१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसलिए 'दूसरी'-ऐसी दो पेंशनें मिलती थीं। अंग्रेज अधिकारियों का मुंह-लगा रहने में खान बहुत ही कुशल है, उधर यह कहा जाता था। सरकार का भी उसपर वैसा ही विश्वास था और बरेली के सारे गुप्त षड्यंत्रों का प्राण भी यही था। बरेली स्थित सारे नेटिव सिपाही और रुहेलखंड की स्वतंत्रता-प्रेमी जनता से इस निमंत्रण पत्र द्वारा जल्दी दिल्ली आने का आग्रह यद्यपि किया गया था, तब भी पहले से निश्चित 31 मई के दिन की राह में बरेली के सारे सिपाही अंग्रेजों के लश्करी आदेशों का पालन पूरी तरह करते हुए अपने-अपने काम कर रहे थे। इस बीच मेरठ से चले सौ सिपाही चुपके से लाइन में कुछ दिन रहकर और उधर के उत्क्षोभक समाचारों से क्रांति की हवा अधिक भरकर चले गए। फिर भी सिपाहियों ने ऊपर से शांति बनाए रखी थी। यूरोपियन लोग अपने बाल-बच्चे वापस बुला लें, यह निवेदन उसमें सिपाहियों के सूबेदार कर रहे थे। परंतु यह निवेदन माना जाने से पहले ही 29 मई को ऐसी भूमिका बनी कि प्रातः नदी पर नहाते समय उस दिन दोपहर को दो बजे ही यूरोपियनों को कत्ल करने की शपथ सिपाहियों ने ले ली। तत्काल अंग्रेजों ने अपने भरोसे की घुड़सवार रेजिमेंट तैयार की। वह भी बिना ना-नुकुर किए तैयार हो गई। परंतु वह पूरा दिन बीत गया, पर सिपाही उठे नहीं। यह समाचार झूठ निकला; फिर भी एक बात सिद्ध हो गई कि घुड़सवार पूरी तरह अपने अधीन हैं, यह कहते हुए अंग्रेज रात को लौट गए। फिर दूसरा पक्का समाचार आया कि घुड़सवार रेजिमेंट ने तो पहले ही शपथ ले ली है कि हम अपने देशबंधुओं पर शस्त्र नहीं उठाएंगे और फिरंगियों की ओर से नहीं लड़ेंगे। ऐसे में किस बात पर विश्वास किया जाए, यह अंग्रेजों की समझ में नहीं आ रहा था। इस तरह 29 मई ही नहीं, 30 मई भी निकल गई और उस दिन तो सिपाहियों का आचरण इतना राजनिष्ठ हो गया था कि वैसा शायद कभी नहीं था। ऐसे में सैनिक-असैनिक-सारे अंग्रेज अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि संकट टल गया है और अब डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। 31 मई उदित हुई। उस दिन कैप्टन ब्राउन लो के घर को एकाएक आग लग गई थी। परंतु अंग्रेजों के मन में डर उत्पन्न हो, ऐसा कोई विशेष कारण नहीं था। वह दिन रविवार का था। रविवार को होनेवाली लश्करी हाजिरी हो गई। नेटिव अधिकारियों की रिपोर्ट आ गई। अंग्रेज अधिकारियों को यह भी लगा कि आज सिपाही लोगों में विशेष संतोष और शांति दिख रही है। चर्च में अंग्रेजों ने प्रार्थना भी की। कहीं अणु मात्र भी गड़बड़ नहीं दिखी। घड़ी ने दोपहर के ग्यारह बजाए। तभी सिपाहियों की लाइन से एक तोप छूटी। तोप छूटते ही बंदूकों की आवाजें और चिल्ल-पों से आकाश भर गया। बरेली की क्रांति इतनी सूत्रबद्धता से की गई थी कि क्रांति आरंभ होते ही कौन किस यूरोपियन का खून करेगा, यह पहले ही ठहरा लिया 1857 का स्वातंत्र्य समर — 147