१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवायव्य प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर का दामाद डॉ. 'हे' भी था। बरेली के सरकारी कॉलेज का प्रिंसिपल डॉ. कर्सन भी था। बरेली का जिला मजिस्ट्रेट भी था। एक दिन पूर्व ही राजनिष्ठ खानबहादुर खान इसके गले में गलबहियां डालकर बैठे थे। आज ये सिंहासन पर और वह अपरधी के पिंजरे में था। ज्यूरी की शपथ लेकर रीति अनुसार न्यायासन पर बैठे। अलग-अलग आरोप अलग-अलग अपराधियों पर लगातार उन्हें फांसी का दंड सुनाया गया और उन छह यूरोपियन लोगों को तुरंत फांसी पर चढ़ा दिया गया। तुरंत ही खानबहादुर के आदेश से एक विज्ञापन छापा गया कि यूरोपियन कमिश्नर भाग गया है। उसे जो पकड़कर लाएगा या उसका सिर काट लाएगा, उसे एक हजार रूपए का पुरस्कार सरकार के खजाने से दिया जाएगा। इस तरह यूरोपियन रक्त और मांस से अपना सिंहासन पक्का जमाने के बाद खानबहादुर ने सारा रूहैलखंड स्वतंत्र होने का समाचार दिल्ली भेजा। उस दिन विद्रोह ग्यारह बजे आरंभ हुआ और शाम को सूर्यास्त के पूर्व सारा प्रांत स्वतंत्र हो जाने की घोषणा दिल्ली की ओर चल दी। वह सारा प्रांत स्वतंत्र हो जाने की घोषणा केवल शाब्दिक थी, ऐसा भी नहीं है। उधर बरेली में विद्रोह की तोपें अपनी गड़गड़ाहट से अंग्रेजी सत्ता को कंपा रही थीं, इधर शाहजहांपुर में भी गोरे रक्त का छिड़काव होने लगा था। बरेली से शाहजहां लगभग चालीस मील की दूरी पर है। वहां 28वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट थी। मेरठ की खबर शाहजहांपुर 14 मई को पहुंची। परंतु अंग्रेज अधिकारियों को पता चल जाए, ऐसा एक भी खुला कृत्य न होने से 31 मई का दिन भी अन्य दिनों की तरह बड़ी शांति, संतोष और उल्लास में उदय हुआ। वह रविवार का दिन था। सारे अंग्रेज चर्च में भी गए। उनकी प्रार्थना अभी आधी ही थी कि चर्च की ओर सिपाही तीव्रता से दौड़ते हुए आने लगे। उस चर्च का चैप्लेन बाहर आया तो उसका हाथ सिपाहियों ने उड़ा दिया और विद्रोह की शुरूआत हो गई। शहर का मजिस्ट्रेट रिफेट्स भागते हुए मारा गया। सर बाडोर को चर्च के अंदर ही कुचल दिया गया। चर्च पर आक्रमण करने एक टोली इधर आई,तभी दूसरी एक टोनी कैंटोनमेंट में यूरोपियनों को मारने के लिए भेजी गई थी। उसने उधर आग लगाने और लूटने का काम चालू कर दिया था। असिस्टेंट मजिस्ट्रेट जान बचाने भागा तो बरामदे में ही काट डाला गया। सिपाहियों से दो बातें कहने का प्रयास डॉ. बाउलिंग ने किया और सिपाही भी उसकी बात सुनने लगे; परंतु दुर्भाग्य, उसने उनको 'राजद्रोही' कह दिया। उसके मुंह से यह शब्द निकलना था कि एक गोली सनसनाती हुई आई औ वह चल बसा। चर्च की ओर जो विद्रोही गए थे वे केवल तलवारें और लाठियां लेकर गए थे, इसलिए वे बंदूकें लेने लाइनों की तरफ आए। इसी बीच सिख सिपाही और बावरची आदि नौकरों ने कुछ अंग्रेज स्त्री-पुरूषों को पास के एक राजा के यहां पहुंचाया। पर राजा द्वारा अपनी असमर्थता व्यक्त कर उन्हें निकाल देने पर वे उघड़े बदन, नंगे पैर महमंदी की ओर निकल गए। इस तरह 31 मई की संध्या 1857 का स्वातंत्र्य समर – 149