१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
तक शाहजहांपुर भी स्वतंत्र हो गया। बरेली से वायव्य दिशा में लगभग अड़तालीस मील की दूरी पर मुरादाबाद जिला मुख्यालय है। वहां 29वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट और नेटिव तोपखाने की आधी बैटरी-इतनी सेना थी। मेरठ के समाचार के बाद इस सेना के मन में कितनी राजनिष्ठा है, यह देखने का एक अपूर्व अवसर आया। मरेठ के कुछ सिपाही मुरादाबाद के पास ही ठहरे हुए हैं, ऐसा समाचार अंग्रेज अधिकारियों को 18 मई को मिला तो उन्होंने उनपर रात में ही छापा मारने का आदेश उस रेजिमेंट को दिया। उस आदेश को सिर-माथे लेकर उन सिपाहियों ने उस रात मेरठ के जंगल में सो रही सेना पर बहुत जोर का आक्रमण किया। परंतु जाने क्या हुआ कि मेरठ की उस मुट्ठी भर सेना पर सोते हुए-आकस्मिक और प्रबल आक्रमण होने पर भी उसमें से एक को छोड़ सारे सैनिक जीवित भाग गए। पर सिपाही उसके लिए क्या करें? उस रात अँधियारा भी विकट था। अंग्रेज अधिकारियों ने कहा, "सिपाहियों ने कमाल का आक्रमण किया; पर अँधियारे के कारण ही शत्रु जीवित भाग सका।" अब यह ज्ञात हुआ कि मेरठ की सेना पर मुरादाबाद के सिपाहियों ने दिखावे का आक्रमण किया था। इतना ही नहीं, उस रात भागे हुए मेरठ के कुछ सिपाही मुरादाबाद के सिपाहियों की लाइन में ही आकर रहने लगे थे। परंतु अंग्रेजों का 29वीं रेजिमेंट पर उस कमाल के आक्रमण से भारी विश्वास तक कुछ भी घटित नहीं हुआ। 31 मई उदित हुई और परेड पर सिपाही पूरे अनुशासन में एकत्र होने लगे। ओदश के बिना तुम लोग यह क्या कर रहे हो? ऐसा अंग्रेज अधिकारी जो पूछने लगे तो सिपाहियों ने उन्हें आदेश दिया कि "कंपनी का राज समाप्त हो गया है, अतः आप प्रदेश छोड़कर भाग जाएं, नही ं तो आपको कत्ल कर दिया जाएगा। तुरंत नहीं जा सकते तो दो घंटे की मोहलत दी जा सकती है। परंतु उतनी देर में मुरादाबाद खाली करना होगा।" सैनिकों के इस ओदश के साथ ही मुरादाबाद की पुलिस ने भी अब अंग्रेजों के आदेशों का पालन न करने की घोषण की और शहर के नागरिकों ने भी उससे सहमति जताई। एक ही समय तीनों ओर से चेतावनी मिलते ही मुरादाबाद के जज साहब, कलेक्टर साहब, मजिस्ट्रेट साहब, सर्जन साहब और अन्य सारे साहब अपने बाल-बच्चें लेकर एक पल भी विलंब न करते हुए मुरादाबाद में दिखे उन्हें काट डाला गया। मि. पॉवेल आदि कुछ लोगों ने इस्लाम धर्म अपनाया और अपने प्राण बचाए। सैनिकों ने खजाने पर कब्जा किया। सारी सरकारी संपत्ति पर भी कब्जा किया गया और मुरादाबाद पर 31 मई की शाम से पूर्व ही हरा झंडा लहराने लगा। 66 1857 का स्वातंत्र्य समर - 150 66 चार्ल्स बाल, भाग 1 ।
बरेली और शाहजहांपुर-इन दो शहरों के बीच बदायूं नामक जिले का मुख्यालय है। उस जिले का कलेक्टर और मजिस्ट्रेट मि. एडवर्ड्स उसी शहर में रहता था। अंग्रेजी राज के प्रारंभ से पुराने जमींदारों की दुर्दशा और लगान वसूली के लिए झटपट की जानेवाली नीलामी में हाथ से जाती हुई जमीनों से पूरे रूहेलखंड के बड़े-बड़े जमींदार और किसान बहुत त्रस्त हो गए थे। उसमें भी बदायूं में लगान पद्धति का इतना अत्याचार था कि यह जिला अंग्रेजी राज को मिटा देने के लिए किसी भी अवसर की ताक में था। यह बात स्वयं एडवर्ड्स को भी ज्ञात थी और इसलिए उसने बरेली से सेना की सहायता मांगी थी। परंतु स्वयं बरेली के उस समय क्या हाल थे, यह पहले बताया ही जा चुका है। फिर भी बरेली से यह लिखित प्राप्त हुआ कि 1 जून को हम यूरोपियन अधिकारी के अधीन सेना भेज रहे हैं। यह समाचार आते ही एडवर्ड्स बहुत खुश हुआ। वह 1 जून को बरेली के रास्ते की ओर आंखें गड़ाए बैठा रहा। उस रास्ते पर कोई सरकारी आदमी दौड़ता आ रहा है, वह भी उसे दिखने लगा। अर्थात् बरेली से आनेवाली सहायता का यह हरकारा ही है, यह मान एडवर्ड्स ने उतावली में उससे प्रश्न किए। परंतु प्रश्न के उत्तर में में बरेली से बदायूं को सेना सहायता के लिए आ रही है, यह न बताते हुए यह बताया गया कि बरेली में ही अंग्रेजी सत्ता समाप्त हो गई है। बदायूं में खजाने की सुरक्षा के लिए कुछ सिपाही रखे हुए थे। उसके अधिकारी से एडवर्ड्स ने पूछा, "बरेली सवतंत्र हो गई। बदायूं का क्या होगा? " अधिकारी ने कहा, "मेरे सिपाही राजनिष्ठ हैं। कोई डर नहीं है।" उसने उसने यह आश्वासन दिया ही था कि शाम को बदायूं में विद्रोह हो गया। खजाने के सैनिक, पुलिस और नागरिक-सबने फिरंगी राज डूब जाने की घोषणा कर दी और वह सारा जिला खानबहादुर खान के नियंत्रण में चला गया। सैनिकों ने खजाना लेकर दिल्ली की ओर कूच किया और बदायूं के रे अंग्रेज अधिकारी रात में ही जंगलों में होकर भागने लगे। खाने को अन्न नहीं, पहनने को कपड़ा नहीं-ऐसी स्थिति में छिपते-छिपते कभी-कभी किसी गांववाले के घर भैंसों के पीछे, जहां गोबर की दुर्गंध से नाक फट रही थी वहां हफ्ते-हफ्ते बिताते अंग्रेज महिलाएं, अंग्रेज कलेक्टर, मजिस्ट्रेट अपने प्राण बचाते भाग रहे थे। कुछ मारे गए, कुछ मर गए, कुछ दयालु नेटिवों के कृपाश्रय में प्राण बचाए बने रहे। इस तरह पूरा रूहेलखंड एक दिन के अंदर विद्रोह कर उठा। बरेली, शाहजहांपुर मुरादाबाद, बदायूं आदि जिलों के शहरों में स्थित सेना, पुलिस और जनता ने एक चेतावनी में ही दो घंटे के अंदर ब्रिटिश सत्ता को सीमा पर कर दिया। ब्रिटिश सिंहासन औंधा हुआ, उसपर स्वकीय सिंहासन विराजमान हुआ। ब्रिटिश झंडा उतारकर उसके स्थान पर हरे झंडे लगाए गए। ब्रिटिश कोर्ट, कार्यालयों और थानों से हिंदुस्थान पर अधिकार करनेवाला इंग्लैंड अपराधी के कठघरे में खड़ा हो गया। ऐसा यह विलक्षण 1857 का स्वातंत्र्य समर - 151
परिवर्तन सारे प्रदेश में दो घंटे में हो गया। रूहेलखंड से अंग्रेजी शासन का उन्मूलन रकने के लिए स्वदेशी रक्त की एक बूंद भी खर्च नहीं करनी पड़ी। यह कितना बड़ा आश्चर्य था। रूहेलखंड गुलाम है, यह न कहकर रूहेलखंड स्वतंत्र है, ऐसा सबने कहा और वह स्वतंत्र हुआ। सेना, सिपाही, नागरिक-सबके विद्रोह करते ही हर जिले के मुख्य शहर से दो-चार यूरोपियन अधिकारियों को निकाल देने से अधिक उस प्रदेश को स्वतंत्र करने को कुछ भी अधिक काम नहीं करना पड़ा। गुप्त कार्यक्रम , मजबूत संगठन और उसके द्वारा की गई त्वरित कौशलपूर्ण कार्यवाही-इन बातों के आधार पर अंग्रेजों के कब्जे से निकलते ही रूहेलखंड ने खानबहादुर खान का शासन स्वीकार किया। पहले बताया गया है कि यहां के सारे सैनिक बरेली के तोपखाने के सूबेदार बख्त खान की अधीनता में दिल्ली की ओर लड़ने चल दिए। उसके बाद खानबहादुर खान ने प्रदेश का बंदोबस्त रखने के लिए नई सैनिक भरती चालू की और राजधानी के अधिकतर पहले के लोग ही रखे गए और वरिष्ठ स्थानों पर नए स्वदेशी अधिकारियों की नियुक्ति की गई। सरकारी पैसा दिल्ली के बादशाह के नाम पर वसूल किया जाने लगा। न्याय देने के लिए पहले जैसे ही कोर्ट खोले गए और पहले के ही नौकर नियुक्त कर दिए गए, संक्षेप में, जहां यूरोपियन अधिकारी होते थे वहां हिंदुस्थानी नियुक्त करने के सिवाय किसी भी विभाग में राज्य क्रांति के धक्के से अन्य तरह का परिवर्तन नहीं हुआ। खानबहादुर खान ने अपने सूबे की यह सारी जानकारी दिल्ली के बादशाह को लिखकर भेज दी और रूहेलखंड में निम्नलिखित राजकीय घोषणापत्र लगाया गया। “हिंदुस्थान देश के वासियों! स्वराज्य-प्राप्ति का दुर्लभ अवसर तुम्हें प्राप्त हो गया है। उसको स्वीकार करोगे या अनादर? इस अपूर्व और असाधारण अवसर का तुम लाभ लोगे या उसे हाथ से फिसल जाने दोगे? हिंदू बंधुओं और मुसलमान भाइयों! यह ध्यान में रखना कि यदि अपने हिंदुस्थान देश में इन अंग्रेजों को तुमने रहने दिया तो ये तुम्हारे देश का सत्यानाश और तुम्हारे धर्म का विनाश किए बिना कभी भी रहनेवाले नहीं हैं।67 अंग्रेजों के फरेब के कारण आज तक हिंदुस्थान के निवासियों ने अपनी गरदन अपनी ही तलवार से काटी है। अतः वह गृह-क्लेश की गलती हमें अब ठीक कर लेनी चाहिए। मुसलमानों से लड़ने की सलाह हिंदुओं को देना और हिंदुओं के विरूद्ध चलने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 152 67 हिंदू एवं मुस्लिम बंधुओं, भलीभांति समझ लो कि यदि तुमने अंग्रेजों को हिंदुस्थान में रहने दिया तो वे निश्चित रूप से तुम्हारा धर्म भ्रष्ट करेंगे और तुम्हारा नरमेध भी होगा। ˙ ˙ ˙ अंग्रेज अब भी हमारे साथ कुटिलता की नीति का ही पालन करेंगे। वे हिंदू को मुसलमान के विरूद्ध उभारने में कदापि नहीं चूकेंगे। '” -द दफ्तर ऑफ खानबहादुर खान, ट्रांसलेटेड बाइ क्रासॉफ्ट विल्सन
की बात मुसलमानों को कहना-इस कपट नाटक का प्रयोग अंग्रेज लोग अब भी करना चाहेंगे। परंतु हिंदू बंधुओं, आप उनके जाल में मत फंसना। चतुर हिंदू बंधुओं से यह कहना आवश्यक नहीं कि अंग्रेज लोग अपने वचन का कभी भी पालन नहीं करते। झूठी-सच्ची बातें कहकर बहलाने में वे उस्ताद हैं। वे पृथ्वी से अन्य धर्मियों का नाश करने के लिए आज तक प्रयास करते रहे। उन्होंने दत्तक संतान के अधिकार छीने, देशी राजाओं के प्रदेश और राज्य उन्होंने डुबो दिया। हिंदू और मुसलमान दोनों को ही उन्होंने पैरों तले कुचला। मुसलमान भाइयों, तुम्हें कुरान की परवाह हो और हिंदुओं, आपको गो माता की चिंता हो तो अब आपस के भेदभाव भूलकर इस जिहाद में सब लोग सम्मिलित हो जाओ। एक झंडे के नीचे लड़ते-लड़ते मैदान में कूद पड़ो और हिंदुस्थान से अंग्रेजों का नाम रक्त के प्रवाह से धो डालो। हिंदुस्थान से फिरंगियों को नष्ट करने के लिए यदि हिंदू लोग मुसलमानों के साथ लड़ेंगे, यदि स्वदेश की मुक्ति के लिए वे रणांगण बनाएंगे तो उनके देशाभिमान के इनाम-स्वरूप गो माता का वध बंद किया जाएगा। इस धर्मयुद्ध में जो स्वयं लड़ेगा या दूसरों को लड़ने के लिए द्रव्य सहायता करेगा, वह ऐहिक और पारमार्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करेगा। परंतु यदि कोई इस स्वदेश युद्ध के विरूद्ध जाएगा तो ˙ ˙ ˙तो वह स्वयं के सिर पर आघात करके आत्महत्या का अपराधी होगा। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 153
प्रकरण-7 बनारस और इलाहाबाद कलकत्ता से लगभग चार सौ साठ मील दूर श्री जाह्नवी के किनारे बनारस शहर अपने पुरातन वैभव के साथ बसा हुआ है। भागीरथी के पवित्र, शीतल और धवल जल में प्रतिबिंबित होने का महद्भाग्य जिन शहरों को है, बनारस उन सब शहरों की पटरानी लगता है। गंगा के घाट से एक पर एक चढ़ती भुवनराजि, उनके मस्तकों पर सुवर्ण मुकुटों-से चमकते ऊंचे-ऊंचे मंदिरों के कलश, उनपर चंवर जैसे डोलते फल-पुष्पों से भरे घने वृक्ष, भिन्न-भिन्न दिवालयों में बजते हजारों घंटों के अलग-अलग स्वर एक-दूसरे से मिलकर उनसे उत्पन्न होनेवाली कर्ण-मधुर एक तान और सारी सुंदरता पर स्थापित श्री काशी विश्वेश्वर के अधिष्ठान आदि से बनारस शहर को अनन्य शोभा प्राप्त हुई है। आसक्ति के लिए भोग-विलासाकांक्षी, भक्ति क्षेत्र में अपने-अपने साध्य की सिद्धि पाते हैं। जग में वैभव का उपभोग कर पूर्णकाम हुए लोगों का काशी क्षेत्र वानप्रस्थाश्रम यर संन्यासाश्रम है। इस जग में सारी आस और उपभोग दुष्ट दुर्जनों के मत्सर या दीप्ति के कारण छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। ऐसे भाग्यहीन और वैभवविहीन लोगों का काशी क्षेत्र और वहां की भी भागीरथी का प्रसन्न जल-तुषार-श्रम-परिहारक शांति भवन हैं। ऐसे इस शांति भवन में अपना श्रम-परिहरण करने के लिए आनेवाले भाग्यहीन लोगों की सन् 1857 में अंग्रेजों की कृपा से बिलकुल कमी नहीं थी। दिल्ली की अमीरी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 154
बंद होने से अशरण हुए कितने की राजपुत्र और अन्य कितने ही मुसलमान, सिख और मराठों के नष्ट-वैभव हुए राजकुल उस बनारस शहर में अपने दुःखों की कहानी मंदिर-मंदिर और मस्जिद-मस्जिद में कहने बैठे हुए हैं। ऐसे इस शहर में हिंदुस्थान में चल रही स्वधर्म की दुर्दशा और स्वराज्य का नाश आदि पर चर्चा हिंदू और मुसलमानों में विशेष जोर-शोर से चले, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। बनारस से कुछ ही दूरी पर स्थित सिक्रोली गांव में उस प्रदेश के लश्कर की छावनी थी। वहां नेटिव पैदलों की 37वीं रेजिमेंट, लुधियानवी सिख रेजिमेंट और एक घुड़सवार पलटन भी रखी हुई थी। वहां का तोपखाना अवश्य रूप से स्वराज्य और स्वधर्म के लिए विद्रोह करने की लालसा गुप्त रीति से उत्पन्न हुई थी। जैसे-जैसे सन् 1857 का साल करीब आने लगा वैसे-वैसे बनारस के लोक-समुदाय में विलक्षण खलबली मचने के चिह्न स्पष्ट होने लगे। उस शहर का मुख्य ममिश्नर टक्कर, जज म्यूबिन, मजिस्ट्रेट लिंड आदि स्थानीय अधिकारियों और कैप्टन ओलफर्ट, कर्नल गॉर्डन आदि लश्करी गोरे अधिकारियों ने पहले से ही बनारस में रह रहे अंग्रेज लोगों के संरक्षण की बहुत व्यवस्था की हुई थी; क्योंकि उस शहर में लोक-क्षोभ-कभी-कभी गोपनीयता की सामा के बाहर फूटने से-का जोर रोकना कठिन हो जाता। पुरबिया लोग 'हे रामजी! इन फिरंगियों की गुलामी से मुक्त करो' कहते हुए खुलेआम मंदिरों में प्रार्थना करने लगे। ⁶⁸ अन्य स्थानों की तैयारी कितनी क्या हुई, इसकी पक्की जानकारी ज्ञात करने हेतु समितियां स्थापित की गई। मई माह आते ही सैनिक छावनियों में मुसलमान मौलवियों का जमघट बढ़ गया। शहर की दीवारों पर और सार्वजानिक चौतरों पर लोक-शक्ति प्रचंड विद्रोह करे, इस हेतु घोषणाएं जिय और फिरंगियों का नाश हो, इस हेतु सार्वजनिक प्रार्थना करने लगे। उसी समय बाजार में अनाज के भाव बहुत अधिक बढ़ने लगे। भाव इतने अधिक बढ़ गए तो अनाज व्यापारियों की ही अंतिम हानि कैसे है, यह अर्थशास्त्रीय सिद्धांतज ब बाजार में घूमकर अंग्रेज अधिकारियों ने समझाना चालू किया तब लोग उनसे मुंह पर ही पूछने लगे कि हमारे देश में मंहगाई कर अब हमें ही उपदेश देने क्यों तैयार हुए हो? बनारस शहर में इस लोक-क्षोभ का विशाल रूप देखकर अंग्रेजों को इतना डर हो गया कि विद्रोह होने से पहले ही बनारस छोड़कर जाने का आग्रह स्वयं ओलफर्ट और कैप्टन वॉटसन करने लगे। अंत में म्यूबिन ने बेचैन होकर उनसे कहा, I will go on my knees to you not to leave Beneares!' (बनारस न छोड़ें, मैं आपके पांव पड़ता हूं।) इस पैर पकड़ने के प्रभाव से बनारस छोड़कर जाने का विचार तात्कालिक रूप से रद्द कर दिया गया-और वह क्यों न किया जाता। कारण, बनारस के सिख स्वयंसेवकों की टोलियां 1857 का स्वातंत्र्य समर – 155 ⁶⁸ 1. "रिपोर्ट ऑफ द जॉदंट मजिस्ट्रेट', मि, टेलर। 2. रेड पैफलेट, पृष्ठ 55।
बना ली गई थी। वारेन हेस्टिंग्स के लतियाए चेतसिंह का वंशज भी क्या आज अंग्रेजों की ओर नहीं जा मिला था! इतनी राजनिष्ठा कायम होने पर अंग्रेजों के लिए बनारस छोड़कर जाने का कोई कारण ही नहीं था। परंतु इस राजनिष्ठा पर सवार होकर अंग्रेज लोग बनारस में अपना आसन अटल करने की बात सोच ही रहे थे कि पड़ोस के आजमगढ़ से भयंकर गर्जना सुनाई देने लगी। आजमगढ़ बनारस से लगभग साठ मील दूर बसा था। वहां 17वीं देशी रेजिमेंट रखी हुई थी। इस रेजिमेंट में 31 मई से रोज भयानक खलबली मचने लगी। उसे शांत करने के लिए वहां का मजिस्ट्रेट मि. हार्न रोज सैनिकों को व्याख्यान देने लगा। पर ऐसे व्याख्यानों से दिल बहलने के दिन अब नहीं रहे थें 31 मई उदय हुई । उस प्रांत के सिपाहियों ने विद्रोह की सूचना देने के लिए बनारस में बैरकों को ही आग लगा दी। अतः जून के पहले हफ्ते में विद्रोह हो जाना है। आज 3 जून है। यह मुहूर्त कोई बुरा नहीं है; क्योंकि गोपालपुर में आ रहे खजाने में आजमगढ़ का खजाना मिलाकर 7 लाख रुपयों का खजाना बनारस की ओर जा रहा है। इससे उत्तम मुहूर्त कौन सा होगा। तारीख 3 जून क संध्या काल की प्रभा रात्रि में विलीन हो रही थी। सारे गोरे सैनिक अधिकारी अपने क्लब में इकट्ठा होकर खाना खा रहे थे और उनके बाल-बच्चें वहीं हंस-खेल रहे थे। इतने में धूम-धड़ाके का क्या अर्थ होता है, यह जून के पहले हफ्ते में अंग्रेजों को जुबानी याद था। उनकी भयभीत शांति ‘विद्रोह हुआ’, ऐसा एक-दूसरे को कहने लगी। तभी नगाड़ों और दुंदुभि की ध्वनि शुरू हो गई। एक क्षण भी नहीं गया और जिनके हृदय में मेरठ की स्मृतियां ताजा थीं वे गोरे लोग सिर पर पैर रखकर भागने लगे। औरतें-बच्चे, अधिकारी-सबने प्राणों की आशा छोड़ दी। पर आजमगढ़ के सैनिकों ने इस तरह मरे हुए-से लोगों को देखकर अधिक प्रतिशोध लेने का विचार छोड़ दिया था। उन्होंने उन गोरे लोगों को जीवित रखने के लिए अपने कब्जे में ले लिया और आजमगढ़ छोड़कर तुरंत चले जाने को कहा। परंतु कुछ भीमकाय सैनिकों ने अंग्रेजी रक्त चखने की भीषण प्रतिज्ञा की हुई थी, उनकी उस भीष्म प्रतिज्ञा का क्या हो?⁶⁹ तो लेप्टिनेंट ने हचिंसन साहब और क्वार्टर सार्जेंट लुई साहब, कम-से-कम तुम्हारे शरीर में तो ये हमारी गोलियां घुसनी ही चाहिए। बस, अब शेष चाहें तो भाग जाएं। वे दौड़कर नहीं जा सकते हों तो गाड़ियों में बैठकर आजमगढ़ छोड़ दें। फिर भी, हमें कुछ कहना नहीं है। पर यूरोपियन अधिकारी और उनकी पत्नियां कहने लगीं-‘पर हमें अब गाड़ियां भी कौन देगा?’ सैनिकों ने कहा, ‘‘उसकी चिंता न करें। हम देते हैं गाड़ियां।’’ ऐसी विलक्षण उदारता देख कर्ण भी सिर नवाए, इसमें कोई शंका नहीं। सैनिकों ने स्वयं गाड़ियां मंगवाई और उसमें उन कैदी अंग्रेजों को मुक्त कर बैठाया। साथ में कुछ संरक्षक सैनिक भी दिए और आजमगढ़ की अंग्रेजी सत्ता के नाम-निशान के साथ वे सारे बनारस की ओर चल दिए। उध रवह 7 लाख का खजाना, अंग्रेज सैनिकों का तोपखाना, अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 156 ⁶⁹ सर कॉलिंग कैंपबल कृत-‘नैरेटिव्स’, पृष्ठ 38।
सत्ता की मुहर जिसपर थी वह जेल, कार्यालय, रास्ते, बैरकें-सब पर जो सैनिकों ने अधिकार किया उसकी अगुवाई किसने की? विद्रोह का समाचार मिलने पर यदि सैनिक विद्रोह कर ही दें तो अपनी सुरक्षा हो सके, इसलिए जिन अति विश्वसनीय सिपाहियों को अंग्रेजों ने नियुक्त किया था, उन सिपाहियों ने। यह पुलिस विभाग भी सेना की तरह अंदर से खोखली सुरंग थी। संकेत मिलते ही उन्होंने यूरोपियन घरों और कारागृह पर स्वराज्य का निशान लगाना प्रारंभ किया। बनारस की ओर जाती गाड़िया में जिन्हें जगह न मिली, ऐसे कितने ही अंग्रेज गाजीपुर की ओर भाग गए और दूसरे दिन का सूर्य अपनी अनुपस्थिति की अल्पावधि में हुए इस विलक्षण रूपांतर की ओर साश्चर्य देखते-देखते आजमगढ़ पर फहराते हरे निशान को प्रकाशित करने लगा।⁷⁰ जो हृदय में डोल रहा था वहीं हिंदुस्थान का हरा निशान आज अपने सिर पर भी मंडरा रहा है, यह देखकर विजयी रंग में रंगे सारे सैनिकों ने एक बड़ा भारी सैनिक जलूस निकाला और लश्करी बैंड के ताल-सुर पर अपना हरा निशान लहराते हुए वे फैजाबाद की ओर चले गए। आजमगढ़ स्वतंत्र होने का समाचार बनारस पहुंचते ही उस शहर की हलचलों से अंग्रेजों में उत्पन्न हुए भय का निराकरण होने के संकेत दिखने लगे। मेरठ के विद्रोह का समाचार सुनकर पंजाब से जॉन लॉरेंस और कलकत्ता से लॉर्ड केनिंग यूरोपियन सेना को विद्रोह के मुख्य स्थान की ओर भेजने के लिए अश्रांत श्रम कर रहे थें उत्तर की ओर से भेजी गई गोरी सेना दिल्ली को घेरकर बैईी होने से दिल्ली को घेरकर बैठी होने से दिल्ली के निचले हिस्से में सभी ओर असहायता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी और अंग्रेज अधिकारी कलकत्ता को-कृपा करके यहां यूरोपियन भेजो ,(For God sake send us Europeans), यह मांग बिलकुल रोते हुए कर रहे थे। इस समय लॉर्ड केनिंग ने मद्रास, बंबई तथा रंगून से यूरोपियन सेना कैसे मंगाई और चीन पर होनेवाली चढ़ाई रदद क रवह सारी सेना हिंदुस्थान में ही कैसे रोककर रखी, इसका वर्णन पहले आ चुका हैं उस जगह-जगह से मंगाई गई यूरोपियन`सेना में से मद्रास के फ्युसिलियर के साथ जनरल नील इस समय बनारस तक आ पहुंचा था। यूरोपियन सेना की यह पहली कुमुक और वह भी जनरल नील जैसे बहादुर, साहसी और कठोर सेनापति के अधीन आ जाने से बनारस के अंग्रेजों में बहुत धीरज आ गया। इसी समय दानापुर की अंग्रेजी सेना भी बनारस आ गई। बनारस के लोगों की विलक्षण बेचैनी और वहां के सिपाहियों का शहर के लोगों से सहयोग होने के स्पष्ट प्रमाणों आदि की जानकारी के आधार पर वहां के अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह को उसके गर्भाशय में ही मसल डालने का निश्चय किया। जनरल नील की यूरोपियन सेना और बनारस के सिख सरदार और सिख सिपाहियों एवं तोपखाने की सहायता से विद्रोह को मसल डालने की योजना सहज ही सिद्ध हो जायेगी, इसका अधिकारियों को पहले से ही पूरा भरोसा था। आजमगढ़ का समाचार 4 तारीख को बनारस में पहुंचते ही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 157 ⁷⁰ 'नैरेटिव्स' में सर कॉलिन कैंपबल ने लिखा है- “The green flag was mastered on the right of the 3ʳᵈ.”
बनारस के नेटिव सिपाही विद्रोह करें, इसके पहले ही उन्हें निःशस्त्र कर दिए जाने का निश्चय बहुत चर्चा के बाद हुआ और उस दिन दोपहर को जनरल परेड का आदेश दिया गया। यह आदेश सुनते ही आगे क्या होगा, सिपाहियों को स्पष्ट दिखने लगा। अंग्रेज तोपखाना तैयार करके लाए हुए हैं, यह गुप्त समाचार भी उन्हें मिल गया था। परेड के मैदान पर अंग्रेज अधिकारी शस्त्र नीचे रखने का आदेश देकर हमें निःशस्त्र कर तोपों से उड़ा देनेवाले हैं, यह उन्हें स्पष्ट दिख गया और इसलिए शस्त्र नीचे रखना छोड़ उन्होंने समीप के शस्त्रागार पर ही हल्ला बोल दिया और कर्कश गर्जना करते हुए वे अंग्रेज अधिकारियों पर ही टूट पड़े। उनपर दबाव बनाए रखने के लिए मंगाई गई सिख रेजिमेंट भी वहां आ गई। उन सिख सिपाहियों में राजनिष्ठा का उफान इतने जोरों पर था कि वे हिंदुस्थानी सैनिक ने हमला किया और कमांडर न्युइस तत्काल मर गया। उसके स्थान पर ब्रिगेडियर जनरल हडसन अभी आ भी न पाया था कि तभी एक सिख सिपाही को जोश आया और उसने उसे गोली मार दी। परंतु यह अक्षम्य अपराध सहन न होने से उसके पास खड़े एक सिख सिपाही ने अंग्रेज को मारना चाहनेवाले सिख को तत्काल काट डाला। इस राजनिष्ठा के कृत्य को क्या पुरस्कार मिलता है, यह देखने के लिए दूसरे सिख उत्सुक थे-तभी उन सब पर अंग्रेजी तोपखाना बरसने लगा। सिख सिपाहियों में हिंदुस्थानी सिपाहियों द्वारा मचाई घालमेल देखकर सिख रेजिमेंट ही विद्रोही हो गई है-ऐसी गलतफहमी अंग्रेज अधिकारियों को होने पर उन्होंने हिंदुस्थानी रेजिमेंट के साथ सिख रेजिमेंट पर भी गोलीबारी करनी शुरू कर दी। अब उन अभागे सिखों को विद्रोहियों से मिल जाने के सिवाय दूसरा रास्ता ही नहीं बचा। उन सब भारतीय लोगों ने मिलकर अंग्रेजी तोपखाने परतीन हमले किए। हिंदू मुसलमान और सिख मिलकर अंग्रेजी तोपों पर टूटे पड़ रहे हैं-सन् 1857 के इतिहास में ऐसा अकेला अवसर यही था। प्रसन्नता की बात यह कि इस अवसर पर हो रहे पाप का शमन करने के लिए उसी समय बनारस शहर में सिख लोग अश्रांत प्रयास कर रहे थे। क्योंकि सिपाहियों और अंग्रेजों की जब बैरकों की ओर लड़ाई हो रही थी तब शहर के लोग भी विद्रोह करेंगे, इस डर से अंग्रेज अधिकारी, उनके बाल-बच्चे सारे रास्तों पर भाग रहे थे, उस समय उन्हें आश्रय देने के लिए सिख सरदार सूरतसिंह आगे आया। बनारस के खजाने में लाखों रूपया जमा था और उसी में सिख लोगों की भूतपूर्व पटरानी से अंग्रेजों के छीने हुए बहुत मूल्यवान रत्नालंकार भी भरे हुए थे और उस खजाने पर सिखों का कड़ा पहरा था। अर्थात् यह खजाना अपने कब्जे में लेकर, सीमा पर की हुई अपनी रानी के अलंकार वापस लेने की अनिवार्य इच्छा सिखों के मन में 1857 का स्वातंत्र्य समर - 158
उत्पन्न होना अस्वाभाविक नहीं था। परंतु उनका नेता राजनिष्ठ सूरतसिंह आगे आया और उसने खजाने से एक दमड़ी भी बाहर न जाने देने की पक्की व्यवस्था अपने जात भाइयों को वहां से हटाकर की। और जल्दी ही वह खजाना यूरोपियन सेना को सुरक्षित सौंप दिया गया। इसी समय एक बड़ पंडित गोकुलचंद भी अंग्रेजों के पक्ष में मिल गया था और स्वयं बनारस के राजा ने भी अपनी शक्ति, सारी संपत्ति, सारे अधिकार सबकुछ अपने प्रभु के –काशी विश्वनाथ नहीं अपितु अंग्रेज के चरणों में अर्पित कर दिए। सिपाही तोपों के सामने भी न झुकते हुए लड़ते-लड़ते अंग्रेजों की मार से बाहर सारे प्रांत में फैल गए। अंग्रेज लोगों ने जॉन लॉरेंस की पंजाबी युक्ति अपनाकर बनारस शहर का विद्रोह गर्भावस्था में ही मसल दिया, यह बात सच थी; परंतु इस मसल डालने के समाचार से अधिक बनारस में विद्रोह हुआ, यह समाचार सारे हिंदुस्तान में बिजली-सा फैला और बनारस से संकेत प्राप्त करने आंखे गड़ाए बैठे उस प्रांत के सारे क्रांति केंद्रों ने विद्रोह का धूम-धड़ाका शुरू कर दिया। बनारस से निकले सारे सिपाही मंजिल-दर-मंजिल बढ़ते जौनपुर आ रहे हैं, यह समाचार ज्ञात होते ही वहां के अंग्रेजों ने जौनपुर की सिख टूकड़ी को राजनिष्ठा पर व्याख्यान देना प्रारंभ किया। परंतु वह व्याख्यान समाप्त होते-न-होते बनारस के सिपाहियों की पदचाप सुनाई देने लगी। जौनपुर में जो थोड़े सिख सिपाही थे वे सब बनारस की सिख रेजिमेंट के ही थे, सो वे तत्काल विद्रोहियों से मिल गए और सारा जौनपुर शहर विद्रोही ज्वाला में जलने लगा। यह देखकर जॉइंट मजिस्ट्रेट क्यूपेज फिर से एक बार व्याख्यान देने खड़ा हो गया। परंतु तभी तालियों की जगह एक गोली सूं ऽ ऽ ऽ करते हुए श्रोताओं में से बाहर आई और मजिस्ट्रेट साहब की मृत देह गिर पड़ी। कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट 'मारा' भी गोली लगकर गिरा। यह देखते ही विद्रोहियों ने खजाने पर हमला किया और यूरोपियनों को जौनपुर छोड़ देने का आदेश दिया। अब तक बनारस के घुड़सवार भी शहर में घुस गए थे। यूरोपियन दिख जाए तो उसे जीवित नहीं छोड़ना है, ऐसी कठोर प्रतिज्ञा उन्होंने की थी। एक बूढ़ा डिप्टी कलेक्टर भागता दिखा-घुड़सवार दौड़े। जौनपुर के कुछ लोग बीच-बचाव करने लगे- 'इस गरीब को छोड़ दो, यह बहुत दयासागर है।'' सिपाहियों ने उत्तर दिया, "ऐसा कुछ नहीं, यह यूरोपियन है और इसे मरना है।''⁷¹ इस जोश से भरे माहौल में भी विद्रोहियों ने यूरोपियनों को शस्त्र नीचे रखकर चुपचाप भाग जाने की जो अनुमति दी उसका लाभ लेकर सारे अंग्रेज लोग जौनपुर खाली कर भागने लगे। उन्होंने बनारस की ओर भागने के लिए गंगा किनारे नौकाएं कीं। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 159 ⁷¹ चार्ल्स बाल कृत – 'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 245 ।
परंतु आधे प्रवाह में आने के बाद मल्लाहों ने उन सब अंग्रेजों को लूटकर रेत पर ले जाकर छोड़ दिया। इधर जौनपुर में 'दीन-दीन' का नारा लगा सारा शहर सड़कों पर आ गया। उन्होंने सारे यूरोपियन घरों को लूटकर जलाकर नष्ट किया। अंग्रेजी शासन की, उनके बहते रक्त के सिवाय, सारी पहचान धूल में मिला दी और जितना हो सके उतना खजाना लेकर सिपाही अवध की ओर बढ़ने लगे। बाद में शहर की वृद्ध महिलाएं और जीवन में दमड़ी भी जिसने नहीं देखी उन कंगालों को यह खजाना दिया गया, जिसपर उन्होंने जमकर स्वराज्य और दिल्ली के बादशाह का मन से आभार व्यक्त किया। इस तरह 3 जून को आजमगढ़, 4 जून को बनारस और 5 जून को जौनपुर के उठते ही बनारस का सारा प्रांत क्रांति-ज्वाला में जोर नहीं रहता। परंतु राजधानी के ऊपर राज्य क्रांति जैसे अनिश्चित अवसर पर अवलंबित रहना क्रांतिशास्त्र में बहुत नाशकारी दोष माना जाता है। मैजिनी कहता है-‘'जहां हमारा निशान लहराए वहीं हमारी राजधानी। अपनी राजधानी जिधर विद्रोह हो उधर ले जानी चाहिए। विद्रोह राजधानी के पीछे रहे, यह अच्छी बात नहीं।‘’ राज्य क्रांति के नक्शे पहले कितने भी सोच-विचारकर बनाए हुए हों-बिलकुल वैसे ही घटनाएं घटित होना असंभव होता है। इसलिए चाहे राजधानी में क्रांति दुर्बल पड़ जाए, पर प्रांत को उसे छोड़ नहीं देना चाहिए। इस नियम का पालन बनारस प्रांत में बहुत मजबूती से हुआ, इसमें कोई शंका नहीं देना चाहिए। क्योंकि उस प्रांत की राजधानी बनारस शहर अंग्रेजों के अधीन होते हुए भी बनारस प्रांत में चुटकी बजाते ही राज्य क्रांति की आंधी दस दिशाओं को धुंधला करती बह रही थी। जमींदार, किसान, सिपाही सब लोगों ने फिरंगी शासन को गोमांस की तरह आपत्तिजनक मान लिया। छोटे-छोटे गांवों में अपनी सीमा में गोरों के आने की खबर लगते ही उन्हें मार-पीटकर भगा दिया जाता।⁷² विशेष बात यह कि केवल अंग्रेज लोगों के लिए ही नहीं अपितु उनके द्वारा किए गए हर काम के लिए लोगों में इतनी घृणा थी कि वे काम भी उन्हें आंखों से सुहाते नहीं थे। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा नियुक्त जमींदारों-फिर वे कैसे भी हों-को निकालकर पुरानी पीढ़ी के जमींदारों को वहां लाकर बैठाया। अंग्रेजों की लगान पद्धति, उनके कारावास ,उनके न्यायसन सबको एक हफ्ते में बदल दिया गया। तारयंत्रों को तोड़ दिया, रेल और यातायात के रास्ते खोद दिए गए। हर टेकरी और हर झाड़ी के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 160 ⁷² ‘‘सैनिकों में विद्रोह की बढ़ती हुई अवस्था में चारों ओर फैला हुआ गहन द्वेष, तथाकथित अन्याय के प्रतिशोध का कभी भी शांत न होनेवाला भाव बढ़ता गया, यह तथ्य स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है। लूट-खसोट की इच्छा तो उसे द्वेष तथा प्रतिशोध की भावना की ही उपज थी, जिससे विभिन्न स्थानों पर रहनेवाले अंग्रेज अधिकारियों को भांति-भांति की आपदाओं क शिकार होने के लिए बाध्य होना पड़ा और उनपर आपदाओं के घन आ गिरे।‘’ –चार्ल्स बाल कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 1, पृष्ठ 245
पीछे गोरों के रक्त और धन के लिए ललचाए गांववाले छिपकर बैठे रहते और अंग्रेजों को रसद तो दूर की बात, कोई समाचार भी न मिलने देने को खेत-खेत में पहरेदार हरे और जरी के झंडों के साथ गश्त लगाते रहे। ऐसी स्थिति में अंग्रेजों का दम घुटने लगा। यद्यपि बनारस शहर अंग्रेजों के कब्जे से छूटते-छूटते रह गया था और सारे सिपाही विद्रोह होते ही अवध की ओर निकल गए थे।⁷³ बनारस शहर का 4 जून का प्रयास असफल रह जाने पर वहां हुई पकड़-धकड़ में एक महत्त्वपूर्ण बात प्रकट हुई। ऐसी ही फुटकर बातों से 1857 के साल में वह रचना-चक्र किस तरह घुमाया जा रहा था, यह ज्ञात होना संभव है। बनारस शहर के तीन भारी क्रांतिकारी नेताओं और एक लखपति साहूकार को पकड़ा गया। उनके घर में क्रांति पक्ष के मुख्य केंद्र से प्राप्त कठोर परंतु सांकेतिक भाषा में लिखे अनेक पत्र सरकार के हाथ लगे। उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण पत्र एक प्रमुख अधिपति की ओर से आए हुए थे और उनका सारांश था-'बनारस के नागरिक शीघ्र विद्रोह करें-बाकर, गिबन, लिंड और जितने भी यूरोपियन हों उनको काट डाला जाए। इस काम के लिए आवश्यक राशि नगरसेठ, कोठीवाले ˙˙˙की ओर से दी जाएगी।' इस कोठीवाले के घर पर छापा डाला गया तो वहां से एक सौ तलवारों और बंदूकों का संग्रह मिला। बनारस प्रांत के विद्रोह की यह संक्षिप्त जानकारी मैंने दी। जगह-जगह के सिपाहियों ने इस प्रांत में मेरठ या दिल्ली के लोगों की तरह यूरोपियनों को अंधाधुंध नहीं काटा था। इस सारे प्रांत में एक भी यूरोपियन लेडी नहीं मारी गई थी। इतना ही नहीं अपितु राष्ट्र-क्षोभ के इस प्रचंड प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए ही लोगों ने स्वयं गाड़ियां देकर अंग्रेजों को उनके अधिकारियों के साथ विदा किया था। यह चित्र देखें और आगे आनेवाला चित्र भी देखें। जनरल नील विद्रोह के समय बनारस में आ चुका था, यह पहले ही कहा है। बनारस प्रांत के स्वराज्य के लिए विद्रोह हेतु खड़ा हो जाने पर उसे प्रोत्साहित करने की ऐसी महानता मनुष्य जाति में मिलना दुर्लभ है और इंगलिश राष्ट्र में तो असंभव ही है। परंतु अंग्रेजों को कम-से-कम जैसे को तैसा, इस न्याय के अनुसार उनकी समझ से जो विद्रोही थे उनके साथ व्यवहार करना चाहिए था। विद्रोहियों और सारे हिंदुस्थान को उनकी 'क्रूरता' के लिए अश्लील शब्दों और नरकगामी शापों की लाखों गालियां देनेवाले 1857 का स्वातंत्र्य समर – 161 ⁷³ 1- "ज्यों ही काशी में विद्रोह होने का समाचार अन्य जिलों मे। फैला कि संपूर्ण प्रांत एक साथ उठ खड़ा हुआ। आसपास के स्थानों से यातायात के मार्ग तोड़ दिए गए। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सिपाही जिस कार्य को नहीं कर सके थे उसे साफल्य मंडित करने का प्रयास जनता और जमींदारों द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा था।" 2. सर कॉलिन कैंपबल द्वारा प्रस्तुत 'भारतीय विद्रोह का वृत्तांत', पृष्ठ 64 ।
अंग्रेजों की ससुभ्य सेना के बहादुर सेनापति ने बनारस प्रांत के लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया, यह प्रकाशित साहित्य से प्राप्त जानकारी देने के बाद और अधिक एक शब्द भी लिखने की आवश्यकता नहीं रहेगी। बनारस प्रांत के विद्रोह के बाद जनरल नील ने आस-पड़ोस के गांवों में बंदोबस्त करने के लिए यूरोपियन और सिखों की टोलियां भेजीं। निराश्रित और खेतों पर उपजीविता चलानेवाले छोटे-छोटे गांवों में ये टोलियां घुस जाती और जो कोई भी रास्ते में दिखे उसे या तो वहीं काट डाला जाता था या फांसी पर लटकाया जाता था। इस फांसी पर चढ़नेवालों की संख्या इतनी होती थी कि एक फांसी रात-दिन चलाकर पूरा न पड़ने पर फांसी के खंभों की स्थायी पंक्तियां लगाकर रखनी पड़ी। इस लंबी पंक्ति में लोग रात-दिन अधमरे करके फेंके जा रहे थे, फिर भी फांसी पर चढ़नेवाले उम्मीदवारों की भीड़ थी। फिर अंग्रेज अधिकारियों ने पेड़ काटकर खंभे बनाने की गंवारू पद्धति छोड़ दी और सीधे पेड़ को एक से अधिक शाखाएं क्या बिना कारण ही दी है! अतः पेड़ों की हर शाख पर नेटिवों की गरदनें बांध उन्हें लटकते छोड़ दिया जाता। यह 'लश्करी कर्तव्य' और ईसाई मिशन हर दिन और हर रात लगातार चलाते-चलाते वे बहादुर अंग्रेज उकताने लगे हों तो कोई आश्चर्य नहीं। अतः फिर इस धार्मिक और उदार कार्य में जो गंभीरता थी उसे थोड़ा कम करके मनोरंजन करने के लिए कुछ नवीनता मिलाई गई। सिर्फ उठाया और पेड़ पर टांग दिया, इस भोंडी पद्धति को अब थोड़ा कलात्मक बनाया गया। "अब नेटिवों को पहले हाथी पर बैठाया जाता, फिर हाथी को ऊंचे पेड़ की शाखा तक ले जाया जाता और उसके ऊपर बैठे नेटिव की गरदन शाख से बांधने के बाद हाथी को हटा लिया जाता। हाथी निकल जाने पर उन अगणित छटपटाहट मरते लोगों के ऊंटपटांग लटकते शव दिखाई देते। पर इस रतह वहां से गुजरते अंग्रेजों को एक मनहूस साम्यता दिखाई देती थी, इसलिए नेटिव को पेड़ पर सीधे लटकाकर फांसी देने की बजाय अलग-अलग आकृति बनाकर टांगा जाता। कोई अंग्रेजी आठ (8) जैसा बांधा जाता तो कोई नौ (9) जैसा।"⁷⁴ परंतु इस तरह प्रयास करने के बाद भी काले लोग हजारों-लाखों में जीवित-के-जीवित। अब इतनों को फांसी चढ़ाने की बात सोचें तो उन्हें बांधने के लिए इतनी रस्सी कहां से लाएं? ऐसी अजीब गुत्थी इंग्लैंड जैसे विकसित ईसाई राष्ट्र के सामने आ पड़ी। परमेश्वर की कृपा से अंत में एक युक्ति उन्हें सूझी और उसका प्रयोग इतना सफल रहा कि-अब आगे फांसी के स्थान पर उस शास्त्रीय युक्ति को ही काम में लाने की बात निश्चित हुई और एक घंटे में पूरा गांव-का-गांव फांसी चढ़ने लगा। आग की 1857 का स्वातंत्र्य समर - 162 ⁷⁴ के एवं मैलसन कृत-'दि इंडियन म्यूटिनी', खंड 2, पृष्ठ 177 ।
लपटों से उसकी गरदनें कसकर बांध देने पर और चारों ओर तोपें रखने पर गरीब नेटिवों के हजारों घर जलकर राख होने में फिर कितनी देर! इन गांवों को चारों ओर से अग लगाकर उन्हें कहीं से भी न निकलने देकर जला डालने में कितने ही अंग्रेजों को इतना आनंद आता कि उन्होंने उन दृश्यों के हास्यास्पद वर्णन लिखकर इंग्लैंड भेजे। गांव को आग इतनी जल्दी और पूरी तरह से लगाई जाती कि उसमें से बाहर निकलने का नाम भी नहीं लिया जा सकता। गरीब किसान, विद्वान, विकलांग-सारे आग की ज्वाला में जलकर राख हो जाते। गोद के दूध-पीते बच्चे के साथ उनकी माताएं जलकर राख हो जाती। बिस्तर से लगी बूढ़ी औरतें और पुरुष अपने चारों ओर धधकती आग की ज्वाला में जरा सी सरकने की शक्ति न होने से बिस्तर पर ही जलकर राख हो जाते।⁷⁵ और कोई जलकर राख नहीं हुआ? तो एक अंग्रेज अपने पत्र में लिखता है-"You will] however, be gratified to learn that 20 villages are razed to ground." (आज के हमले में हमने बीस गांव राख कर दिए हैं-यह सुनकर आपको संतोष हुए बिना नहीं रहेगा) उपर्युक्त दानवी सच्चाई, 'जनरल नील के प्रतिशोध के बारे में कुछ न लिखना ही अच्छा', ऐसी स्पष्ट प्रतिज्ञा करनेवाले अंग्रेज इतिहासकारों के उदार इतिहास में हुई चूक के कारण जो जानकारी बाहर आई है, यह उसका सारांश है। बस, इससे अधिक एक शब्द भी लिखना क्रूरता के इस नंगे चित्र को खराब करना है। इसलिए अब हताश आंखों से श्री भागीरथी और कालिंदी के प्रीति संगम की प्रेम लहरों की ओर दृष्टिपात करें। इलाहाबाद शहर बनारस से कोई सत्तर मील की दूरी पर बसा हुआ है। इस प्रयाग क्षेत्र की धार्मिक पवित्रता को वहां अकबर के शासनकाल में निर्मित विस्तीर्ण किले की अपूर्व भव्यता ने बढ़ाया है। कलकत्ता से पंजाब और दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर – 163 ⁷⁵ 1 चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्युटिनी', भाग 1, पृष्ठ 242-43 । 2. वही, पृष्ठ 244 । 3. वही , पृष्ठ 242 ।
आदि बड़े-बड़े प्रांतों को जानेवाले सारे महत्त्वपूर्ण रास्तों का यह इलाहाबाद नाका होने से इन सब प्रांतों की हलचलों पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किसी ऊंचे भीमाकृति और उग्र सेनापति जैसा वह इलाहाबाद का किला अपनी गंभीरता से शोभित है। सन् 1857 की क्रांति के समय में जिसके हाथ में यह किला हो उसके हाथ में यह सारा विस्तीर्ण प्रांत होगा, ऐसी स्थिति होने से यह महत्त्व का स्थान अपने अधिकार में रखने के लिए दोनों ही ओर से जोरदार प्रयास चल रहे थे। इलाहाबाद में जो सिपाही थे उनके साथ सारा शहर एक ही समय में विद्रोह करे, यह क्रांति पक्ष का विचार था। इस कार्य के लिए जब गुप्त रचना चल रही थी तब शहर के नागरिकों में स्वराज्य-प्राप्ति के लिए उठने की प्रबल लालसा उत्पन्न करने में हिंदू पंडों का बहुत उपयोग हुआ। केवल इलाहाबाद के हिंदू नागरिकों में नागरिकों में स्वराज्य-प्राप्ति के लिए उठने की प्रबल लालसा उत्पन्न करने में हिंदू पंडों का बहुत उपयोग हुआ। केवल इलाहाबाद के हिंदू नागरिकों में ही नहीं अपितु उस सारे प्रांत के हिंदू लोगों में उनके वजनदार धर्मगुरू स्वातंत्र्य युद्ध के बीजों की कितने ही दिनों से अखंड बुआई कर रहे थे। हिंदू लोगों में स्नान संकल्प के साथ ही मानो यह धार्मिक और पवित्र राज्य क्रांति का संकल्प भी लिया जा रहा था। वैसे ही उस शहर की विस्तीर्ण मुसलमान बस्ती में भी मुल्लाओं की चहल-पहल बढ़ गई थी। दीन और देश की मुक्ति के लिए शरीर के रक्त से समरभूमि का सिंचन करने को दृढ़संकल्प हजारों मुसलमान संकेत समय की राह देख रहे थे। इसमें अंग्रेजों को कुछ भी नया नहीं था, सारा हिंदुस्थानी मुसलमान अपना शत्रु ही रहेगा, यह सारे अंग्रेजी लेखकों की पक्की धारणा थी, जो स्पष्ट दिखती है। Red pamphlet का प्रसिद्ध लेखक कहता है। “The Mohamedans have shown that they cherish in their hearts the proselytizing doctrines of their religion and that as cheristians, they for ever detact and take advantage of coming opportunity of destroying Europeans.” यह बात सार्वजनिक रीति से जितनी सत्य है उससे भी अधिक वह इस शहर विशेष में सत्य हुई थी। इलाहाबाद में मुसलमानों के कदम हिंदुओं से भी आगे पड़ रहे थे। इतना ही नहीं अपितु इस शहर में क्रांति-केंद्र के संचालन में वे ही प्रमुख भूमिका में थे। हिंदू और मुसलमानों में अपनी जन्मभूमि की मुक्ति के लिए चल रहे प्रयासों का स्वरूप यह बना कि शहर के न्यायधीश और मुंसिफ भी गुप्त रीति में क्रांति मंडल में सम्मिलित हो गए थे।⁷⁶ इलाहाबाद में किले की रक्षा के लिए और इसके प्रांत का मुख्यालय होने से अंग्रेजों को वहां बहुत मजबूत बंदोबस्त रखना आवश्यक था। परंतु सन् 1857 के मई माह के बिलकुल शुरू में भी सारे देश में क्या आंदोलन चल रहे हैं, यह ज्ञात न होने से इलाहाबाद में बहुत ढील चल रही थी। इलाहाबाद में क्रांति की ज्वालाएं चारों ओर से सुलगाते हुए नेताओं ने इतनी चतुराई से गोपनीयता रखी हुई थी कि यहां एक भी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 164 ⁷⁶ चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्युटिनी', भाग 1, पृष्ठ 65 ।
यूरोपियन सिपाही रखने की आवश्यकता सरकार को नहीं पड़ी। मेरठ का समाचार जब आया तब इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान पर सिपाहियों की 6वीं रेजिमेंट और सिखों की फिरोजपुर रेजिमेंट की कोई दो सौ लोगों की टुकड़ी-इतनी ही सेना थी। जल्दी ही अवध से घुड़सवार लाए गए और वह किला, उसकी प्रचुर शस्त्र सामग्री सहित उन नेटिव सिपाहियों के अधिकार में ही दिया गया, इन सिपाहियों पर जो अंग्रेज अधिकारी थे उन्हें अपने सिपाही राजनिष्ठा की जीवित मूर्तियां लगते थे। विशेषकर 6वीं रेजिमेंट ने तो राजनिष्ठा की हद कर दी थी, इसमें बिलकुल भी शंका नहीं। उन्होंने दिल्ली का समाचार मिलने के बाद एक दिन सरकार को संदेश भेजा कि हमें उस अवसर की राह देख रहे हैं। इस अप्रतिम राजनिष्ठा की हर तरफ तारीफ होने लगी। स्वयं गवर्नर जनरल की ओर से इस अद्वितीय ईमानदारी और राजनिष्ठा के लिए 6वीं रेजिमेंट अंदर से पूरी-की-पूरी विद्रोही हो गई है। यह समाचार सुनते ही राजनिष्ठा का प्रदर्शन करने के लिए 6वीं रेजिमेंट ने दो क्रांतिदूतों को पकड़कर अधिकारियों को सौंप दिया। अब शंका की बात ही कहां रही! परंतु सरकार को अभी भी हमारी राजनिष्ठा पर शंका हो तो हमारे हृदय कितने निर्मल हैं-देखना चाहे तो अंग्रेज अधिकारी भी 6वीं रेजिमेंट में आएं-और देखें, कहां-कहां, राजनिष्ठा का सागर लहरा रहा है। इतना ही नहीं अपितु अंग्रेज अधिकारियों के पास दौड़ते हुए पहुंचकर सिपाहियों ने आलिंगन दिए और प्रेम का प्रदर्शन करते हुए उनके दोनों गाल चूमें।⁷⁷ ˙˙ और उसी रात को 6वीं रेजिमेंट के सारे-के-सारे सिपाही 'मारो फिरंगी को' कहते हुए तलवार तान उठे! क्रांति-योजना का बनारस की तरह समय पूर्व ही विध्वंस न हो और सिपाहियों को निःशस्त्र न किया जा सके, इसलिए सिपाहियों के गुप्त प्रयास जब चल रहे थे, तभी अंग्रेजों ने अपने काफी कुछ परिवार किले में ले जाकर उनका संरक्षण करने कुछ सिखों और घुड़सवारों के दल वहां तैनात कर दिए थे। बनारस का समाचार 5जून को इलाहाबाद आ धमका। उस दिन शहर में ऐसी अपूर्व गड़बड़ी प्रारंभ हुई कि अंग्रेजों ने कुछ तोपें बनारस की ओर के पुल निशाना साधकर रख दीं और किले के दरवाजे बंद कर लिये। रात के समय सिपाहियों ने जिन्हें कुछ समय पूर्व ही चूमा था, वे सारे अंग्रेज अधिकारी नाचते-कूदते खाना खाने मैस में गए ही थे कि तभी कुछ दूरी पर संकटसूचक बिगुल बजने लगा। वह बिगुल शायद राजनिष्ठ 6वीं रेजिमेंट के विद्रोही हो उठने का 1857 का स्वातंत्र्य समर - 165 ⁷⁷ 'नैरेटिव्स' में सर सी. कॉलिन ने लिखा है-"Sepoys hung themselves about the necks of their European officers and kissed them on both cheeks."
भयानक समाचार बजा रहा था! बनारस के पुल पर सुरक्षा के लिए रखी गई तोपें किले में पहुंचाने का आदेश उस दिन शाम को ही हो गया था। परंतु अंग्रेज आदेश दें और सिपाही पालन करें, यह आज तक का राजनिष्ठ नियम उस शाम को एकाएक बदला-बदला दिखाई देने लगा। क्योंकि सिपाहियों ने एक दूसरा आदेश जारी किया कि तोपें किले की ओर न ले जाकर कैंट की ओर ले जाई जाएं। यह विचित्र ढंग देखकर उन उद्दंड सिपाहियों को दंड देने के लिए अवध के घुड़सवार बुलाए गए। ले. कर्नल अलेक्जेंडर नामक युवा अंग्रेज अधिकारी अपने नेटिव घुड़सवारों को तैयार कर लेफ्टिनेंट हार्वड के साथ तुरंत उन सिपाहियों पर दौड़ पड़ा। इस समय चंद्र प्रकाश से दिशाएं प्रकाशित हो रही थी। घुड़सवार पलटन को उन उद्धत सिपाहियों पर हमला करने का अंग्रेजी अधिकारियों ने आदेश दिया और अब अपने पीछे हजारों दौड़ते घोडे आकर मुट्ठी भर सिपाहियों को लतिया डालेंगे, ऐसे विश्वास से अंग्रेज अधिकारी स्वयं आगे बढ़ टूट पड़े। पर आश्चर्य! पीछे सारे घुड़सवार अपने स्वदेश बंधुओं पर शस्त्र उठाने से मना कर जहां-के-तहां खड़े रहे। यह देखते ही सिपाही जय-जयकार कर उठे। कर्नल अलेक्जेंडर सीने में गोली लगने से नीचे गिरा। उसके शरीर के टुकड़े किए गए और वे सारे भारतीय सिपाही एक-दूसरे के गले लगते तोपों के साथ कैंट की ओर चल दिए। इस समय पहले ही दौड़कर आए दो घुड़सवार ने कैंट पर यह समाचार अपने भाइयों को बता भी दिया था। फिर क्या था, परेड मैदान पर जो घटना घटित हुई वह अभूतपूर्व ही थी। अंग्रेज अधिकारी के मुंह से आदेश निकलता और उसे गोली लगती। प्लैकेट मरा, अडज्युटंट इन्नेस मरा। क्वार्टर मास्टर हावस मरा, पिंगले मरा, मैनरो मरा, बर्च मरा, लेफ्टिनेंट इन्नेस मरा। परेड मैदान से वह क्रोधित सैन्य समूह अब आग लगाते इधर-उधर फैल गया था। मैस हाउस में खाने-पीने के लिए बहुत अंग्रेज लोग आएं हैं, यह ज्ञात होते ही उस मैस हाउस पर हमला किया गया और वहां के सारे अंग्रेज गिन-गिनकर काटे गए। पहले ही कहा था कि इलाहाबाद में मुख्य बात किला हथियाना थी। उस किले में अंग्रेज महिला-बच्चे, भरपूर गोला-बारूद को पूरी तरह सिख सिपाहियों के हाथों सुरक्षा के लिए सौंपा गया था और ये सिख सिपाही भारतीय लोगों की तरह ही विद्रोह करेंगे और किले में से फिरंगी भगाए जाने की खुशखबरी देनेवाली तोप जल्दी ही छूटेगी, यह उत्सुकता सारे सिपाहियों को थी। परंतु किले के सिखों ने सच्ची राजनिष्ठा दिखाई। उन्होंने किले से फिरंगी झंडा उखाड़ फेंकने से तो मना किया ही, साथ ही किले के नेटिव सिपाहियों को निःशस्त्र करके बाहर भगा देने के लिए अंग्रेजी अधिकारियों की पूरी सहायता की। इस समय सिख लोग अपनी तरफ किस तरह बने रहे, अंग्रेजों को इस बात का आश्चर्य अभी भी है।⁷⁸ 1857 का स्वातंत्र्य समर – 166 ⁷⁸ स्वयं नील कहता है-”How the plan has not taken, by the Sikhs] is a wonder!”
एकाध घंटे में इलाहाबाद का यह विस्तृत किला क्रांतिकारियों के हाथ में पड़ जाता, पर सिखों ने वह आधा घंटा अपने स्वदेश बंधुओं और अपनी मातृभूमि के शरीर को चूर-चूर करने में ही खर्च कर दिया। किले के अंदर स्थित भारतीय सिपाहियों ने बार-बार प्रयास करने में ही खर्च कर दिया। किले के अंदर स्थित भारतीय सिपाहियों ने बार-बार प्रयास किया, पर उनका साथ न देकर अंग्रेज अधिकारियों के आदेशों पर उन्हें निःशस्त्र कर सिख सिपाहियों ने किले के बाहर भगा दिया और इस तरह किला अंग्रेजों के कब्जे में बना रहा। परंतु उन चार सौ सिखों से ही वह इलाहाबाद शहर नहीं भरा था। सिपाहियों के विद्रोह का समय होते-न-होते इलाहाबाद शहर विद्रोह कर उठा। इधर परेड की ओर भयानक गर्जनाएं हो रही थीं, तभी उसकी प्रतिध्वनि शहर के उस घनघोर कंठ से निकलने लगी। पहले शहर की नाकेबंदी कर यूरोपियन घरों का सत्यानाश किया गया और फिर सिपाही और नागरिकों ने इकट्ठे होकर कारागृह को खोल दिया। उस कारागृह के कैदियों के मन में अंग्रेजों के प्रति इतना द्वेष भरा हुआ था जितना किसी के मन में नहीं होगा। कारागृह से छूटते ही कर्कश आवाज और चीत्कार करते पहले वे यूरोपियनों की बस्ती का ओर दौड़े। विशेषकर तारयंत्र और रेलों पर क्रांतिकारियों का बड़ा गुस्सा था। रेल के दफ्तर, पटरी, तार, खंभे, इंजन सारा कुछ क्रांतिकारियों के हाथ लग ही गए। वे एक-एक झटके में जो भी गोरा मिलता उसका सफाया कर देते। जो गोरे भी पिटने लगे। विद्रोह करने को जो तैयार नहीं थे उन सबके घरों पर हमले हुए और जिन्होंने 'हम दिल्ली के बादशाह के प्रति राजनिष्ठ रहेंगे और फिरंगियों से लड़ेंगे-ऐसी शपथ ली, केवल उन्हें ही प्राणदान मिला। 7 जून के प्रातः क्रांतिकारियों ने इलाहाबाद का खजाना कब्जे में लिया। इस खजाने में कोई 30 लाख रूपए थे। फिर दोपहर के समय एक बड़ा सा हरा झंडा ले जाकर शहर की मुख्य कोतवाली पर लगाया गया और उसे सारे नागरिकों ने सलाम किा। जिस दिन शहर और किला इस विद्रोह की ज्वाला में सुलग रहा था उसी दिन सारा इलाहाबाद प्रांत मानों एक व्यक्ति-सा उठ खड़ा हुआ। इधर कहीं मानो फिरंगियों का राज था ही नहीं, एसो लगने लगा। हर गांव ने हरा या जरी का झंडा फहराया और आसपास के गोरे अधिकारियों को भगा दिया, अधिकतर को मार ही डाला जिससे वहां फिरंगियों की गुलामी जड़-मूल से उखाड़ फेंकने जैसी स्थिति हो गई। अरे रे, सौ वर्ष तक जिसके जड़-मूल गहरे बैठाने के लिए प्रयास किए गए उस गुलामी की जड़ें इतनी उथली होती हैं! वास्तव में केवल तलवार से जोती हुई भूमि में कुछ भी पैदा नहीं होता-यह सच है और उसमें गुलामी जैसा नकली बीज तो कभी जमता नहीं। रे विश्व, तू अब भी यह पाठ सीख सकेगा क्या? 1857 का स्वातंत्र्य समर – 167
इलाहाबाद प्रांत में अधिकतर तालुकेदार मुसलमान थे, पर उनकी प्रजा हिंदू थी। ऐसी दोनों परस्पर विरोधी जातियों में एकता होगी और अपने विरूद्ध सामान्य जनता में विद्रोह जन्म लेगा, यह अंग्रेजों के लिए असंभव लगता था। परंतु जून के पहले हफ्ते में ऐसी कितनी ही असंभवताएं संभव हो गई थी। इलाहाबाद का विद्रोह सुनने के लिए न रुकते हुए उस प्रांत के सारे-के-सारे गांव एक ही समय में स्वतंत्र हो गए। मुसलमान और हिंदू-हमस ब स्वदेश माता के एक ही दूध से पोषित हैं, दोनों इसी प्रतिक्रिया से विद्रोह कर उठे और वे सबके सब फिरंगियों के शासन पर प्रहार करने को तत्पर हो गए। नौकरी में लगे मजबूत सिपाही ही नहीं, पेंशनभोगी बूढ़े सैनिक भी स्वयंसेवक हो गए। वे अपनी सफेद मूंछों पर ताव भरते तरूणों की सेना तैयार करते और जो अति बुढ़ापे के कारण कुछ भी प्रत्यक्ष कृति करने में असमर्थ थे, अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े लड़ाई के दांव-घात समझाते और संकट की बातों पर सलाह देते।⁷⁹ पेंशनभोगी सिपाहियों को भी जिस उद्देश्य से बुढ़ापे में यौवन की उमंग आने लगती है उस स्वराज्य और स्वधर्म की दिव्य चेतना की हवा अन्यत्र भी लोगों में भर गई थी, इसमें कोई शंका नहीं। दुकानदार, मारवाड़ी, बनिया इनको भी उस लोक-क्षोभ से इतना साहस भर गया था कि उनके द्वेष के संबंध में जनरल नील ने अपनी रिपोर्ट में विशेष रूप से उल्लेख किया है-‘‘अनेक प्रमुख व्यापारियों एवं अन्य लोगों ने भी हमारे प्रति प्रचंड द्वेष-भावना अभिव्यक्त की। इतना ही नहीं, उनमें से अनेक ने तो हमारे विरूद्ध सक्रिय युद्ध में भी भाग लिया।‘‘ (नील का द्वितीय पत्र) पर इतना हो जाने के बाद भी किसान हमारी ओर होंगे, यह बात अंग्रेज बड़ी बड़ाई से कर रहे थे। परंतु इलाहाबाद ने यह भ्रम भी तोड़कर उसकी ठिकारियों बना दी। हिंदुस्थान में आज तक किसी भी आंदोलन में इतनी अगुवाई किसानों ने नहीं की जितनी इस सन् 1857 क्रांति-युद्ध में की। अपने पुराने लालुकेदारों (अंग्रेज द्वारा नियुक्त नहीं) के झंडों के नीचे अपने हाथों के हल जहां-के-तहां फेंककर ये किसान हवा की भांति स्वतंत्रता युद्ध के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने कंपनी से अपना आड़ा-टेढ़ा परंतु स्वराज्य अधिक अच्छा है, यह पक्की तरह से दिख गया थां इसलिए उन्होंने नियत समय पर आज तक के अपमान का भयानक प्रतिशोध लेना प्रारंभ किया। जहां-तहां स्वराज्य की जय-जयकार होती, गुलामी के मुंह पर गली-कूंचों में बच्चे भी थूकने लगे। सचमुच 1857 का स्वातंत्र्य समर - 168 ⁷⁹ ‘‘कल तक जो सिपाही हमारे हाथ सहलाते थे, वे ही आज उन पेंशन प्राप्त वृद्धों के साथ, जो रणभूमि में जाने के सर्वथा अयोग्य थे, अन्य लोगों को कायरता और क्रूरता के कार्य करने में नितांत तत्परता सहित बढ़ावा दे रहे थे। ’’ -के कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 193 तथा रेड पैंफलेट भी देखें
लड़कों ने थूका। क्योंकि बारह-चौदह वर्ष के बच्चों ने स्वराज्य के हरे जरीदार झंडे लगाए और ताशे बजाते हुए उन झंडों को उठाए उन्होंने जुलूस भी निकाले। ऐसे ही एक जुलूस को पकड़कर अंग्रेजों ने उसमें सम्मिलित तरुणों को फांसी पर लटकाया। यह दंड दिए जाने पर एक अंग्रेज अधिकारी भी इतना लज्जित हुआ कि वह अश्रुपूरित नेत्र लेकर मुख्य कमांडर से उन बच्चों को छोड़ देने का निवेदन करने लगा। परंतु उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा और स्वतंत्रता के झंडे को लेकर चलनेवाले उन तरूण लड़कों को दिन-दहाड़े फांसी दी गई। इन तरूण देवदूतों पर किया गया जुल्म उन जालिमों के सिर पर आघात करने से कैसे चूक सकता है? सारी सृष्टि भूकंप-जैसी डोलने लगी। किसान और तालुकेदार, हिंदू और मुसलमान, वृद्ध और तरूण, पुरुष और महिला-सारे-के-सारे राजनीतिक दास्य का उच्छेद करने के लिए 'हर-हर' कर उठा। “केवल गंगा पार के लोग ही नहीं अपितु गंगा और यमुना के मध्य में स्थित भूखंड की जनता भी उठा, किसान भी सन्नद्ध हुए और दोनों धर्मों का एक भी अनुयायी ऐसा नहीं रह गया जो हम (अंग्रेजों) पर प्रहार करने के लिए बेचैन न हो उठा हो।” ⁸⁰ इस बहुजन समाज के प्रचंड प्रयासों को सफलता मिले और श्रीमती भारतभूमि स्वराज्य-संपन्न हो जाए-इसके लिए प्रयाग के पंडे और मुल्ला अपना पवित्र आशीर्वाद उस क्रांति के माथे पर बरसाने लगे। हिंदुस्थान के इतिहास में इतनी उत्क्षोभक, विद्युत वेगी, भयानक एवं सर्वत्र व्याप्त राज्य क्रांति दूसरी दिखना बहुत कठिन है। लोक-शक्तियां जिसमें भड़भड़ाकर जाग उठीं और अपने देश की स्वतंत्रता के लिए एकाएक गर्जना करते मेघों की तरह रक्त की मूसलधार वर्षा करने लगीं। यह सन् 1857 जैसी प्रचंड राज्य क्रांति हिंदुस्थान के इतिहास में अभूतपूर्व बात थी। उसमें भी हिंदू और मुसलमान अपने भाई-भाई होने का रिश्ता पहचानकर हिंदुस्थान के लिए इकट्ठा होकर लड़ने लगे, यह दृश्य बहुत ही अपूर्व एवं आश्चर्यकारी था। यह अपरिचित प्रचंड तूफान उत्पन्न करने के बाद उसपर नियंत्रण रख पाने में हिंदुस्थान धोखा खा गया, इसमें कौन सा आश्चर्य! आश्चर्य है तो यह कि जिसपर कोई दोषारोपण न किया जा सके, ऐसा तूफान हिंदुस्थान ने निर्मित किया! क्योंकि राज्य क्रांति पर नियंत्रण रखना तो किसी भी राष्ट्र के लिए संभव नहीं हुआ। अधिक क्या कहें, यदि फ्रेंच राज्य क्रांति से तुलना कर देखें तो अत्याचार, अंधाधुंधी, आपाधापी, अव्यवस्था, अंधस्वार्थता, लूटपाट आदि क्रांति जैसे अनिवार्य प्रलय में अनिवार्य तथा घटित हुई-ऐसा दिखता है। हिंद-भू का वह पहला प्रयत्न नहीं, प्रयोग था और इसीलिए उस प्रयोग में जहां इलाहाबाद में इतनी विजय प्राप्त हुई वहीं त्रुटियां, धोखे या अंधाधुंधी भी हुई। इसमें आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। जमींदारों के आनुवंशिक झगड़े, गुलामी के कारण प्राप्त दरिद्रता आदि और शताब्दियों पुराने हिंदू-मुसलमानों का 1857 का स्वातंत्र्य समर - 169 ⁸⁰ के कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 195।