भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 418 में से

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गया था। ग्यारह बजते ही 68वीं पैदल सेना ने अपनी लाइन के पास के यूरोपियनों पर आक्रमण किया। छोटी-छोटी टुकड़ियां अलग-अलग बंगलों की ओर तुरत-फुरत चल पड़ीं। बाकी बचे सिपाहियों ने इधर-उधर भागना चाहनेवाले अंग्रेजों की व्यवस्था करने, उनके घर लूटने, उनमें आग लगाने की दौड़ लगाई। उन कर्कश चीत्कारों को सुनकर डरे-सहमे यूरोपियन लोग घुड़सवारों की लाइन की ओर दौड़े। वहां आश्रयार्थ इकट्ठे होने की सारे मुलुकी और लश्करी अधिकारियों की योजना पहले से बनी थी। वहां जाते ही नेटिव घुड़सवार रेजिमेंट को विद्रोहियों पर आक्रमण करने का आदेश दिया गया। पर उस रेजिमेंट का मुख्य नेटिव अधिकारी मोहम्मद शफी विद्रोहियों से मिला था। घुड़सवारों को अपने पीछे दौड़कर आने का आदेश देता वह विद्रोहियों की ओर दौड़ चला। उसने घुड़सवारों को-‘स्वधर्म के लिए बलिदान दो। देखो, वह हरा निशान तुम्हें बुला रहा है। 'ऐसा चिल्लाकर कहा और सारे घुड़सवार दौड़ पड़े। फिर भी, जो कोई शेष रहे उन्हें लेकर अंग्रेजों ने एक बार परेड की ओर आने का प्रयास किया। पर विद्रोहियों की मार के आगे एक क्षण भी रुकना असंभव होने के कारण उन्होंने उधर से पीठ फेरी और सबके सब नैनीताल की ओर भागने लगे। ब्रिगेडियर सिवाल्ड इस पहले ही हमले में मारा गया। कैप्टन कर्बी, लेफ्टिनेंट फ्रेजर, सार्जेंट वाल्डन, कर्नल ट्रूप, कैप्टन रॉबर्ट्सन आदि जो भी अधिकारी विद्रोहियों के हाथ लगे, उन्हें उन्होंने काट डाला। इस कत्लेआम से बचकर लगभग बत्तीस अधिकारी नैनीताल तक सही-सलामत पहुंच सके। इस तरह छह घंटों के अंदर बरेली में अंग्रेजी शासन का अंत हो गया। अंग्रेजी निशान उतार फेंककर बरेली में स्वतंत्रता का झंडा फहराते ही नेटिव तोपखाने के मुख्य सूबेदार बख्त खान ने सारी नेटिव सेना का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। बख्त खान का नाम आगे दिल्ली की लड़ाई में हमको सुनने को मिलेगा। इस सेनापति ने सारे नेटिव सिपाहियों को स्वतंत्रता के बाद किस तरह व्यवहार करना है और नवस्थापित स्वराज्य में क्या-क्या कर्तव्य करने चाहिए, इसपर एक भाषण दिया और बाद में अंग्रेज ब्रिगेडियर की बग्घी में बैठकर यह स्वदेशी ब्रिगेडियर बरेली के रास्ते से जाने लगा।⁶⁵ उसके साथ अलग-अलग अंग्रेज अधिकारियों की गाड़ियों में नवनियुक्त अधिकारी भी चल दिए। खानबहादुर खान के नाम का जयघोष करके दिल्ली के बादशाह के सूबेदार की हैसियत से उन्होंने रूहेलखंड का शासन अपने हाथ में लिया। बरेली में स्थित यूरोपियनों के घर-द्वारों को जलाकर, लूटकर भस्म करने के बाद फिर कैद किए गए यूरोपियनों को खानबहादुर ने अपने सामने बुलवायां अंग्रेजी शासन में जज का काम करने से उन्हें न्याय कैसे किया जाता है, यह ज्ञात ही था। इसलिए उन्होंने उन यूरोपियन अपराधियों की जांच के लिए एक कोर्ट नियुक्त किया। इन अपराधियों में 1857 का स्वातंत्र्य समर – 148 ⁶⁵ चार्ल्स बाल कृत-‘इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 175 ।

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