रिटिश सिंहासन औंधा हुआ, उसपर स्वकीय सिंहासन विराजमान हुआ। ब्रिटिश झंडा उतारकर उसके स्थान पर हरे झंडे लगाए गए। ब्रिटिश कोर्ट, कार्यालयों और थानों से हिंदुस्थान पर अधिकार करनेवाला इंग्लैंड अपराधी के कठघरे में खड़ा हो गया। ऐसा यह विलक्षण 1857 का स्वातंत्र्य समर - 151
परिवर्तन सारे प्रदेश में दो घंटे में हो गया। रूहेलखंड से अंग्रेजी शासन का उन्मूलन रकने के लिए स्वदेशी रक्त की एक बूंद भी खर्च नहीं करनी पड़ी। यह कितना बड़ा आश्चर्य था। रूहेलखंड गुलाम है, यह न कहकर रूहेलखंड स्वतंत्र है, ऐसा सबने कहा और वह स्वतंत्र हुआ। सेना, सिपाही, नागरिक-सबके विद्रोह करते ही हर जिले के मुख्य शहर से दो-चार यूरोपियन अधिकारियों को निकाल देने से अधिक उस प्रदेश को स्वतंत्र करने को कुछ भी अधिक काम नहीं करना पड़ा। गुप्त कार्यक्रम , मजबूत संगठन और उसके द्वारा की गई त्वरित कौशलपूर्ण कार्यवाही-इन बातों के आधार पर अंग्रेजों के कब्जे से निकलते ही रूहेलखंड ने खानबहादुर खान का शासन स्वीकार किया। पहले बताया गया है कि यहां के सारे सैनिक बरेली के तोपखाने के सूबेदार बख्त खान की अधीनता में दिल्ली की ओर लड़ने चल दिए। उसके बाद खानबहादुर खान ने प्रदेश का बंदोबस्त रखने के लिए नई सैनिक भरती चालू की और राजधानी के अधिकतर पहले के लोग ही रखे गए और वरिष्ठ स्थानों पर नए स्वदेशी अधिकारियों की नियुक्ति की गई। सरकारी पैसा दिल्ली के बादशाह के नाम पर वसूल किया जाने लगा। न्याय देने के लिए पहले जैसे ही कोर्ट खोले गए और पहले के ही नौकर नियुक्त कर दिए गए, संक्षेप में, जहां यूरोपियन अधिकारी होते थे वहां हिंदुस्थानी नियुक्त करने के सिवाय किसी भी विभाग में राज्य क्रांति के धक्के से अन्य तरह का परिवर्तन नहीं हुआ। खानबहादुर खान ने अपने सूबे की यह सारी जानकारी दिल्ली के बादशाह को लिखकर भेज दी और रूहेलखंड में निम्नलिखित राजकीय घोषणापत्र लगाया गया। “हिंदुस्थान देश के वासियों! स्वराज्य-प्राप्ति का दुर्लभ अवसर तुम्हें प्राप्त हो गया है। उसको स्वीकार करोगे या अनादर? इस अपूर्व और असाधारण अवसर का तुम लाभ लोगे या उसे हाथ से फिसल जाने दोगे? हिंदू बंधुओं और मुसलमान भाइयों! यह ध्यान में रखना कि यदि अपने हिंदुस्थान देश में इन अंग्रेजों को तुमने रहने दिया तो ये तुम्हारे देश का सत्यानाश और तुम्हारे धर्म का विनाश किए बिना कभी भी रहनेवाले नहीं हैं।67 अंग्रेजों के फरेब के कारण आज तक हिंदुस्थान के निवासियों ने अपनी गरदन अपनी ही तलवार से काटी है। अतः वह गृह-क्लेश की गलती हमें अब ठीक कर लेनी चाहिए। मुसलमानों से लड़ने की सलाह हिंदुओं को देना और हिंदुओं के विरूद्ध चलने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 152 67 हिंदू एवं मुस्लिम बंधुओं, भलीभांति समझ लो कि यदि तुमने अंग्रेजों को हिंदुस्थान में रहने दिया तो वे निश्चित रूप से तुम्हारा धर्म भ्रष्ट करेंगे और तुम्हारा नरमेध भी होगा। ˙ ˙ ˙ अंग्रेज अब भी हमारे साथ कुटिलता की नीति का ही पालन करेंगे। वे हिंदू को मुसलमान के विरूद्ध उभारने में कदापि नहीं चूकेंगे। '” -द दफ्तर ऑफ खानबहादुर खान, ट्रांसलेटेड बाइ क्रासॉफ्ट विल्सन
की बात मुसलमानों को कहना-इस कपट नाटक का प्रयोग अंग्रेज लोग अब भी करना चाहेंगे। परंतु हिंदू बंधुओं, आप उनके जाल में मत फंसना। चतुर हिंदू बंधुओं से यह कहना आवश्यक नहीं कि अंग्रेज लोग अपने वचन का कभी भी पालन नहीं करते। झूठी-सच्ची बातें कहकर बहलाने में वे उस्ताद हैं। वे पृथ्वी से अन्य धर्मियों का नाश करने के लिए आज तक प्रयास करते रहे। उन्होंने दत्तक संतान के अधिकार छीने, देशी राजाओं के प्रदेश और राज्य उन्होंने डुबो दिया। हिंदू और मुसलमान दोनों को ही उन्होंने पैरों तले कुचला। मुसलमान भाइयों, तुम्हें कुरान की परवाह हो और हिंदुओं, आपको गो माता की चिंता हो तो अब आपस के भेदभाव भूलकर इस जिहाद में सब लोग सम्मिलित हो जाओ। एक झंडे के नीचे लड़ते-लड़ते मैदान में कूद पड़ो और हिंदुस्थान से अंग्रेजों का नाम रक्त के प्रवाह से धो डालो। हिंदुस्थान से फिरंगियों को नष्ट करने के लिए यदि हिंदू लोग मुसलमानों के साथ लड़ेंगे, यदि स्वदेश की मुक्ति के लिए वे रणांगण बनाएंगे तो उनके देशाभिमान के इनाम-स्वरूप गो माता का वध बंद किया जाएगा। इस धर्मयुद्ध में जो स्वयं लड़ेगा या दूसरों को लड़ने के लिए द्रव्य सहायता करेगा, वह ऐहिक और पारमार्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करेगा। परंतु यदि कोई इस स्वदेश युद्ध के विरूद्ध जाएगा तो ˙ ˙ ˙तो वह स्वयं के सिर पर आघात करके आत्महत्या का अपराधी होगा। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 153
प्रकरण-7 बनारस और इलाहाबाद कलकत्ता से लगभग चार सौ साठ मील दूर श्री जाह्नवी के किनारे बनारस शहर अपने पुरातन वैभव के साथ बसा हुआ है। भागीरथी के पवित्र, शीतल और धवल जल में प्रतिबिंबित होने का महद्भाग्य जिन शहरों को है, बनारस उन सब शहरों की पटरानी लगता है। गंगा के घाट से एक पर एक चढ़ती भुवनराजि, उनके मस्तकों पर सुवर्ण मुकुटों-से चमकते ऊंचे-ऊंचे मंदिरों के कलश, उनपर चंवर जैसे डोलते फल-पुष्पों से भरे घने वृक्ष, भिन्न-भिन्न दिवालयों में बजते हजारों घंटों के अलग-अलग स्वर एक-दूसरे से मिलकर उनसे उत्पन्न होनेवाली कर्ण-मधुर एक तान और सारी सुंदरता पर स्थापित श्री काशी विश्वेश्वर के अधिष्ठान आदि से बनारस शहर को अनन्य शोभा प्राप्त हुई है। आसक्ति के लिए भोग-विलासाकांक्षी, भक्ति क्षेत्र में अपने-अपने साध्य की सिद्धि पाते हैं। जग में वैभव का उपभोग कर पूर्णकाम हुए लोगों का काशी क्षेत्र वानप्रस्थाश्रम यर संन्यासाश्रम है। इस जग में सारी आस और उपभोग दुष्ट दुर्जनों के मत्सर या दीप्ति के कारण छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। ऐसे भाग्यहीन और वैभवविहीन लोगों का काशी क्षेत्र और वहां की भी भागीरथी का प्रसन्न जल-तुषार-श्रम-परिहारक शांति भवन हैं। ऐसे इस शांति भवन में अपना श्रम-परिहरण करने के लिए आनेवाले भाग्यहीन लोगों की सन् 1857 में अंग्रेजों की कृपा से बिलकुल कमी नहीं थी। दिल्ली की अमीरी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 154
बंद होने से अशरण हुए कितने की राजपुत्र और अन्य कितने ही मुसलमान, सिख और मराठों के नष्ट-वैभव हुए राजकुल उस बनारस शहर में अपने दुःखों की कहानी मंदिर-मंदिर और मस्जिद-मस्जिद में कहने बैठे हुए हैं। ऐसे इस शहर में हिंदुस्थान में चल रही स्वधर्म की दुर्दशा और स्वराज्य का नाश आदि पर चर्चा हिंदू और मुसलमानों में विशेष जोर-शोर से चले, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। बनारस से कुछ ही दूरी पर स्थित सिक्रोली गांव में उस प्रदेश के लश्कर की छावनी थी। वहां नेटिव पैदलों की 37वीं रेजिमेंट, लुधियानवी सिख रेजिमेंट और एक घुड़सवार पलटन भी रखी हुई थी। वहां का तोपखाना अवश्य रूप से स्वराज्य और स्वधर्म के लिए विद्रोह करने की लालसा गुप्त रीति से उत्पन्न हुई थी। जैसे-जैसे सन् 1857 का साल करीब आने लगा वैसे-वैसे बनारस के लोक-समुदाय में विलक्षण खलबली मचने के चिह्न स्पष्ट होने लगे। उस शहर का मुख्य ममिश्नर टक्कर, जज म्यूबिन, मजिस्ट्रेट लिंड आदि स्थानीय अधिकारियों और कैप्टन ओलफर्ट, कर्नल गॉर्डन आदि लश्करी गोरे अधिकारियों ने पहले से ही बनारस में रह रहे अंग्रेज लोगों के संरक्षण की बहुत व्यवस्था की हुई थी; क्योंकि उस शहर में लोक-क्षोभ-कभी-कभी गोपनीयता की सामा के बाहर फूटने से-का जोर रोकना कठिन हो जाता। पुरबिया लोग 'हे रामजी! इन फिरंगियों की गुलामी से मुक्त करो' कहते हुए खुलेआम मंदिरों में प्रार्थना करने लगे। ⁶⁸ अन्य स्थानों की तैयारी कितनी क्या हुई, इसकी पक्की जानकारी ज्ञात करने हेतु समितियां स्थापित की गई। मई माह आते ही सैनिक छावनियों में मुसलमान मौलवियों का जमघट बढ़ गया। शहर की दीवारों पर और सार्वजानिक चौतरों पर लोक-शक्ति प्रचंड विद्रोह करे, इस हेतु घोषणाएं जिय और फिरंगियों का नाश हो, इस हेतु सार्वजनिक प्रार्थना करने लगे। उसी समय बाजार में अनाज के भाव बहुत अधिक बढ़ने लगे। भाव इतने अधिक बढ़ गए तो अनाज व्यापारियों की ही अंतिम हानि कैसे है, यह अर्थशास्त्रीय सिद्धांतज ब बाजार में घूमकर अंग्रेज अधिकारियों ने समझाना चालू किया तब लोग उनसे मुंह पर ही पूछने लगे कि हमारे देश में मंहगाई कर अब हमें ही उपदेश देने क्यों तैयार हुए हो? बनारस शहर में इस लोक-क्षोभ का विशाल रूप देखकर अंग्रेजों को इतना डर हो गया कि विद्रोह होने से पहले ही बनारस छोड़कर जाने का आग्रह स्वयं ओलफर्ट और कैप्टन वॉटसन करने लगे। अंत में म्यूबिन ने बेचैन होकर उनसे कहा, I will go on my knees to you not to leave Beneares!' (बनारस न छोड़ें, मैं आपके पांव पड़ता हूं।) इस पैर पकड़ने के प्रभाव से बनारस छोड़कर जाने का विचार तात्कालिक रूप से रद्द कर दिया गया-और वह क्यों न किया जाता। कारण, बनारस के सिख स्वयंसेवकों की टोलियां 1857 का स्वातंत्र्य समर – 155 ⁶⁸ 1. "रिपोर्ट ऑफ द जॉदंट मजिस्ट्रेट', मि, टेलर। 2. रेड पैफलेट, पृष्ठ 55।
बना ली गई थी। वारेन हेस्टिंग्स के लतियाए चेतसिंह का वंशज भी क्या आज अंग्रेजों की ओर नहीं जा मिला था! इतनी राजनिष्ठा कायम होने पर अंग्रेजों के लिए बनारस छोड़कर जाने का कोई कारण ही नहीं था। परंतु इस राजनिष्ठा पर सवार होकर अंग्रेज लोग बनारस में अपना आसन अटल करने की बात सोच ही रहे थे कि पड़ोस के आजमगढ़ से भयंकर गर्जना सुनाई देने लगी। आजमगढ़ बनारस से लगभग साठ मील दूर बसा था। वहां 17वीं देशी रेजिमेंट रखी हुई थी। इस रेजिमेंट में 31 मई से रोज भयानक खलबली मचने लगी। उसे शांत करने के लिए वहां का मजिस्ट्रेट मि. हार्न रोज सैनिकों को व्याख्यान देने लगा। पर ऐसे व्याख्यानों से दिल बहलने के दिन अब नहीं रहे थें 31 मई उदय हुई । उस प्रांत के सिपाहियों ने विद्रोह की सूचना देने के लिए बनारस में बैरकों को ही आग लगा दी। अतः जून के पहले हफ्ते में विद्रोह हो जाना है। आज 3 जून है। यह मुहूर्त कोई बुरा नहीं है; क्योंकि गोपालपुर में आ रहे खजाने में आजमगढ़ का खजाना मिलाकर 7 लाख रुपयों का खजाना बनारस की ओर जा रहा है। इससे उत्तम मुहूर्त कौन सा होगा। तारीख 3 जून क संध्या काल की प्रभा रात्रि में विलीन हो रही थी। सारे गोरे सैनिक अधिकारी अपने क्लब में इकट्ठा होकर खाना खा रहे थे और उनके बाल-बच्चें वहीं हंस-खेल रहे थे। इतने में धूम-धड़ाके का क्या अर्थ होता है, यह जून के पहले हफ्ते में अंग्रेजों को जुबानी याद था। उनकी भयभीत शांति ‘विद्रोह हुआ’, ऐसा एक-दूसरे को कहने लगी। तभी नगाड़ों और दुंदुभि की ध्वनि शुरू हो गई। एक क्षण भी नहीं गया और जिनके हृदय में मेरठ की स्मृतियां ताजा थीं वे गोरे लोग सिर पर पैर रखकर भागने लगे। औरतें-बच्चे, अधिकारी-सबने प्राणों की आशा छोड़ दी। पर आजमगढ़ के सैनिकों ने इस तरह मरे हुए-से लोगों को देखकर अधिक प्रतिशोध लेने का विचार छोड़ दिया था। उन्होंने उन गोरे लोगों को जीवित रखने के लिए अपने कब्जे में ले लिया और आजमगढ़ छोड़कर तुरंत चले जाने को कहा। परंतु कुछ भीमकाय सैनिकों ने अंग्रेजी रक्त चखने की भीषण प्रतिज्ञा की हुई थी, उनकी उस भीष्म प्रतिज्ञा का क्या हो?⁶⁹ तो लेप्टिनेंट ने हचिंसन साहब और क्वार्टर सार्जेंट लुई साहब, कम-से-कम तुम्हारे शरीर में तो ये हमारी गोलियां घुसनी ही चाहिए। बस, अब शेष चाहें तो भाग जाएं। वे दौड़कर नहीं जा सकते हों तो गाड़ियों में बैठकर आजमगढ़ छोड़ दें। फिर भी, हमें कुछ कहना नहीं है। पर यूरोपियन अधिकारी और उनकी पत्नियां कहने लगीं-‘पर हमें अब गाड़ियां भी कौन देगा?’ सैनिकों ने कहा, ‘‘उसकी चिंता न करें। हम देते हैं गाड़ियां।’’ ऐसी विलक्षण उदारता देख कर्ण भी सिर नवाए, इसमें कोई शंका नहीं। सैनिकों ने स्वयं गाड़ियां मंगवाई और उसमें उन कैदी अंग्रेजों को मुक्त कर बैठाया। साथ में कुछ संरक्षक सैनिक भी दिए और आजमगढ़ की अंग्रेजी सत्ता के नाम-निशान के साथ वे सारे बनारस की ओर चल दिए। उध रवह 7 लाख का खजाना, अंग्रेज सैनिकों का तोपखाना, अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 156 ⁶⁹ सर कॉलिंग कैंपबल कृत-‘नैरेटिव्स’, पृष्ठ 38।
सत्ता की मुहर जिसपर थी वह जेल, कार्यालय, रास्ते, बैरकें-सब पर जो सैनिकों ने अधिकार किया उसकी अगुवाई किसने की? विद्रोह का समाचार मिलने पर यदि सैनिक विद्रोह कर ही दें तो अपनी सुरक्षा हो सके, इसलिए जिन अति विश्वसनीय सिपाहियों को अंग्रेजों ने नियुक्त किया था, उन सिपाहियों ने। यह पुलिस विभाग भी सेना की तरह अंदर से खोखली सुरंग थी। संकेत मिलते ही उन्होंने यूरोपियन घरों और कारागृह पर स्वराज्य का निशान लगाना प्रारंभ किया। बनारस की ओर जाती गाड़िया में जिन्हें जगह न मिली, ऐसे कितने ही अंग्रेज गाजीपुर की ओर भाग गए और दूसरे दिन का सूर्य अपनी अनुपस्थिति की अल्पावधि में हुए इस विलक्षण रूपांतर की ओर साश्चर्य देखते-देखते आजमगढ़ पर फहराते हरे निशान को प्रकाशित करने लगा।⁷⁰ जो हृदय में डोल रहा था वहीं हिंदुस्थान का हरा निशान आज अपने सिर पर भी मंडरा रहा है, यह देखकर विजयी रंग में रंगे सारे सैनिकों ने एक बड़ा भारी सैनिक जलूस निकाला और लश्करी बैंड के ताल-सुर पर अपना हरा निशान लहराते हुए वे फैजाबाद की ओर चले गए। आजमगढ़ स्वतंत्र होने का समाचार बनारस पहुंचते ही उस शहर की हलचलों से अंग्रेजों में उत्पन्न हुए भय का निराकरण होने के संकेत दिखने लगे। मेरठ के विद्रोह का समाचार सुनकर पंजाब से जॉन लॉरेंस और कलकत्ता से लॉर्ड केनिंग यूरोपियन सेना को विद्रोह के मुख्य स्थान की ओर भेजने के लिए अश्रांत श्रम कर रहे थें उत्तर की ओर से भेजी गई गोरी सेना दिल्ली को घेरकर बैईी होने से दिल्ली को घेरकर बैठी होने से दिल्ली के निचले हिस्से में सभी ओर असहायता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी और अंग्रेज अधिकारी कलकत्ता को-कृपा करके यहां यूरोपियन भेजो ,(For God sake send us Europeans), यह मांग बिलकुल रोते हुए कर रहे थे। इस समय लॉर्ड केनिंग ने मद्रास, बंबई तथा रंगून से यूरोपियन सेना कैसे मंगाई और चीन पर होनेवाली चढ़ाई रदद क रवह सारी सेना हिंदुस्थान में ही कैसे रोककर रखी, इसका वर्णन पहले आ चुका हैं उस जगह-जगह से मंगाई गई यूरोपियन`सेना में से मद्रास के फ्युसिलियर के साथ जनरल नील इस समय बनारस तक आ पहुंचा था। यूरोपियन सेना की यह पहली कुमुक और वह भी जनरल नील जैसे बहादुर, साहसी और कठोर सेनापति के अधीन आ जाने से बनारस के अंग्रेजों में बहुत धीरज आ गया। इसी समय दानापुर की अंग्रेजी सेना भी बनारस आ गई। बनारस के लोगों की विलक्षण बेचैनी और वहां के सिपाहियों का शहर के लोगों से सहयोग होने के स्पष्ट प्रमाणों आदि की जानकारी के आधार पर वहां के अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह को उसके गर्भाशय में ही मसल डालने का निश्चय किया। जनरल नील की यूरोपियन सेना और बनारस के सिख सरदार और सिख सिपाहियों एवं तोपखाने की सहायता से विद्रोह को मसल डालने की योजना सहज ही सिद्ध हो जायेगी, इसका अधिकारियों को पहले से ही पूरा भरोसा था। आजमगढ़ का समाचार 4 तारीख को बनारस में पहुंचते ही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 157 ⁷⁰ 'नैरेटिव्स' में सर कॉलिन कैंपबल ने लिखा है- “The green flag was mastered on the right of the 3ʳᵈ.”
बनारस के नेटिव सिपाही विद्रोह करें, इसके पहले ही उन्हें निःशस्त्र कर दिए जाने का निश्चय बहुत चर्चा के बाद हुआ और उस दिन दोपहर को जनरल परेड का आदेश दिया गया। यह आदेश सुनते ही आगे क्या होगा, सिपाहियों को स्पष्ट दिखने लगा। अंग्रेज तोपखाना तैयार करके लाए हुए हैं, यह गुप्त समाचार भी उन्हें मिल गया था। परेड के मैदान पर अंग्रेज अधिकारी शस्त्र नीचे रखने का आदेश देकर हमें निःशस्त्र कर तोपों से उड़ा देनेवाले हैं, यह उन्हें स्पष्ट दिख गया और इसलिए शस्त्र नीचे रखना छोड़ उन्होंने समीप के शस्त्रागार पर ही हल्ला बोल दिया और कर्कश गर्जना करते हुए वे अंग्रेज अधिकारियों पर ही टूट पड़े। उनपर दबाव बनाए रखने के लिए मंगाई गई सिख रेजिमेंट भी वहां आ गई। उन सिख सिपाहियों में राजनिष्ठा का उफान इतने जोरों पर था कि वे हिंदुस्थानी सैनिक ने हमला किया और कमांडर न्युइस तत्काल मर गया। उसके स्थान पर ब्रिगेडियर जनरल हडसन अभी आ भी न पाया था कि तभी एक सिख सिपाही को जोश आया और उसने उसे गोली मार दी। परंतु यह अक्षम्य अपराध सहन न होने से उसके पास खड़े एक सिख सिपाही ने अंग्रेज को मारना चाहनेवाले सिख को तत्काल काट डाला। इस राजनिष्ठा के कृत्य को क्या पुरस्कार मिलता है, यह देखने के लिए दूसरे सिख उत्सुक थे-तभी उन सब पर अंग्रेजी तोपखाना बरसने लगा। सिख सिपाहियों में हिंदुस्थानी सिपाहियों द्वारा मचाई घालमेल देखकर सिख रेजिमेंट ही विद्रोही हो गई है-ऐसी गलतफहमी अंग्रेज अधिकारियों को होने पर उन्होंने हिंदुस्थानी रेजिमेंट के साथ सिख रेजिमेंट पर भी गोलीबारी करनी शुरू कर दी। अब उन अभागे सिखों को विद्रोहियों से मिल जाने के सिवाय दूसरा रास्ता ही नहीं बचा। उन सब भारतीय लोगों ने मिलकर अंग्रेजी तोपखाने परतीन हमले किए। हिंदू मुसलमान और सिख मिलकर अंग्रेजी तोपों पर टूटे पड़ रहे हैं-सन् 1857 के इतिहास में ऐसा अकेला अवसर यही था। प्रसन्नता की बात यह कि इस अवसर पर हो रहे पाप का शमन करने के लिए उसी समय बनारस शहर में सिख लोग अश्रांत प्रयास कर रहे थे। क्योंकि सिपाहियों और अंग्रेजों की जब बैरकों की ओर लड़ाई हो रही थी तब शहर के लोग भी विद्रोह करेंगे, इस डर से अंग्रेज अधिकारी, उनके बाल-बच्चे सारे रास्तों पर भाग रहे थे, उस समय उन्हें आश्रय देने के लिए सिख सरदार सूरतसिंह आगे आया। बनारस के खजाने में लाखों रूपया जमा था और उसी में सिख लोगों की भूतपूर्व पटरानी से अंग्रेजों के छीने हुए बहुत मूल्यवान रत्नालंकार भी भरे हुए थे और उस खजाने पर सिखों का कड़ा पहरा था। अर्थात् यह खजाना अपने कब्जे में लेकर, सीमा पर की हुई अपनी रानी के अलंकार वापस लेने की अनिवार्य इच्छा सिखों के मन में 1857 का स्वातंत्र्य समर - 158
उत्पन्न होना अस्वाभाविक नहीं था। परंतु उनका नेता राजनिष्ठ सूरतसिंह आगे आया और उसने खजाने से एक दमड़ी भी बाहर न जाने देने की पक्की व्यवस्था अपने जात भाइयों को वहां से हटाकर की। और जल्दी ही वह खजाना यूरोपियन सेना को सुरक्षित सौंप दिया गया। इसी समय एक बड़ पंडित गोकुलचंद भी अंग्रेजों के पक्ष में मिल गया था और स्वयं बनारस के राजा ने भी अपनी शक्ति, सारी संपत्ति, सारे अधिकार सबकुछ अपने प्रभु के –काशी विश्वनाथ नहीं अपितु अंग्रेज के चरणों में अर्पित कर दिए। सिपाही तोपों के सामने भी न झुकते हुए लड़ते-लड़ते अंग्रेजों की मार से बाहर सारे प्रांत में फैल गए। अंग्रेज लोगों ने जॉन लॉरेंस की पंजाबी युक्ति अपनाकर बनारस शहर का विद्रोह गर्भावस्था में ही मसल दिया, यह बात सच थी; परंतु इस मसल डालने के समाचार से अधिक बनारस में विद्रोह हुआ, यह समाचार सारे हिंदुस्तान में बिजली-सा फैला और बनारस से संकेत प्राप्त करने आंखे गड़ाए बैठे उस प्रांत के सारे क्रांति केंद्रों ने विद्रोह का धूम-धड़ाका शुरू कर दिया। बनारस से निकले सारे सिपाही मंजिल-दर-मंजिल बढ़ते जौनपुर आ रहे हैं, यह समाचार ज्ञात होते ही वहां के अंग्रेजों ने जौनपुर की सिख टूकड़ी को राजनिष्ठा पर व्याख्यान देना प्रारंभ किया। परंतु वह व्याख्यान समाप्त होते-न-होते बनारस के सिपाहियों की पदचाप सुनाई देने लगी। जौनपुर में जो थोड़े सिख सिपाही थे वे सब बनारस की सिख रेजिमेंट के ही थे, सो वे तत्काल विद्रोहियों से मिल गए और सारा जौनपुर शहर विद्रोही ज्वाला में जलने लगा। यह देखकर जॉइंट मजिस्ट्रेट क्यूपेज फिर से एक बार व्याख्यान देने खड़ा हो गया। परंतु तभी तालियों की जगह एक गोली सूं ऽ ऽ ऽ करते हुए श्रोताओं में से बाहर आई और मजिस्ट्रेट साहब की मृत देह गिर पड़ी। कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट 'मारा' भी गोली लगकर गिरा। यह देखते ही विद्रोहियों ने खजाने पर हमला किया और यूरोपियनों को जौनपुर छोड़ देने का आदेश दिया। अब तक बनारस के घुड़सवार भी शहर में घुस गए थे। यूरोपियन दिख जाए तो उसे जीवित नहीं छोड़ना है, ऐसी कठोर प्रतिज्ञा उन्होंने की थी। एक बूढ़ा डिप्टी कलेक्टर भागता दिखा-घुड़सवार दौड़े। जौनपुर के कुछ लोग बीच-बचाव करने लगे- 'इस गरीब को छोड़ दो, यह बहुत दयासागर है।'' सिपाहियों ने उत्तर दिया, "ऐसा कुछ नहीं, यह यूरोपियन है और इसे मरना है।''⁷¹ इस जोश से भरे माहौल में भी विद्रोहियों ने यूरोपियनों को शस्त्र नीचे रखकर चुपचाप भाग जाने की जो अनुमति दी उसका लाभ लेकर सारे अंग्रेज लोग जौनपुर खाली कर भागने लगे। उन्होंने बनारस की ओर भागने के लिए गंगा किनारे नौकाएं कीं। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 159 ⁷¹ चार्ल्स बाल कृत – 'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 245 ।