भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 418 में से

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तक शाहजहांपुर भी स्वतंत्र हो गया। बरेली से वायव्य दिशा में लगभग अड़तालीस मील की दूरी पर मुरादाबाद जिला मुख्यालय है। वहां 29वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट और नेटिव तोपखाने की आधी बैटरी-इतनी सेना थी। मेरठ के समाचार के बाद इस सेना के मन में कितनी राजनिष्ठा है, यह देखने का एक अपूर्व अवसर आया। मरेठ के कुछ सिपाही मुरादाबाद के पास ही ठहरे हुए हैं, ऐसा समाचार अंग्रेज अधिकारियों को 18 मई को मिला तो उन्होंने उनपर रात में ही छापा मारने का आदेश उस रेजिमेंट को दिया। उस आदेश को सिर-माथे लेकर उन सिपाहियों ने उस रात मेरठ के जंगल में सो रही सेना पर बहुत जोर का आक्रमण किया। परंतु जाने क्या हुआ कि मेरठ की उस मुट्ठी भर सेना पर सोते हुए-आकस्मिक और प्रबल आक्रमण होने पर भी उसमें से एक को छोड़ सारे सैनिक जीवित भाग गए। पर सिपाही उसके लिए क्या करें? उस रात अँधियारा भी विकट था। अंग्रेज अधिकारियों ने कहा, "सिपाहियों ने कमाल का आक्रमण किया; पर अँधियारे के कारण ही शत्रु जीवित भाग सका।" अब यह ज्ञात हुआ कि मेरठ की सेना पर मुरादाबाद के सिपाहियों ने दिखावे का आक्रमण किया था। इतना ही नहीं, उस रात भागे हुए मेरठ के कुछ सिपाही मुरादाबाद के सिपाहियों की लाइन में ही आकर रहने लगे थे। परंतु अंग्रेजों का 29वीं रेजिमेंट पर उस कमाल के आक्रमण से भारी विश्वास तक कुछ भी घटित नहीं हुआ। 31 मई उदित हुई और परेड पर सिपाही पूरे अनुशासन में एकत्र होने लगे। ओदश के बिना तुम लोग यह क्या कर रहे हो? ऐसा अंग्रेज अधिकारी जो पूछने लगे तो सिपाहियों ने उन्हें आदेश दिया कि "कंपनी का राज समाप्त हो गया है, अतः आप प्रदेश छोड़कर भाग जाएं, नही ं तो आपको कत्ल कर दिया जाएगा। तुरंत नहीं जा सकते तो दो घंटे की मोहलत दी जा सकती है। परंतु उतनी देर में मुरादाबाद खाली करना होगा।" सैनिकों के इस ओदश के साथ ही मुरादाबाद की पुलिस ने भी अब अंग्रेजों के आदेशों का पालन न करने की घोषण की और शहर के नागरिकों ने भी उससे सहमति जताई। एक ही समय तीनों ओर से चेतावनी मिलते ही मुरादाबाद के जज साहब, कलेक्टर साहब, मजिस्ट्रेट साहब, सर्जन साहब और अन्य सारे साहब अपने बाल-बच्चें लेकर एक पल भी विलंब न करते हुए मुरादाबाद में दिखे उन्हें काट डाला गया। मि. पॉवेल आदि कुछ लोगों ने इस्लाम धर्म अपनाया और अपने प्राण बचाए। सैनिकों ने खजाने पर कब्जा किया। सारी सरकारी संपत्ति पर भी कब्जा किया गया और मुरादाबाद पर 31 मई की शाम से पूर्व ही हरा झंडा लहराने लगा। 66 1857 का स्वातंत्र्य समर - 150 66 चार्ल्स बाल, भाग 1 ।

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