१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंग्रेजों की ससुभ्य सेना के बहादुर सेनापति ने बनारस प्रांत के लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया, यह प्रकाशित साहित्य से प्राप्त जानकारी देने के बाद और अधिक एक शब्द भी लिखने की आवश्यकता नहीं रहेगी। बनारस प्रांत के विद्रोह के बाद जनरल नील ने आस-पड़ोस के गांवों में बंदोबस्त करने के लिए यूरोपियन और सिखों की टोलियां भेजीं। निराश्रित और खेतों पर उपजीविता चलानेवाले छोटे-छोटे गांवों में ये टोलियां घुस जाती और जो कोई भी रास्ते में दिखे उसे या तो वहीं काट डाला जाता था या फांसी पर लटकाया जाता था। इस फांसी पर चढ़नेवालों की संख्या इतनी होती थी कि एक फांसी रात-दिन चलाकर पूरा न पड़ने पर फांसी के खंभों की स्थायी पंक्तियां लगाकर रखनी पड़ी। इस लंबी पंक्ति में लोग रात-दिन अधमरे करके फेंके जा रहे थे, फिर भी फांसी पर चढ़नेवाले उम्मीदवारों की भीड़ थी। फिर अंग्रेज अधिकारियों ने पेड़ काटकर खंभे बनाने की गंवारू पद्धति छोड़ दी और सीधे पेड़ को एक से अधिक शाखाएं क्या बिना कारण ही दी है! अतः पेड़ों की हर शाख पर नेटिवों की गरदनें बांध उन्हें लटकते छोड़ दिया जाता। यह 'लश्करी कर्तव्य' और ईसाई मिशन हर दिन और हर रात लगातार चलाते-चलाते वे बहादुर अंग्रेज उकताने लगे हों तो कोई आश्चर्य नहीं। अतः फिर इस धार्मिक और उदार कार्य में जो गंभीरता थी उसे थोड़ा कम करके मनोरंजन करने के लिए कुछ नवीनता मिलाई गई। सिर्फ उठाया और पेड़ पर टांग दिया, इस भोंडी पद्धति को अब थोड़ा कलात्मक बनाया गया। "अब नेटिवों को पहले हाथी पर बैठाया जाता, फिर हाथी को ऊंचे पेड़ की शाखा तक ले जाया जाता और उसके ऊपर बैठे नेटिव की गरदन शाख से बांधने के बाद हाथी को हटा लिया जाता। हाथी निकल जाने पर उन अगणित छटपटाहट मरते लोगों के ऊंटपटांग लटकते शव दिखाई देते। पर इस रतह वहां से गुजरते अंग्रेजों को एक मनहूस साम्यता दिखाई देती थी, इसलिए नेटिव को पेड़ पर सीधे लटकाकर फांसी देने की बजाय अलग-अलग आकृति बनाकर टांगा जाता। कोई अंग्रेजी आठ (8) जैसा बांधा जाता तो कोई नौ (9) जैसा।"⁷⁴ परंतु इस तरह प्रयास करने के बाद भी काले लोग हजारों-लाखों में जीवित-के-जीवित। अब इतनों को फांसी चढ़ाने की बात सोचें तो उन्हें बांधने के लिए इतनी रस्सी कहां से लाएं? ऐसी अजीब गुत्थी इंग्लैंड जैसे विकसित ईसाई राष्ट्र के सामने आ पड़ी। परमेश्वर की कृपा से अंत में एक युक्ति उन्हें सूझी और उसका प्रयोग इतना सफल रहा कि-अब आगे फांसी के स्थान पर उस शास्त्रीय युक्ति को ही काम में लाने की बात निश्चित हुई और एक घंटे में पूरा गांव-का-गांव फांसी चढ़ने लगा। आग की 1857 का स्वातंत्र्य समर - 162 ⁷⁴ के एवं मैलसन कृत-'दि इंडियन म्यूटिनी', खंड 2, पृष्ठ 177 ।