१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबरेली और शाहजहांपुर-इन दो शहरों के बीच बदायूं नामक जिले का मुख्यालय है। उस जिले का कलेक्टर और मजिस्ट्रेट मि. एडवर्ड्स उसी शहर में रहता था। अंग्रेजी राज के प्रारंभ से पुराने जमींदारों की दुर्दशा और लगान वसूली के लिए झटपट की जानेवाली नीलामी में हाथ से जाती हुई जमीनों से पूरे रूहेलखंड के बड़े-बड़े जमींदार और किसान बहुत त्रस्त हो गए थे। उसमें भी बदायूं में लगान पद्धति का इतना अत्याचार था कि यह जिला अंग्रेजी राज को मिटा देने के लिए किसी भी अवसर की ताक में था। यह बात स्वयं एडवर्ड्स को भी ज्ञात थी और इसलिए उसने बरेली से सेना की सहायता मांगी थी। परंतु स्वयं बरेली के उस समय क्या हाल थे, यह पहले बताया ही जा चुका है। फिर भी बरेली से यह लिखित प्राप्त हुआ कि 1 जून को हम यूरोपियन अधिकारी के अधीन सेना भेज रहे हैं। यह समाचार आते ही एडवर्ड्स बहुत खुश हुआ। वह 1 जून को बरेली के रास्ते की ओर आंखें गड़ाए बैठा रहा। उस रास्ते पर कोई सरकारी आदमी दौड़ता आ रहा है, वह भी उसे दिखने लगा। अर्थात् बरेली से आनेवाली सहायता का यह हरकारा ही है, यह मान एडवर्ड्स ने उतावली में उससे प्रश्न किए। परंतु प्रश्न के उत्तर में में बरेली से बदायूं को सेना सहायता के लिए आ रही है, यह न बताते हुए यह बताया गया कि बरेली में ही अंग्रेजी सत्ता समाप्त हो गई है। बदायूं में खजाने की सुरक्षा के लिए कुछ सिपाही रखे हुए थे। उसके अधिकारी से एडवर्ड्स ने पूछा, "बरेली सवतंत्र हो गई। बदायूं का क्या होगा? " अधिकारी ने कहा, "मेरे सिपाही राजनिष्ठ हैं। कोई डर नहीं है।" उसने उसने यह आश्वासन दिया ही था कि शाम को बदायूं में विद्रोह हो गया। खजाने के सैनिक, पुलिस और नागरिक-सबने फिरंगी राज डूब जाने की घोषणा कर दी और वह सारा जिला खानबहादुर खान के नियंत्रण में चला गया। सैनिकों ने खजाना लेकर दिल्ली की ओर कूच किया और बदायूं के रे अंग्रेज अधिकारी रात में ही जंगलों में होकर भागने लगे। खाने को अन्न नहीं, पहनने को कपड़ा नहीं-ऐसी स्थिति में छिपते-छिपते कभी-कभी किसी गांववाले के घर भैंसों के पीछे, जहां गोबर की दुर्गंध से नाक फट रही थी वहां हफ्ते-हफ्ते बिताते अंग्रेज महिलाएं, अंग्रेज कलेक्टर, मजिस्ट्रेट अपने प्राण बचाते भाग रहे थे। कुछ मारे गए, कुछ मर गए, कुछ दयालु नेटिवों के कृपाश्रय में प्राण बचाए बने रहे। इस तरह पूरा रूहेलखंड एक दिन के अंदर विद्रोह कर उठा। बरेली, शाहजहांपुर मुरादाबाद, बदायूं आदि जिलों के शहरों में स्थित सेना, पुलिस और जनता ने एक चेतावनी में ही दो घंटे के अंदर ब्रिटिश सत्ता को सीमा पर कर दिया। ब्रिटिश सिंहासन औंधा हुआ, उसपर स्वकीय सिंहासन विराजमान हुआ। ब्रिटिश झंडा उतारकर उसके स्थान पर हरे झंडे लगाए गए। ब्रिटिश कोर्ट, कार्यालयों और थानों से हिंदुस्थान पर अधिकार करनेवाला इंग्लैंड अपराधी के कठघरे में खड़ा हो गया। ऐसा यह विलक्षण 1857 का स्वातंत्र्य समर - 151