भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 418 में से

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परिवर्तन सारे प्रदेश में दो घंटे में हो गया। रूहेलखंड से अंग्रेजी शासन का उन्मूलन रकने के लिए स्वदेशी रक्त की एक बूंद भी खर्च नहीं करनी पड़ी। यह कितना बड़ा आश्चर्य था। रूहेलखंड गुलाम है, यह न कहकर रूहेलखंड स्वतंत्र है, ऐसा सबने कहा और वह स्वतंत्र हुआ। सेना, सिपाही, नागरिक-सबके विद्रोह करते ही हर जिले के मुख्य शहर से दो-चार यूरोपियन अधिकारियों को निकाल देने से अधिक उस प्रदेश को स्वतंत्र करने को कुछ भी अधिक काम नहीं करना पड़ा। गुप्त कार्यक्रम , मजबूत संगठन और उसके द्वारा की गई त्वरित कौशलपूर्ण कार्यवाही-इन बातों के आधार पर अंग्रेजों के कब्जे से निकलते ही रूहेलखंड ने खानबहादुर खान का शासन स्वीकार किया। पहले बताया गया है कि यहां के सारे सैनिक बरेली के तोपखाने के सूबेदार बख्त खान की अधीनता में दिल्ली की ओर लड़ने चल दिए। उसके बाद खानबहादुर खान ने प्रदेश का बंदोबस्त रखने के लिए नई सैनिक भरती चालू की और राजधानी के अधिकतर पहले के लोग ही रखे गए और वरिष्ठ स्थानों पर नए स्वदेशी अधिकारियों की नियुक्ति की गई। सरकारी पैसा दिल्ली के बादशाह के नाम पर वसूल किया जाने लगा। न्याय देने के लिए पहले जैसे ही कोर्ट खोले गए और पहले के ही नौकर नियुक्त कर दिए गए, संक्षेप में, जहां यूरोपियन अधिकारी होते थे वहां हिंदुस्थानी नियुक्त करने के सिवाय किसी भी विभाग में राज्य क्रांति के धक्के से अन्य तरह का परिवर्तन नहीं हुआ। खानबहादुर खान ने अपने सूबे की यह सारी जानकारी दिल्ली के बादशाह को लिखकर भेज दी और रूहेलखंड में निम्नलिखित राजकीय घोषणापत्र लगाया गया। “हिंदुस्थान देश के वासियों! स्वराज्य-प्राप्ति का दुर्लभ अवसर तुम्हें प्राप्त हो गया है। उसको स्वीकार करोगे या अनादर? इस अपूर्व और असाधारण अवसर का तुम लाभ लोगे या उसे हाथ से फिसल जाने दोगे? हिंदू बंधुओं और मुसलमान भाइयों! यह ध्यान में रखना कि यदि अपने हिंदुस्थान देश में इन अंग्रेजों को तुमने रहने दिया तो ये तुम्हारे देश का सत्यानाश और तुम्हारे धर्म का विनाश किए बिना कभी भी रहनेवाले नहीं हैं।67 अंग्रेजों के फरेब के कारण आज तक हिंदुस्थान के निवासियों ने अपनी गरदन अपनी ही तलवार से काटी है। अतः वह गृह-क्लेश की गलती हमें अब ठीक कर लेनी चाहिए। मुसलमानों से लड़ने की सलाह हिंदुओं को देना और हिंदुओं के विरूद्ध चलने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 152 67 हिंदू एवं मुस्लिम बंधुओं, भलीभांति समझ लो कि यदि तुमने अंग्रेजों को हिंदुस्थान में रहने दिया तो वे निश्चित रूप से तुम्हारा धर्म भ्रष्ट करेंगे और तुम्हारा नरमेध भी होगा। ˙ ˙ ˙ अंग्रेज अब भी हमारे साथ कुटिलता की नीति का ही पालन करेंगे। वे हिंदू को मुसलमान के विरूद्ध उभारने में कदापि नहीं चूकेंगे। '” -द दफ्तर ऑफ खानबहादुर खान, ट्रांसलेटेड बाइ क्रासॉफ्ट विल्सन

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